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चेस्टर बेनिंग्टन: सफलता भी बनती है आत्महत्या की वजह

हिंदुस्तान की ग्लैमर इंडस्ट्री में लड़कियों की खुदकुशी की तादाद ज़्यादा है, पश्चिम में ये आंकड़ा लड़कों की तरफ झुका हुआ है

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jul 22, 2017 12:10 PM IST

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चेस्टर बेनिंग्टन: सफलता भी बनती है आत्महत्या की वजह

लिंकिन पार्क बैंड के म्यूजीशियन चेस्टर बेनिंग्टन ने खुदकुशी कर ली. अगर आप रॉक संगीत में थोड़ा सा भी इंटरेस्ट रखते हों तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपने लिंकिन पार्क का नाम नाम न सुना हो. खासतौर से उनका गाना ‘नंब’ (किंकर्तव्यविमूढ़) तो दुनिया भर के रॉक म्यूजिक में एक अलग जगह रखता है.

चेस्टर की आत्महत्या के बाद ये सवाल फिर से दिमाग में आ रहा है कि आखिर क्यों संगीत की दुनिया से सुपर स्टार अक्सर असमय मौत को गले लगा लेते हैं. रॉक एंड रोल की दुनिया में तो ‘क्लब 27’ कुख्यात है ही, नशे की लत में करियर बर्बाद करने या असमय मर जाने वाले संगीतकारों की संख्या हिंदुस्तान में भी कम नहीं है.

अक्सर गिरते वहीं हैं जो टॉप पर होते हैं

एल्विस प्रेसली, जिमी हेंड्रिक्स, माइकल जैक्सन, एमी वाइनहाउस जैसे तमाम उदाहरणों में एक बात कॉमन है कि ये सब समय से पहले मौत के आगोश में चले गए और ये सबके सब अपने-अपने दौर में अभूतपूर्व सफल रहे. इसी में हिंदुस्तान में लिए जाने वाले ऐसे ही नामों की भी एक लंबी कड़ी है.

मशहूर सिंगर गीता दत्त की शराब की लत के चलते निजी जिंदगी और करियर दोनों तहस-नहस हो गए. शंकर जयकिशन की जोड़ी के जयकिशन की असमय मौत भी ऐसी ही हुई थी. 80-90 के दशक में रातों रात सफल हुए तमाम गायकों में से कई अपनी शराब वगैरह की लत के चलते अचानक इंडस्ट्री से बाहर हो गए थे.

शोहरत बिगाड़ देती है

एक बात तो सबको बता है कि कम उमर में बेपनाह शोहरत और पैसा मिलना अक्सर खतरनाक होता है. ऊपर से दुनिया भर में घूमने और शो करने में तमाम ऐसे नए अनुभव होते हैं जिनके चलते किसी का भी बहकना बहुत आसान है. ‘बीटल्स’ के लीड सिंगर जॉन लेनन के बारे में प्रसिद्ध है कि उनकी और उनकी पत्नी की ड्रग्स से जान पहचान शो बिजनेस के लोगों ने ही कराई थी. लेनन की मौत तो ड्रग्स से नही हुई मगर उनके बैंड बीटल्स के टूटने में एक कारण ये सफेद पाउडर भी था.

John_Lennon

दूसरी तरफ संगीतकारों, कलाकारों को नायक बना देने की प्रवृत्ति है. उनकी हर बात को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है. सही के साथ-साथ गलत बातों को भी. शुरू में बढ़ा-चढ़ाकर लिखी गईं ये गॉसिप देखते ही देखते आदमी की पहचान बन जाती हैं. ऐसी पहचान जो उसे ही खा जाती है.

कुंदनलाल सहगल इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण हैं. सहगल के बारे में माना जाता है कि उन्होंने कभी बिना शराब के गाना नहीं गाया. जबकि सहगल के जीवन से जुड़े प्रामाणिक अनुभवों को पढ़ने पर पता चलता है कि बंगाली भाषा में बन रहे फिल्म देवदास में काम न मिलने पर उन्होंने पहली बार शराब को हाथ लगाया था.

इसके बाद भी वो लंबे समय तक सायटिका के दर्द को बर्दाश्त करने के लिए थोड़ा-बहुत पीते रहे. मगर इंडस्ट्री के लोगों ने इसे कुछ ऐसे पेश किया कि पूरे करियर में सहगल से कभी बिना सुरा के सुर लगा ही नहीं. खुद सहगल अपनी इस ओढ़ी हुई इमेज का शिकार हुए.

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संगीत से जुड़े लोगों के साथ एक बड़ी समस्या ये भी है कि रंगीनियों से भरी दुनिया में संगीत से जुड़े रियाज, खाने-पीने से जुड़े अनुशासन अपने आप एक दबाव पैदा करते हैं. ज्यादातर मामलों में जिसका परिणाम शराब के रूप में दिखता है. देर रात की पार्टियों के बाद अक्सर रियाज से जुड़े अनुशासन टूटते हैं. जब अनुशासन की इस कमी का असर काम पर दिखना शुरू होता है तो अंदर ही अंदर कुंठा घर करने लगती है.

वैसे कुछ लोग इन आदतों को एक सीमा में बांधकर निभा ले जाते हैं. जैसे पंडित भीमसेन जोशी और जगजीत सिंह के मदिरा प्रेम के किस्सों की लंबी फेहरिस्त है, मगर दोनों ने ही अपने काम में इसकी बहुत ज्यादा झलक नहीं आने दी. कुछ-कुछ दिमागी लोचा भी है.

एक सवाल और उठता है कि जब इस तरह का प्रेशर खिलाड़ियों, ऐक्टर और तमाम दूसरे प्रोफेशन्स में भी होता है तो इसका सबसे ज्यादा शिकार कला-संगीत से जुड़े लोग क्यों बनते हैं. हाल ही में आई फिल्म ‘जग्गा जासूस’ में आपने देखा होगा कि उसमें हीरो बोलने में हकलाता है मगर गाना अच्छे से गाता है.

दरअसल हमारे दिमाग के दाएं हिस्से से सारी क्रिएटिव चीजें कंट्रोल होती हैं. वहीं हमारा बायां हिस्सा तर्क पर काम करता है. महान कलाकारों के मामले में ये दायां हिस्सा अक्सर अत्यधिक सक्रिय होता है. लेकिन जब कला पेशा बन जाती है तो इस क्रिएटिव राइट पर प्रोफेशनल होने की तमाम बंदिशे लगा दी जाती हैं. लॉजिक, कमिटमेंट जैसी तमाम चीजों जुड़ जाती हैं. जिनके लिए दिमाग के बाएं हिस्से से ज्यादा सोचने की जरूरत होती है.

सनक, सुख और अवसाद

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बड़े कलाकारों के मामले में अक्सर ये सुनाई पड़ता है कि वो सनकी होते हैं, इसके पीछे दिमाग के काम करने का अलग ढंग ही है. मशहूर पेंटर वॉन गॉग को ही ले लीजिए. वॉन ने जिस पागलपन अपना कान काट लिया था, उसी में अपने करियर की सबसे अच्छी पेंटिंग्स की.

इसी तरह ‘निर्वाणा’ के कर्ट कोबेन ने बचपन से घोषणा कर के रखी थी कि वो 27 साल की उम्र में जान दे देंगे. क्योंकि जिमी हैंड्रिक्स जैसे लेजेंड 27 की उम्र में ही मरे थे. इसी तरह से माइकल जैक्सन के चमड़ी का रंग बदलवाने की सनक ने उनकी सेहत को बुरी तरह से खराब किया. माइकल की मौत भी दवाओं के चलते हुई.

चेस्टर की आत्महत्या में भी इसी तरह का एक पेंच हैं. चेस्टर ने अपने स्वर्गवासी दोस्त क्रिस के जन्मदिन पर आत्महत्या की है. क्रिस ने इसी साल मई में खुदकुशी की है.

साथ ही साथ डिप्रेशन के लिए इंसानी दिमाग का जो हिस्सा जिम्मेदार होता है, वही कल्पना, गुस्से, आनंद और सेक्स संबंधी इच्छाओं के साथ जुड़ा होता है. इन भावनाओं का ग्लैमर की दुनिया में दखल किसी से छिपा नहीं है. किसी बेल कर्व की तरह चरम आनंद, सेक्सुअल डिजायर का अतिरेक अक्सर अपने बाद डिप्रेशन छोड़कर जाता है. हालांकि भारत और पश्चिम के मामले में एक फर्क महसूस किया जा सकता है. भारत में ग्लैमर से जुड़ी आत्महत्याओं में ज्यादातर नाम लड़कियों के सुनाई देते हैं. वहीं पश्चिम में ये आंकड़ा पुरुषों की तरफ झुका हुआ है.

हमेशा असफलता से नहीं जुड़ा होता अवसाद

सितारों का अवसाद में जाना कोई नई बात नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि करियर की असफलता में ही कोई अवसाद में जाए. दीपिका पादुकोण ने खुद अपनी सफलता के साथ-साथ पैदा हुए डिप्रेशन के बारे में खुद ही दुनिया को बताया. हॉलिवुड फिल्मों में बहुत सुलझे हुए किरदार निभाने वाले रॉबिन विलियम्स ने भी अपनी मानसिक बीमारियों से तंग आकर फांसी लगा ली थी. रॉबिन उस समय जीवन में हर लिहाज से सफल थे.

ये भी तय है कि चेस्टर रेमिंग्टन का नाम इस कड़ी में न पहला है न आखिरी. उनका संगीत उनके और दुनिया के लिए एक तोहफा लेकर आया था. एक ऐसा तोहफा जिसके साथ कुछ खराबियां भी चली आईं. अवसाद एक ऐसी चीज है जो किसी के भी साथ कभी भी हो सकती है. एक शेर है, हम सभी हैं ‘त्रासदी के पात्र हममें, खुदकुशी हर शख्स की संभावना है.’

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