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पुण्यतिथि विशेष: 'जुबली कुमार' बनने के लिए राजेश खन्ना ने खरीदा था उनका बंगला

राजेंद्र कुमार जुबली कुमार थे. उनके बंगले में ही रहकर राजेश खन्ना सुपरस्टार बने.

Avinash Dwivedi | Published On: Jul 12, 2017 02:06 PM IST | Updated On: Jul 12, 2017 02:07 PM IST

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पुण्यतिथि विशेष: 'जुबली कुमार' बनने के लिए राजेश खन्ना ने खरीदा था उनका बंगला

बात उन दिनों की है, जब राजकपूर संगम बना रहे थे और सिर्फ दिलीप कुमार को 'गोपाल' के रोल में लेना चाहते थे. इसका कारण ये था कि वो दिलीप कुमार के साथ महबूब खान की फिल्म 'अंदाज' में काम कर चुके थे और उनकी क्षमताओं से परिचित थे. किसी दूसरे को वो इस फिल्म के त्रिकोणीय प्रेम वाले रोल में फिट नहीं मानते थे. पर दिलीप कुमार ने इस रोल के लिए मना कर दिया.

ऐसे में इस रोल के लिए जब नए सिरे से खोज शुरू हुई तो राजकपूर को अपने दोस्त राजेंद्र कुमार की याद आई, जो धीरे-धीरे इंडस्ट्री में पांव जमा रहे थे. इस तरह से 'संगम' का ये यादगार रोल राजेंद्र कुमार को मिला.

आगे जाकर राजेंद्र कुमार और राजकपूर की दोस्ती काफी गहरी हो गई. इतनी कि दोनों ने इसे रिश्तेदारी में बदलने की कोशिश की. राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव और राज कपूर की बेटी रीमा की सगाई हो गई. लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था. इन दोनों का ये रिश्ता ज्यादा लंबा नहीं चल सका और जल्द ही ये सगाई टूट गई.

राजेंद्र कुमार का असली नाम आर के तुली था और वो सियालकोट में जन्मे थे. राजेंद्र कुमार ने विभाजन के दौरान का कठिन वक्त झेला था. इसके बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया. जहां से वो सिनेमा में इंट्रेस्ट होने के चलते मुंबई आ गए. कहा जाता है उन्होंने दिल्ली से मुंबई आने के टिकट का इंतजाम अपनी कलाई घड़ी बेचकर किया.

1950 में 21 साल की उम्र में राजेंद्र कुमार को पहला ब्रेक फिल्म 'जोगन' से मिला. राजेंद्र कुमार हीरो नहीं बनना चाहते थे इसलिए उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करना शुरू किया. हालांकि बाद में एक्टिंग के ऑफर भी आए, जिन्हें राजेंद्र कुमार ने मना नहीं किया.

राजेंद्र कुमार ने काट ली एक्ट्रेस अमृता सिंह की फीस

एक्टर के रूप में राजेंद्र कुमार की पहली फिल्म 'वचन' के प्रीमियर के समय जब उनसे पूछा गया कि उनकी जान-पहचान वाले कितने लोगों के लिए सीट्स रखी जाएं? तो उन्होंने थोड़ा सोचकर बोल दिया- 10. दरअसल राजेंद्र को लगा कि ये मुफ्त में है लेकिन जब बाद में फिल्म प्रोड्यूसर के अकाउंटेट ने उन्हें फीस में रुपए कम कर के दिए तब उनको जानकारी हुई कि प्रीमियर सीटें मुफ्त में नहीं मिली थीं.

फिल्म नाम में संजय दत्त और अमृता सिंह.

फिल्म नाम में संजय दत्त और अमृता सिंह.

इस घटना को उन्होंने एक महत्वपूर्ण सीख माना और प्रिंसिपल ऑफ प्रॉडक्शन के रूप में अपनाया. और आगे जाकर जब उन्होंने फिल्म 'नाम' बनाई, उस वक्त एक्ट्रेस अमृता सिंह की फीस में इसलिए कटौती की क्योंकि अमृता ने शूटिंग के दौरान हॉन्ग-कॉन्ग लंबी-लंबी फोन कॉल्स की थीं.

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खैर, राजेंद्र कुमार एक्टर के रूप में अब फिल्में करने लगे थे और 1957 में आई महबूब खान की फिल्म 'मदर इंडिया' ने उन्हें बहुत ख्याति दिलाई. इस फिल्म के दौरान ही उनकी दोस्ती सुनील दत्त से हुई. ये दोस्ती इतनी गहरी रही कि आगे चलकर दोनों कलाकार समधी बने. राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव की शादी, सुनील दत्त की बेटी नम्रता से हुई.

जब राजेंद्र कुमार से बन गए 'जुबली कुमार'

'मदर इंडिया' के बाद का वक्त, वो वक्त था जब राजेंद्र कुमार जम चुके थे पर उनका करिश्मा दिखाना बाकी था. ऐसे में 1959 से 1963 तक राजेंद्र कुमार ने जो भी फिल्म साइन की, उसका हिट होना निश्चित था. खासकर 1963 से 1966 के बीच, जब उनकी फिल्मों की सफलता का रेट 100 फीसदी रहा. राजेंद्र कुमार की कई फिल्में आईं और लगातार 25 हफ्तों तक सिनेमाघरों में लगी रहीं. इसी कारनामे के चलते उन्हें 'जुबली कुमार' का खिताब मिला. राजेंद्र कुमार ने संजीदगी भरा रोमांस पर्दे पर दिखाया और ये अंदाज लोगों को खूब भाया.

राजेंद्र कुमार की सबसे यादगार फिल्में 'मदर इंडिया', 'धूल के फूल', 'दिल एक मंदिर', 'ससुराल', 'घराना', 'प्यार का सागर', 'मेरे महबूब', 'आई मिलन की बेला', 'संगम', 'आरजू', 'सूरज', 'अनजाना', 'गीत' आदि हैं.

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राजेंद्र कुमार ने फिल्मों को लेकर बड़ी ही बुद्धिमानी से फैसले लिए और इस वजह से लंबे वक्त तक इंडस्ट्री में प्रासंगिक बने रहे. राजेंद्र कुमार के साथ साधना को 'मेरे महबूब' फिल्म ऑफर हुई थी. साधना स्क्रिप्ट से संतुष्ट नहीं थीं. असमंजस में थीं. ऐसे वक्त में उन्हें विश्वास दिलाया गया कि जब 'जुबली कुमार' ने फिल्म साइन कर दी है तब स्क्रिप्ट में दम जरूर होगा, वो चिंता ना करें. राजेंद्र कुमार की चयन क्षमता पर लोगों को इतना विश्वास था. सफलता को राजेंद्र कुमार ने कभी सर चढ़ने ना दिया. यही वजह रही कि जब उन्हें लीड रोल मिलने बंद हो गए तो उन्होंने कैरेक्टर रोल करने शुरू कर दिए. साथ ही प्रोड्यूसर बन गए.

लव स्टोरी में कुमार गौरव. ये फिल्म उस वक्त बहुत हिट रही थी.

लव स्टोरी में कुमार गौरव. ये फिल्म उस वक्त बहुत हिट रही थी.

उन्होंने अपने बेटे कुमार गौरव की 1981 में आई फिल्म 'लव स्टोरी' में सफलतापूर्वक लांचिंग की. उन्होंने एक और सफल फिल्म 'नाम' भी प्रोड्यूस की. इसमें उनके बेटे के साथ संजय दत्त भी थे. कहा जाता है कि 12 जुलाई, 1999 को जब राजेंद्र कुमार की मौत हुई तो वो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे अमीर आदमियों में से एक थे. इसके पीछे कारण उनका बहुत ज्यादा पैसा लेना ना होकर, खूब सोच समझकर किए गए इंवेस्टमेंट थे.

आशा पारेख को कहा करते थे 'भाग्यलक्ष्मी'

'गूंज उठी शहनाई' (1959) में राजेंद्र कुमार के साथ आशा पारेख काम कर रही थीं. ये उनकी पहली फिल्म थी. कुछ दिनों की शूटिंग के बाद डायरेक्टर ने पारेख को ये कहते हुए निकाल दिया कि वो स्टार मैटेरियल नहीं हैं. आशा पारेख की जगह अमिता को फिल्म में हीरोइन रख लिया गया. अमिता ने रोल पाने के लिए रोल के लिए आधे ही पैसे लिए. जल्द ही डायरेक्टर नासिर हुसैन ने अपनी फिल्म 'दिल देके देखो' (1959) में आशा पारेख को अभिनेत्री बनने का मौका दिया.

इस फिल्म ने आशा पारेख को बहुत बड़ा स्टार बना दिया. दो साल बाद आशा पारेख ने राजेंद्र कुमार के साथ 'घराना' नाम की फिल्म में काम किया. फिल्म बहुत बड़ी हिट रही. इसके बाद से राजेंद्र कुमार आशा पारेख को 'भाग्यलक्ष्मी' कहा करते थे क्योंकि उन्होंने आशा पारेख को एक फ्लॉप हीरोइन से तुरंत एक स्क्रीन आइकन बनते देखा था.

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एक बंगले से निकले सदी के दो महान स्टार

जैसा बताया गया कि विभाजन के वक्त राजेंद्र कुमार पाकिस्तान से रिफ्यूजियों की तरह दिल्ली आए और वहां से बम्बई. ऐसे में उन्हें अपनी सियालकोट वाली कोठी की याद अक्सर सताती रहती. इसलिए उन्हें तय कर लिया था कि एक बड़ा घर बनाएंगे ताकि अपने परिवार के खोए सम्मान को वापस ला सकें. उस वक्त राजेंद्र कुमार फिल्म इंडस्ट्री में धीरे-धीरे जमने में लगे हुए थे जब उन्हें कार्टर रोड के एक बंगले के बारे में पता चला. पर उस वक्त उनके पास उसे खरीदने भर के पैसे नहीं थे. ऐसे में बीआर चोपड़ा सामने आए और उन्होंने राजेंद्र कुमार को उनकी फिल्म कानून सहित दो और फिल्मों के लिए एडवांस पेमेंट दे दी.

राजेंद्र कुमार को कई लोगों ने डरा रखा था कि ये बंगला भुतहा है पर राजेंद्र कुमार ने कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने बंगले को खरीदा, उसका नाम 'डिंपल' रखा और बंगले में रहने लगे. इसी बंगले में रहने के दौरान उन्होंने 'जुबली कुमार' बनने का दौर देखा.

राजेश खन्ना ने राजेंद्र कुमार का बंगला खरीद लिया था.

राजेश खन्ना ने राजेंद्र कुमार का बंगला खरीद लिया था.

बाद में यही बंगला उन्होंने इंडस्ट्री में नए आए राजेश खन्ना को बेच दिया. राजेश खन्ना का पूरा विश्वास था कि अगर वो इस बंगले को खरीदने में कामयाब हो जाएं तो जुबली कुमार की सफलता भी उनकी ओर खिंची चली आएगी. और ये वाकई अविश्वसनीय है कि राजेश खन्ना ने भी अपने अंदाज में राजेंद्र कुमार जैसी ही सफलता को पर्दे पर दोहराया. लगातार 15 हिट फिल्में दीं और इंडस्ट्री के पहले सुपरस्टार कहलाए. राजेश कुमार, राजेंद्र कुमार की एक स्टार के रूप में बनाई गई सारी ऑडियंस अपनी तरफ खींचने में सफल रहे.

आखिरी वक्त में कैंसर का पता चलने के बाद भी राजेंद्र कुमार ने किसी तरह की दवा लेने से इंकार कर दिया था. जिसके चलते 12 जुलाई, 1999 को उनकी मौत हो गई. 1 दिन बाद ही उनके बेटे कुमार गौरव का 39वां जन्मदिन था और 8 दिन बाद खुद उनका.

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2006 में राजेंद्र कुमार की बेटी डिंपल ने घोषणा की थी कि वह अपने पिता पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाएंगी. इस डॉक्यूमेंट्री में उनके पिता की मौत से पहले का एक इंटरव्यू होगा. लेकिन बाद में रीमा ने ये डॉक्यूमेंट्री रिलीज नहीं की और ना ही राजेंद्र कुमार के इंटरव्यू की फुटेज आजतक रिलीज हुई है. अगर वो इंटरव्यू सामने आए तो हमें जुबली कुमार के व्यक्तित्व के और पहलुओं के बारे में जानकारी मिलेगी.

दरअसल, राजेंद्र कुमार विजनरी थे. उन्होंने अपने प्रोडक्शन में या दूसरों को रिकमेंड करके राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, राकेश रोशन, महेश भट्ट, डेविड धवन, गायक अमित कुमार, पंकज उधास और हिमेश रेशमिया के करियर को स्थापित करने में मदद की. ये सारे ही नाम आज एक मुकाम रखते हैं. साथ ही सलीम-जावेद की जोड़ी टूटने के बाद सलीम खान को 'नाम' के लेखक के रूप में फिर से स्थापित होने में मदद की. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान सलमान के भी कुमार गौरव से भाई सरीखे संबंध हो गए थे. सलमान जो तब एक उभरते मॉडल हुआ करते थे, आज भी उस वक्त को याद करते हैं.

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