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निर्भया फैसला: एक बार फिर याद आ गई 1982 में रंगा-बिल्ला की फांसी की कहानी

गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा हत्याकांड के मामले में 1982 में रंगा और बिल्ला को फांसी पर लटकाया गया था

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: May 08, 2017 07:48 AM IST

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निर्भया फैसला: एक बार फिर याद आ गई 1982 में रंगा-बिल्ला की फांसी की कहानी

गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा हत्याकांड के मामले  में 1982 में रंगा और बिल्ला को फांसी पर लटकाया गया था. वह मामला भी लगभग निर्भया कांड जैसा ही था.

सन् 1982 की बात है. सेल से फांसी घर जाते समय बिल्ला तो चुप और उदास था, पर रंगा की हालत अत्यंत खराब थी. उसके चेहरे पर मौत का आतंक था.

निर्भया कांड की ही तरह हुई थी बर्बरता

निरंतर रो रहे रंगा को घसीटते हुए सेल से फांसी घर तक ले जाया गया. पर तब उसे इस हश्र  की कल्पना तक नहीं थी जब उसने  बिल्ला के साथ मिलकर दिल्ली की छात्रा गीता चोपड़ा के साथ बलात्कार किया और उसे उसके छोटे भाई संजय चोपड़ा के साथ ही बेरहमी से चाकुओं से गोद कर मार डाला था.

इन लोगों ने लाश को झाड़ी में फेंक दिया था. लाश तीन दिन बाद उस समय मिली जब एक घास काटने वाला उधर गया था.

दिल्ली की निर्भया के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों को भी अपराध से पहले इस बात का तनिक भी आभास नहीं रहा होगा कि एक दिन उनका भी वही हश्र होने वाला है.

क्या भविष्य में ऐसे दुष्कर्म की योजना बना रहे अपराधी इन घटनाओें से कोई सबक लेंगे?

मरने से पहले जमकर लड़े गीता और संजय

geeta chopra-sanjay chopra

गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा

 26 अगस्त 1978 की बात है. भारतीय नौ सेना के कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की संतानें उस दिन आकाशवाणी में युववाणी प्रोग्राम में शामिल होने के लिए घर से निकली थी कि वे रंगा-बिल्ला नामक दो अपराधियों के हाथ चढ़ गईं.

चोरी की कार लेकर निकले ये दो पेशेवर अपराधी किसी शिकार की तलाश में निकले थे. नई दिल्ली के गोल डाकखाना के पास संजय और गीता ने उनसे लिफ्ट मांगी. उसने उन्हें बिठा लिया.

पहले तो बिल्ला-रंगा ने तय किया कि अच्छी खासी फिरौती वसूलेंगे क्योंकि ये अमीर घर के लगते हैं. पर इस बीच उसकी कार एक बस से टकरा कर क्षतिग्रस्त हो गई. इसके बाद उन लोगों ने अपना प्लान बदल लिया.

एक बात और हो गई. जब इन बच्चों को लगा कि वे फंस गए हैं तो उन लोगों ने कार को रोकने के लिए रंगा-बिल्ला से चलती कार में ही उलझना शुरू कर दिया. इसे सड़क पर चल रहे कुछ लोगों ने देखा था.

फिर रंगा-बिल्ला ने एक सुनसान स्थान में ले जाकर गीता के साथ बलात्कार किया. इस बीच संजय ने अपनी जान की बाजी लगा कर अपनी बहन को बचाने की कोशिश की. पर अपराधियों ने पहले उसे मार दिया. गीता की भी हत्या करके लाश को एक झाड़ी में फेंक दिया.

बेरहम अपराधियों को अदालत से नहीं मिली रहम

तस्वीर: रंगा और बिल्ला (साभार Rediff.com)

तस्वीर: रंगा और बिल्ला (साभार Rediff.com)

इन अपराधियों ने कार में कई सबूत छोड़े थे और सड़क पर कई गवाह. गीता चोपड़ा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह पता चला कि उसके साथ बलात्कार हुआ था. अंततः उन्हें दिल्ली के एडिशनल सेसन जज ने फांसी की सजा सुना दी. उसके खिलाफ अपील की गई.

दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे 1979 में नामंजूर कर लिया. उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. प्रसिद्ध वकील आर.के गर्ग ने रंगा-बिल्ला की वकालत की. पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये पेशेवर हत्यारे हैं और इनके प्रति दया नहीं दिखाई जा सकती.

कुलदीप सिंह उर्फ रंगा और जसवीर सिंह उर्फ बिल्ला को 1982 में फांसी पर लटका दिया गया. इससे पहले उसका केस निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. अंततः सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने फांसी की सजा को बहाल रखा.

यूं पकड़े गए थे रंगा-बिल्ला

गीता-संजय की जघन्य हत्या के बाद तब भी यह कहा गया था कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब है और इसका मुख्य कारण जनता पार्टी सरकार में आंतरिक कलह है. पर इसके बाद न जाने इस तरह के कितने वारदात हुए, पर दिल्ली पुलिस की स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही.

निर्भया के साथ हुई जघन्य घटना की तरह ही सन् 1978 में भी मीडिया में बड़ा शोर हुआ था. पुलिस व्यवस्था में सुधार के वायदे किए गए. पर, पुलिस की स्थिति नहीं सुधरी.

इस कांड में भी पुलिस की लापरवाही देखिए. 26 अगस्त 1978 को वारदात करने के बाद रंगा बंबई चला गया था. वहां भी उसने अपराध किए. बाद में वह दिल्ली आकर अपने साथी बिल्ला के साथ आगरा गया.

आगरा से लौटते समय ट्रेन में सैनिकों से मारपीट भी कर ली. सैनिकों ने इन्हें पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया. इस तरह पुलिस ने अपनी पीठ थपथपाई.

उस वक्त भी था एक बेबस पिता

मदन मोहन चोपड़ा नई दिल्ली के धौला कुआं में रहते थे. उनकी 17 वर्षीया बेटी गीता चोपड़ा दिल्ली के जीसस एंड मेरी कालेज मेंं द्वितीय वर्ष की छात्रा थी. बेटा संजय चोपड़ा माॅडर्न स्कूल में दसवीं का छात्र था.

वे उस दिन शाम में करीब सवा छह बजे आकाशवाणी केंद्र के लिए घर से निकले. उन्हें वहां युववाणी कार्यक्रम में शामिल होना था. इधर उनके पिता रेडियो सुन रहे थे.

जब उस कार्यक्रम में गीता-संजय को नहीं सुना तो उन्हें लगा कि शायद किसी कारणवश प्रोग्राम स्थगित हो गया होगा.

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मदन मोहन चोपड़ा अपने स्कूटर से आकाशवाणी भवन पहुंचे जहां से अपने बच्चों को उन्हें घर लाना था. पर गेट पर बच्चे नहीं थे. उन्हें चिंता हुई. उन्होंने घर लौटकर अपने दोस्तों और परिचितों के यहां फोन किए, पर वहां भी बच्चों का कुछ पता नहीं चला.

फिर उन्होंने करीब रात सवा दस बजे पुलिस को सूचित किया. उससे पहले उन्होंने पास  के अस्पताल में जाकर भी पता लगाया था कि कहीं उनके बच्चों का एक्सीडेंट तो नहीं हो गया है.

राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज करने में देर नहीं की

इस सनसनीखेज केस को लेकर पुलिस और अदालत ने भरसक जल्दीबाजी की. राष्ट्रपति ने भी दया की अपील पर जल्दी ही फैसला कर दिया था.

याद रहे कि माॅडर्न स्कूल के छात्रों के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति एन.संजीव रेड्डी से मुलाकात भी की थी और जल्द अपराधियों को सजा दिलाने की मांग की थी.

उम्मीद की जानी चाहिए  कि निर्भया के केस में भी राष्ट्रपति महोदय के यहां कोई दया नहीं होगी, यदि दया याचिका दायर की जाती है तो.

ऐसी घटनाओं ने सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था को ठीक-ठाक करने की जरूरत एक बार फिर से बढ़ा दी है.

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