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पुण्यतिथि विशेष : लाखों फैंस के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे ‘याहू बॉय’ शम्मी कपूर

शम्मी कपूर फिल्म के हिट होने की गारंटी बन चुके थे कि निर्माता-निर्देशक नई हीरोइनों को लॉन्च करने के लिए उनकी फिल्म का ही सहारा लेते थे

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Aug 14, 2017 08:26 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष : लाखों फैंस के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे ‘याहू बॉय’ शम्मी कपूर

किसी के लिए ‘जंगली’ तो किसी के लिए ‘रिबेलियन’ थे, तो कोई उन्हें ‘पगला कहीं का’ कहता था. उस शख्स की कायनात ही इतनी बड़ी थी कि हर तंज में हर रंग में हर रूप में वो अलहदा था. वो दिलों पर राज करता था. संगीत उनकी थिरकन के बिना अधूरा था. रोमांस उनकी भावनाओं में डूबी आंखों के बिना सूना था. पर्दे पर जोश, जवानी, उमंग और उत्साह का एक ही नाम था – शम्मी कपूर.

1950 और 60 के दशक का ये सुपरस्टार 14 अगस्त, 2011 को दुनिया को अलविदा कह गया. लेकिन लाखों फैन्स के दिलों में आज भी शम्मी कपूर जिंदा हैं अपनी यादों के साथ.

शम्मी कपूर के ‘याहू बॉय’ बनने की कहानी साल 1957 में नासिर हुसैन की फिल्म ‘तुम सा नहीं देखा’ से शुरू होती है. यह वही दौर था जब हिंदी सिनेमा को मशहूर एल्विस प्रेस्ले का भारतीय संस्करण मिला. यह प्रयोग था शम्मी कपूर पर. शम्मी कपूर इस प्रयोग को अपना कर छा गए.

परिवार के दबाव में शम्मी कपूर संघर्ष को मजबूर थे 

इससे पहले सिनेमाई परिवार की विरासत के दबाव में शम्मी कपूर संघर्ष को मजबूर थे. पिता पृथ्वीराज कपूर तो भाई राज कपूर का दबाव उन पर हावी था. उन्हें तलाश एक अलग पहचान बनाने की थी. शुरुआत में जीवन ज्योति, रेल का डिब्बा, चोर बाजार, हम सब चोर हैं, मेम साहब और मिस कोका कोला जैसी फिल्में तो मिलीं लेकिन शम्मी को अलग पहचान नहीं दिला सकीं.

नासिर हुसैन की फिल्म ‘तुम सा नहीं देखा’ ने शम्मी कपूर को री-डिस्कवर किया जिसके बाद हिंदी सिनेमा को रोमांस का नया बादशाह मिल गया. नासिर हुसैन और शम्मी कपूरी की जोड़ी बन गई. इसने साल 1959 में ‘दिल देके देखो’ के रूप में एक और सुपरहिट फिल्म दी. लेकिन शम्मी कपूर के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साल 1961 रहा. पहली रंगीन रोमांटिक फिल्म ‘जंगली’ उनके हिस्से में आई. यहां से 'याहू बॉय' ने अपने करियर की नई उड़ान भरी.

इसके बाद शम्मी कपूर की कई फिल्में हिट पर हिट होती चली गईं. कश्मीर की कली, जानवर और पगला कहीं का जैसी शानदार फिल्मों में उनके अभिनय के अलावा उनके मस्ती से भरे डांस की शंकर-जयकिशन जैसे संगीतज्ञों और महान गायक मोहम्मद रफी के साथ जुगलबंदी लोगों को दीवाना कर गई.

रफी साहब खास तौर पर शम्मी कपूर के लिये ही अलग अंदाज में गाना गाते थे. वहीं शंकर जयकिशन जैसे संगीतज्ञ शम्मी के किरदार को ध्यान में रखकर संगीत की धुन बनाते थे. बाद में आर डी बर्मन ने शम्मी के अंदाज को देखकर नए प्रयोग किये. तीसरी मंजिल एक क्राइम-थ्रिलर फिल्म थी जिसमें देवानंद काम करने वाले थे. लेकिन देवानंद के व्यस्त होने की वजह से शम्मी कपूर को फिल्म में मौका मिला.

दिलचस्प ये रहा कि इस फिल्म के संगीत के लिये शंकर-जयकिशन की जगह आरडी बर्मन को शम्मी कपूर की वजह से मौका मिला. फिल्म सुपरहिट रही. फिल्म के संगीत ने न सिर्फ शम्मी कपूर को कामयाबी की ऊंचाई पर पहुंचा दिया बल्कि आशा पारिख और हेलन भी दर्शकों के दिलों में छा गईं. आरडी बर्मन का संगीत इस फिल्म की वजह से सुपरहिट हो चुका था.

नई हीरोइनों को लॉन्च करने के लिए उनकी फिल्म का सहारा लेते थे

शम्मी कपूर फिल्म के हिट होने की इतनी बड़ी गारंटी बन चुके थे कि निर्माता-निर्देशक नई हीरोइनों को लॉन्च करने के लिए उनकी ही फिल्म का सहारा लेते थे. सायरा बानो को फिल्म जंगली से एंट्री मिली तो आशा पारिख को फिल्म दिल दे देखो से मौका मिला. जबकि साधना को फिल्म राजकुमार ने पहचान दिलाई तो शर्मिला टैगोर को कश्मीर की कली जैसी फिल्म ने स्टार बना दिया.

शम्मी कपूर पर्दे के देवदास नहीं थे और न ही वो चार्ली चैप्लिन की मासूमियत को अपने अभिनय में उतारते थे. शम्मी कपूर हंसाते भी थे तो रुलाते भी थे. उन पर फिल्माए गीतों ने जोश भरा तो तन्हाई का दर्द भी समेटा. फिल्म ब्रह्मचारी में उन्होंने संवेदनशील भूमिका निभाई.

दर्शकों के लिये शम्मी की फिल्म का मतलब न सिर्फ रोमांटिक कहानी बल्कि गुनगुनाने वाले गीत और थिरकने वाला संगीत होता था. कभी बर्फ की पहाड़ियों से फिसलने वाला एक मासूम सा चेहरा अपनी देह की थिरकन के साथ संगीत की जुगलबंदी करता. तो कभी गीत के एक-एक शब्द को अपनी नशीली आंखों में उतार कर कश्मीर की डल झील में रोमांस के गोते लगाता.

जहां एक तरफ शम्मी कपूर की सिनेमाई जिंदगी हर रंग से गुलजार हो रही थी तो वहीं उनकी निजी जिंदगी में दर्द सांस भर रहा था. साल 1965 में उनकी पत्नी गीता बाली का निधन हो गया. गीता बाली से उन्होंने लव मैरिज की थी. दोनों ने पहले मंदिर में छिपकर शादी कर ली थी. बाद में कपूर खानदान में इस प्रेम विवाह को मंजूरी मिली. गीता बाली के निधन से शम्मी कपूर टूट से गए. परिवार के दबाव और छोटे बच्चों की वजह से भावनगर की रॉयल फैमिली की नीला देवी के साथ शम्मी कपूर ने चार साल बाद दूसरी शादी की.

आखिरी बार बतौर हीरो अंदाज फिल्म में दिखाई दिए

शम्मी कपूर आखिरी बार बतौर हीरो रमेश सिप्पी की फिल्म अंदाज में हेमा मालिनी के साथ दिखाई दिए. उसके बाद धीरे-धीरे वो फिल्मों में चरित्र अभिनेता के किरदार में दिखाई देने लगे. उनके अभिनय की श्रेष्ठता हर किरदार को जीवंत कर जाती थी. छोटा सा रोल भी शम्मी की वजह से यादगार बन जाता था. 50 और 60 के दशक का ये सितारा हिंदी सिनेमाई के सफर में मील का पत्थर साबित हुआ. आज भी शम्मी कपूर के अंदाज को कोई न तो भुला पाया है और न भुला सकेगा क्योंकि याहू एक संगीत की तरह फैन्स के दिलों में गूंज रहा है.

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