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पुण्यतिथि विशेष: 'अगले जमाने में कोई मीर भी था'

अगर मीर ने उर्दू शायरी के पैमाने को ऊंचा न किया होता तो ग़ालिब के सामने कोई चुनौती नहीं होती

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Sep 21, 2017 12:07 PM IST

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पुण्यतिथि विशेष: 'अगले जमाने में कोई मीर भी था'

उर्दू शायरी का नाम सुनते ही आज भी हमारे जेहन में जो चंद नाम सबसे पहले कौंधते हैं, उनमें मीर और ग़ालिब का ही खयाल आता है.

उर्दू शायरी को लोकप्रिय बनाने और सम्मान दिलाने का काम इन दोनों शायरों ने तब किया जब रेखता या उर्दू में की गई शायरी को नीची निगाह से देखा जाता था. तब यह कहा जाता था कि भला रोजमर्रा की जबान में भी कहीं शायरी की जाती है.

लेकिन इस रोजमर्रा की जबान में ही शायरी करके न जाने कितने शायर आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं. बेशक उर्दू शायरी में ग़ालिब को सबसे बड़ा शायर माना जाता है लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि अगर मीर ने उर्दू शायरी के पैमाने को ऊंचा न किया होता तो ग़ालिब के सामने कोई चुनौती नहीं होती.

ग़ालिब के लिए चुनौती थी मीर की शायरी

ग़ालिब बहुत कम शायरों की शायरी को अपने लिए चुनौती मानते थे. तभी तो मीर के लिए गालिब लिखते हैं-

रेख्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’ कहते हैं अगले जमाने में कोई ‘मीर’ भी था

मीर और ग़ालिब का जमाना लगभग एक ही था. मीर ग़ालिब से एक पीढ़ी पहले के शायर थे. मीर का इंतकाल 21 सितंबर, 1810 को हुआ था, तब ग़ालिब महज 13 साल के थे. उस वक्त ग़ालिब ने शायरी शुरू ही की थी और तब मीर की शायरी की मिसालें दी जाती थीं. मीर और ग़ालिब दोनों आगरा में पैदा हुए थे लेकिन दोनों को दिल्ली पसंद थी और ये दोनों खुद को दिल्ली का ही कहलाना पसंद करते थे. दोनों अपने-अपने जमाने में मुगल बादशाहों के खास शायर थे.

मीर के साथ यहां ग़ालिब की बात इसलिए की जा रही है क्योंकि जिन वजहों से हम ग़ालिब की शायरी को दाद देते हैं, उसकी मजबूत नींव मीर तकी मीर ने ही रखी थी.

ग़ालिब के यहां इश्किया शायरी के रूप में अपने जमाने की हकीकत को बयां करने की जो अदा मिलती है, उसके पहले उस्ताद मीर ही हैं.

मीर और दिल्ली

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मीर के समय में दिल्ली पर दो बार बाहरी हमले हुए. 1739 में नादिरशाह ने दिल्ली को बुरी तरह लूटा और फिर 1757 से 1761 तक अहमद शाह अब्दाली ने कई बार दिल्ली में लूटपाट की. इसमें मीर का घर भी लूटा गया. इस वजह से मीर को दिल्ली छोड़कर लखनऊ में बसना पड़ा लेकिन दििल्ली उनके दिल से निकली नहीं. दिल्ली में हुए इस कत्लोगारत और दिल्ली छोड़ने केे दर्द का सीधा असर मीर की शायरी पर देखा जा सकता है.

उस वक्त शायरी में सीधे-सीधे सामाजिक समस्याओं को बयां करने का चलन भले ही नहीं था लेकिन मीर ने अपनी शायरी में बड़ी खूबसूरती से इश्क, महबूब, दिल आदि के जिक्र के जरिए दिल्ली के इस दर्द को बयां किया है. उनके चंद अशआर देखिए:

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है यह नगर सौ मर्त्तबा लूटा गया। (मज़कूर: हाल, बयान)

या

उस के गए पे दिल की खराबी न पूछिए जैसे किसी का कोई नगर हो लूटा हुआ।

या

दिल वह नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके पछताओगे, सुनो हो, यह बस्ती उजाड़ कर।

या

दिल अजब शह्र था ख़यालों का लूटा-मारा है हुस्न वालों का

मीर की प्रसिद्ध ग़ज़ल- ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है’, आज भी इस वजह से काफी लोकप्रिय है क्योंकि इसके जरिए लोग सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का हाल इशारों ही इशारों में कह देते हैं.

मीर की शायरी में इश्क के रंग

दरअसल मीर की शायरी में जो कैफियत है वो बहुत कम शायरों के यहां है. इनके यहां इश्क का हर रंग मौजूद है. मीर की शायरी में इश्क इतना गहरा है कि यहां लैंगिक प्रेम, मानव जाति से प्रेम और ख़ुदा से प्रेम, तीनों मिलकर एक हो जाते हैं. इनके यहां जितने महबूब के जलवे हैं उतने ही इश्क के रूप हैं.

मीर की शायरी में बयां इश्क की गहराई को समझने के लिए 1982 में बनी बाजार फिल्म का यह गाना ‘दिखाई दिए यूं कि बेखुद किया’ सुनिए. इस ग़ज़ल को मीर ने 18 वीं सदी में लिखा था पर इसकी गहराई आज भी बरकरार है.

इस्लामी रिवाजों और तौर-तरीकों को न मानने के जो आरोप ग़ालिब के ऊपर लगे थे, उनसे कई साल पहले कुछ ऐसे ही आरोप मीर पर भी लग चुके थे. दोनों ने अपनी शायरी में अपने-अपने अंदाज में इसका जवाब दिया है. या यूं कहें कि ऐसी बातों का जवाब देने के लिए ग़ालिब जो अंदाजे बयां अपनाया था, वह उन्होंने शायद मीर से ही सीखा था. इसके लिए मीर के ये शेर देखिए:

किसका काबा, कैसा क़िब्ला, कौन हरम है, क्या अहराम कूचे के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया।

XXX XXX

‘मीर’ के दीनो-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो क़श्क़ा खेंचा दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया।

(क़िब्ला- मक्के की वह जगह जहां काला पत्थर है और जिसकी ओर मुंह करके मुसलमान नमाज पढ़ते हैं. अहराम- बूढ़े लोग. क़श्क़ा- तिलक. दैर- मंदिर. तर्क- छोड़ना.)

इस बात को कहने और मानने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि जिस साझी विरासत और संस्कृति की आज बात हो रही है, उसे बनाने में मीर और उनकी शायरी का एक खास योगदान है.

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