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जन्मदिन विशेष: एक 11वीं पास को महामना ने क्यों बनाया प्रोफेसर

महामना मदन मोहन मालवीय ने रामचंद्र शुक्ल को खोजा था और बीएचयू में उनकी सीधे प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति करवाई

Avinash Dwivedi Updated On: Oct 04, 2017 08:52 AM IST

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जन्मदिन विशेष: एक 11वीं पास को महामना ने क्यों बनाया प्रोफेसर

आज हम सभी जानते हैं कि हिंदी का विकास, राष्ट्रवाद के साथ गहरे जुड़ा था. इसी दौर में हिंदी के विकास में कई पड़ाव आए और उर्दू से हिंदी दूर होती चली गई. पर दोनों के अलगाव पर असली मोहर लगी जब रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास में उर्दू को कोई स्थान नहीं दिया.

रामचंद्र शुक्ल मात्र ग्यारहवीं तक पढ़े थे और उनका अधिकांश ज्ञान स्वाध्याय से अर्जित किया हुआ था. फिर भी उनकी प्रतिभा अद्वितीय थी. महामना मदन मोहन मालवीय जी ने उन्हें खोजा था और BHU में उनकी सीधे प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति करवाई. इससे पहले रामचंद्र शुक्ल मिर्जापुर के एक प्राइमरी स्कूल में पेंटिंग पढ़ाया करते थे. पर उन्होंने बीस साल की उम्र में जो निबंध 'साहित्य क्या है?' लिखा था, आज भी हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के सिलेबस में जरूर होता है. इतना ही नहीं कई बार आपको हिंदी के शोध छात्र भी इसकी व्याख्या में गच्चा खाते दिखेंगे.

शोध के धनी रामचंद्र एक जगह समझौता कर गए

कहा जाता है कि शुक्ल जी का रिसर्च बहुत गहरा होता था. कभी किसी मत पर खुद पक्के हुए बिना नहीं लिखते थे. जब वो 'हिंदी साहित्य का इतिहास' लिख चुके और वो छपने के लिए चला गया था उस दौर का एक किस्सा प्रचलित है. प्रेस में उन दिनों एक गैली प्रूफरीडर होता था. जो हिज्जों की जांच करता था और वाक्य संरचना देखता था.

ऐसे में जब शुक्ल जी की भेजी हुई 'हिंदी साहित्य का इतिहास' की पांडुलिपि गैली प्रूफ होकर आई तो उसमें शुक्ल जी के कुछ शब्दों को सुधारा गया था. ऐसे में शुक्ल जी ने उस वक्त तक छपे कई शब्दकोषों में, संस्कृत ग्रंथों में हर सुधारे गए शब्दों को खोजना शुरू किया. कई बार मानक शब्द की जांच न हो पाने पर वो कई दिन तक स्वयं मनन-चिंतन और तर्क कर तय करते रहे कि किसी शब्द को किस तरह बरता जाना चाहिए.

ये सब करने में कई दिन लग गए. ऐसे में जो शुक्ल जी के पास प्रूफरीड किताब लेकर आया वो कई दिन उन्हीं के यहां बैठा रहता था. वहीं उसका खाना-पानी हो रहा था. वो इस इंतजार में रहता था कि अब शुक्ल जी का काम पूरा होगा और वो किताब छपने को हरी झंडी दे देंगे. ऐसे में कई दिनों तक काम पूरा न होने के चलते उसे हर शाम अगले दिन भी आने को कह दिया जाता था. यही कारण है कि उनके कई तर्क आज भी अकाट्य हैं.

पर अफसोस शोध के महारथी रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी में उस समय प्रचलित हिंदी-उर्दू के अलग होने की धारणा को मान लिया और अपने लिखे हिंदी के अब तक के सबसे प्रचलित इतिहास में हिंदी को उर्दू से हमेशा-हमेशा के लिए अलग कर दिया.

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बीएचयू में ज्वाइनिंग के वक्त ही ले लिया था इंटरव्यूअर का इंटरव्यू

जैसा कि बताया गया मालवीय जी ने शुक्ल जी को सीधे प्रोफेसर के लिए नियुक्त करने को बीएचयू बुलाया था. पर जब वो नियुक्ति के लिए डिपार्टमेंट पहुंचे और ये बात वहां उपस्थित शिक्षकों को बताई तो शुक्ल जी के सर्टिफिकेट देखकर शिक्षकों को इस बात का यकीन नहीं हुआ. इसके बाद हेड ने उनका इंटरव्यू करके ही ज्वाइनिंग कराने की बात सोची. और उनसे हिंदी साहित्य के इतिहास पर कोई प्रश्न कर दिया. इसके बाद तो रामचंद्र शुक्ल उनके उस प्रश्न के जवाब में घंटों तक बोला और बोलते ही गए.

कई बार हेड ने उन्हें रोकना चाहा पर रामचंद्र शुक्ल कहते रहे, 'थोड़ा रुकिए अभी जवाब पूरा कहां हुआ है?' आखिर में हेड ने तत्कालीन VC मदन मोहन मालवीय को बुला भेजा. ये खबर जब मालवीय जी को पता चली तो वो तुरंत समझ गए कि रामचंद्र शुक्ल की बात हो रही है. वो वहां पहुंचे और बोले कि किसने कहा था इनका इंटरव्यू लेने को. इन्हें तो मैंने सीधे ज्वाइनिंग के लिए बुलाया था.

श्याम सुंदर दास और रामचंद्र शुक्ल की प्रतिद्वंद्विता

श्याम सुंदर दास बीएचयू के हिंदी विभाग के पहले हेड थे. पर वहां रामचंद्र शुक्ल की नियुक्ति के साथ ही उनके एकछत्र जलवे में कमी आने लगी थी. ऐसे में श्याम सुंदर दास ने अपने एक रिसर्च स्कॉलर 'लक्ष्मी नारायण मिश्र सुधांशु' को 'काव्य में अभिव्यंजनावाद' विषय पर एक पेपर लिखने को कहा. कहा जाता है कि श्याम सुंदर दास ने लक्ष्मी नारायण को ब्रीफ भी किया था कि इसी विषय में रामचंद्र शुक्ल ने एक भाषण प्रयाग के हिंदी साहित्य सम्मेलन में दिया है. उस भाषण के विचारों का विरोध करते हुए लिखना. लक्ष्मी नारायण ने पेपर लिख तो लिया पर जब उसे जांचने की बारी आई तो उसे दो लोग जांचने वाले थे. जिसमें से एक रामचंद्र शुक्ल भी थे. ये बात जब लक्ष्मी नारायण को पता चली तो उनके होश उड़ गए.

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अब लक्ष्मी नारायण को बस इसका इंतजार था कि वो कितने नंबर से फेल किए गए हैं. पर जब रिजल्ट आया तो लक्ष्मी नारायण को दूसरे उत्तर जांचने वाले के दिए 62 नंबर के बदले शुक्ल जी ने 67 नंबर दिए थे. ये बात जानकर वो शुक्ल जी के पैरों में जाकर गिर पड़े. शुक्ल जी को लगा कि लक्ष्मी पास हो जाएं इसलिए ऐसा कर रहे हैं. उन्हें पता नहीं था कि रिजल्ट लक्ष्मी देख चुके हैं.

ऐसे में शुक्ल जी ने कहा कि रिजल्ट आने वाला है, तुमने जो लिखा था उसके हिसाब से मैंने नंबर दे दिए हैं. अब क्या कर सकता हूं! लक्ष्मी नारायण ने कहा, 'जानता हूं, मैंने आपकी आलोचना की फिर भी आपने मुझे इतने अच्छे नंबर दिए.' रामचंद्र इस बात पर मुस्कुराने लगे. लक्ष्मी नारायण मिश्र बाद में बिहार के मशहूर नेता रहे और बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी बने.

सारा का सारा हिंदी साहित्य एक ही तांगे पर

ऐसे ही एक रोज श्याम सुंदर दास क्लास में सूरदास का लिखा 'भ्रमरगीत' पढ़ा रहे थे. एक लाइन पर अटक गए. उस लाइन में गोपियां जरा देवी से प्रार्थना कर रही हैं कि राहु और केतु को जोड़ दो. यहां पर श्याम सुंदर दास जरा का अर्थ बुढ़ापा लगा रहे थे. पर उससे मतलब क्लियर नहीं हो रहा था. तो उन्होंने क्लास में स्टूडेंट्स से कहा कि कुछ देर रुकिए, मैं रामचंद्र जी से इसका मतलब पूछ कर आता हूं क्योंकि उन्हीं ने 'भ्रमरगीत सार' संपादित किया है और सिलेबस में भी उन्होंने ही लगाया है. स्टूडेंट उनकी इस बात से दंग रह गए कि वो शुक्ल जी से पूछने जा रहे थे क्योंकि दोनों कट्टर प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे.

रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें सही अर्थ बताया कि यहां जरा देवी नाम की राक्षसी है, जिसका बेटा जरासंध था. और उसने जरासंध को जब दो भागों में पड़ा पाया था तो उसे जोड़ दिया था. ऐसे में अगर वो राहु और केतु को भी जोड़ दे तो जब राहु चांद को निगलेगा, उसके बाद कृष्ण से बिछड़ने के बाद उन गोपियों का दिल जलाने वाला चांद कभी दिखाई नहीं देगा.

BHU में रामचंद्र शुक्ल, श्याम सुंदर दास, भगवानदीन और अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ चारों एक ही तांगें में बैठकर कई बार डिपार्टमेंट आते-जाते थे. जबकि चारों के बीच बहुत से मतभेद थे और पूरे बनारस में इन मतभेदों के किस्से चाव से सुनाए जाते थे. पर जब कोई चारों को इस तरह एक ही तांगे पर यूं आते हुए देखता तो इस दिव्य दृश्य को देख कर कहता कि 'सारा का सारा हिंदी साहित्य एक ही तांगे पर' चला जा रहा है.

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चित्रलेखा लिखने वाले भगवती चरण वर्मा के कांफिडेंस की हवा निकाल दी

बात उस समय की है जब भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा आया ही था. उनकी काफी तारीफ हो रही थी और चारों ओर चित्रलेखा की ही चर्चा थी. एक रोज रामचंद्र शुक्ल के रिसर्च स्कॉलर 'शिवमंगल सिंह सुमन' भगवती जी से मिलने आए. भगवती उस वक्त अपनी सफलता के खुमार में थे. सुमन जी को उन्होंने सुनाना शुरू कर दिया कि कितने बड़े-बड़े आलोचकों ने मेरी तारीफ की. फिर कहने लगे पर मैं एक बार रामचंद्र शुक्ल से मिलना चाहता हूं और ये जानना चाहता हूं कि वो मेरे उपन्यास के बारे में क्या सोचते हैं. शिवमंगल जी ने उनके मन में 'प्रभुता पाई काहि मद नाहीं' वाली फीलिंग भांप ली और मुस्कुराते हुए रामचंद्र शुक्ल से उनका मिलना निश्चित करवा दिया.

भगवती जैसे ही रामचंद्र शुक्ल के पास पहुंचे, वहां भी अपनी तारीफ शुरू कर दी. कहां उनकी क्या तारीफ हुई, कहां सम्मान में क्या छपा, बताने लगे. काफी देर तक रामचंद्र शुक्ल सुनते रहे फिर बोले भगवती जी आपने एक मुख्य नायक के लिए 'कुमारगिरी' नाम का प्रयोग किया है. जबकि आपकी कहानी दूसरी-तीसरी शताब्दी के आस-पास ठहरती है और 'गिरी' का प्रयोग तो आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य के बाद होना शुरू हुआ था.

इतना सुनना था कि भगवती चरण वर्मा को अहसास हो गया कि वो किसके सामने बैठे हैं. उन्होंने तुरंत अपने और किताब के भले के लिए अपना झोला उठाया और रामचंद्र शुक्ल के पैर छूकर वहां से निकल गए.

भोजपुरी के साथ रामचंद्र शुक्ल ने बहुत अन्याय किया

भोजपुरी बेल्ट के होते हुए भी उन्होंने एक भी भोजपुरी कवि को हिंदी साहित्य के इतिहास में शामिल नहीं किया. बगहा के चंद्रशेखर मिश्र का जिक्र शुक्ल जी खड़ी बोली के पहले कवि के रूप में करते हैं पर वहीं उनकी भोजपुरी की कविताओं पर सांस नहीं लेते कई जगह देशभाषा की आड़ में भोजपुरी की कृतियों को दबा देते हैं.

ये शायद वैसा ही कदम था, जैसे लोग अधिकारी हो जाने पर अपने गांव के लोगों से नहीं मिलते. बताते चलें कि एक दौर में हजारी प्रसाद द्विवेदी भी आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल करने के मुखर विरोधी थे. शायद ये दोनों ही उस समय की एक भ्रांत अवधारणा, 'लोकभाषाएं आवाज उठाने लगेंगी तो हिंदी कमजोर हो जाएगी' का शिकार थे.

रामचंद्र शुक्ल की आलोचना-पद्धति और इतिहास-लेखन से किसी की सहमति-असहमति हो सकती है,  ऐसे में निस्संदेह आचार्य शुक्ल हिंदी की एक मौलिक चिंतन प्रणाली दे गए. यही कारण है कि 'हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' लिखने वाले बच्चन सिंह कहते हैं- 'हिंदी साहित्य का नया इतिहास न रामचंद्र शुक्ल के इतिहास को लेकर लिखा जा सकता है न छोड़कर.'

(नोट- सारे तथ्य और तर्क बीएचयू से शोध कर रहे सुशांत कुमार शर्मा से बातचीत पर आधारित हैं. उन्होंने जेएनयू से एम.ए. किया है. सुशांत भोजपुरी, हिंदी और संस्कृत के कवि हैं और गज़लें भी लिखते हैं.)

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