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पुण्यतिथि विशेष: जॉनी वाकर के बिना हर महफिल अधूरी ही रहेगी...

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी को गुरुदत्त ने जॉनी वाकर का नाम दिया

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jul 29, 2017 06:44 PM IST

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पुण्यतिथि विशेष: जॉनी वाकर के बिना हर महफिल अधूरी ही रहेगी...

शराब की महफिल अगर जॉनी वाकर के बिना अधूरी है तो हंसी की महफिल भी जॉनी वाकर के बिना अधूरी है. हिंदी सिनेमा में एक से बढ़कर एक हास्य कलाकार आए लेकिन जॉनी वॉकर की हस्ती कभी मिट न सकी. उनका आगाज ही इतना हंसोड़ था कि गंभीर फिल्में बनाने वाले महान फिल्मकार गुरुदत्त भी बिना ठहाका लगाए नहीं रह सके.

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी को गुरुदत्त ने ही जॉनी वाकर नाम दिया. ये नाम हिंदी सिनेमा में न सिर्फ मुस्कान बल्कि सम्मान की पहचान भी बना. करीब पांच दशकों में हिंदी सिनेमा को 300 फिल्में देने वाले जॉनी वाकर की आज पुण्यतिथि है. इस हास्य कलाकार की कायनात इतनी बड़ी है कि इसमें हिंदी सिनेमा की एक मुश्त उम्र समा चुकी है.

गुरुदत्त ने ही जॉनी वाकर को असली ब्रेक अपनी फिल्म बाज़ी से दिया. फिल्म की कहानी में एक शराबी के किरदार के लिए उन्होंने जॉनी वाकर को चुना. जॉनी वाकर के अभिनय ने बिना शराब पिए ही उस किरदार को जीवंत कर दिया.

उसके बाद जॉनी वाकर और गुरुदत्त का कई फिल्मों में साथ रहा. सीआईडी, प्यासा, कागज के फूल, मिस्टर एंड मिसेज पचपन, आर-पार और चौदहवीं का चांद जैसी फिल्में सुपर हिट रहीं.

लेकिन बालीवुड में बदरुद्दीन काजी को एंट्री दिलाई बलराज साहनी ने. दरअसल जॉनी वाकर का पूरा परिवार इंदौर में रहता था. पिता मिल में नौकरी करते थे. साल 1942 में मिल बंद हो जाने के बाद पूरा परिवार मुंबई आकर बस गया. दस भाई बहनों में जॉनी वाकर दूसरे नंबर पर थे. उनके ऊपर भी परिवार की जिम्मेदारी पिता के समान ही थी.

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मुंबई में जॉनी वाकर नौकरी के लिये दरबदर की ठोकरें खाते थे. कई जगह किस्मत आजमाई लेकिन काम बन नहीं सका. एक बार उनके पिता ने किसी पुलिस इंस्पेक्टर की सिफारिश से उन्हें बस कंडक्टर की नौकरी दिला दी. बस कंडक्टर की नौकरी से जॉनी वाकर को 26 रुपए महीने की सैलरी मिलती थी.

जॉनी वाकर भी उस नौकरी से बेहद खुश थे क्योंकि इसके जरिये उन्हें मुंबई के स्टूडियो भी घूमने का मौका मिल जाता था. दरअसल उनकी असली हसरत फिल्मों में काम करने की थी. उनके भीतर का कलाकार उन्हें बार-बार मुंबई स्टूडियो खींच कर ले आता था. लेकिन तमाम कोशिश बेकार ही रहीं. एक दिन उनकी मुलाकात मशहूर डायरेक्टर के आसिफ के सचिव रफीक से हुई. रफीक ने उनकी गुजारिश पर उन्हें फिल्म ‘आखिरी पैमाने’ में छोटा सा रोल दिला दिया. कहते हैं कि उस छोटे से रोल से उनकी 80 रुपए की कमाई हुई.

लेकिन जॉनी वाकर की किस्मत ने कुछ और ही सोच रखा था. उनके भीतर का कलाकार हिंदी सिनेमा में गेस्ट अपीयरेंस के लिये नहीं तैयार था. उनकी तकदीर की स्क्रिप्ट लिखी बलराज साहनी ने. बलराज साहनी ने उन्हें गुरुदत्त के पास भेजा. गुरुदत्त ने इस मासूमियत और शरारत के काकटेल चेहरे में जॉनी वाकर व्हिस्की के सुरूर को पहचान लिया.

जॉनी वाकर ने गुरुदत्त के सामने शराबी की एक्टिंग की थी. उसे देख गुरुदत्त को लगा कि वाकई में वह शराब पीए हुए हैं जिससे वो काफी नाराज भी हुए थे. लेकिन जब उन्हें असलियत पता चली तो उन्होंने जॉनी वाकर को गले लगा लिया.

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गुरुदत्त ने कभी सोचा नहीं होगा कि बदरुद्दीदन जमालुद्दीन काजी को उनका दिया नाम जॉनी वाकर इतना मशहूर कर देगा कि हिंदी सिनेमा में उनका अभिनय हमेशा के लिये अमर हो जाएगा.

जॉनी वाकर की अदायगी के लोग इतने कायल होते थे कि तकरीबन हर फिल्म में एक गाना इनके ऊपर जरूर फिल्माया जाता था.

फिल्म सीआईडी का गाना ए दिल है मुश्किल जीना यहां......न सिर्फ मुंबई बल्कि पूरे देश में लोगों के दिलों में उतर गया था.

फिल्म प्यासा का गाना , सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए ....आज भी लोगों की जुबान पर पुराने जायके की तरह जमा हुआ है. आज के दौर के कई विज्ञापनों में इस गाने की धुन और थीम का नए अंदाज में इस्तेमाल किया गया है. कहा जाता है कि निर्माता और फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर की डिमांड पर फिल्म में एक गाना जॉनी वाकर पर जरूर फिल्माया जाता था.

जॉनी वाकर के हास्य अभिनय के दर्शक समेत बालीवुड भी कायल था. बड़े-बड़े निर्माता निर्देशकों ने उन्हें अपनी फिल्म में रोल दिया. फिल्म जाल, हमसफर, नया दौर, मुगले आजम, मेरे महबूब, बहू बेगम, मेरे हुजूर, टैक्सी ड्राइवर, देवदास, मधुमति, नया अंदाज जैसी सुपरहिट फिल्मों में उनकी अदायगी ने जलवा बिखेरा. नामचीन कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद जॉनी वाकर की पर्दे पर एन्ट्री का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार रहता था.

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फिल्म अानंद में राजेश खन्ना के साथ जॉनी वॉकर

धीरे-धीरे जॉनी वाकर ने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया था. 90 के दशक में फिल्म चाची 420 में उन्होंने गुलजार और कमल हासन के बहुत जोर देने पर काम किया था. जॉनी वॉकर को दो बार फिल्म फेयर अवार्ड मिला. लेकिन पांच दशकों के सफर में उन्होंने करोड़ों दर्शकों के दिल कई बार जीते.

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में 11 नवम्बर 1923 को जन्मे जॉनी वाकर ने 29 जुलाई 2003 को आखिरी सांस भरी. रील लाइफ में अपनी अदाकारी से सबको हंसाने वाला एक महान कलाकार रियल लाइफ में सबको रुला कर चला गया.

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