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बैंडिट क्वीन के 22 साल: फूलन देवी के साथ जो हुआ, वो सबसे बड़ा छल है

न बैंडिट क्वीन के निर्देशक शेखर कपूर और न ही फूलन देवी बनीं सीमा बिस्वास उनसे मिलीं.

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jun 30, 2017 01:47 PM IST

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बैंडिट क्वीन के 22 साल: फूलन देवी के साथ जो हुआ, वो सबसे बड़ा छल है

30 जून को को शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन को रिलीज हुए 22 साल पूरे हो जाएंगे. दुनिया भर में ये फिल्म डाकू से नेता बनी फूलन देवी का पर्याय है.

बिना किसी झिझक के इस फिल्म को हिंदी सिनेमा में बनी सबसे विवादास्पद और चर्चित बायोपिक का दर्जा दिया जा सकता है. एक फिल्म जो बैन भी होती है और नैश्नल अवॉर्ड भी जीतती है. जिसे भारत में दिखाने से रोका जाता है और ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म के तौर पर भेजा भी जाता है.

आज जब सेंसर की मनमानी और बायोपिक्स की बहार अपने पूरे शबाब पर है तो इस फिल्म के बहाने हमारे सिनेमा पर एक नजर डाली जा सकती है.

ये औरत वो तो नहीं

फूलन देवी से जुड़ी मेरी कुछ निजी स्मृतियां हैं. इनमें से पहली उसको बहुत करीब से देखना है. वो मेरे मोहल्ले में आई थीं. क्यों ये याद नहीं पर वो फूलन के सियासत में दाखिल होने का समय था.

शायद सिंथेटिक सी साड़ी पहने एक औरत. जिसे किसी भी तरह से उसको उत्सुकता से ताक रही महिलाओं से अलग नहीं किया जा सकता था. इसके कुछ ही समय बाद ‘बैंडिट क्वीन’ में फूलन बनी सीमा बिस्वास की तस्वीर देखी तो लगा कि ये तो कहीं से भी वो औरत नहीं लगती. न हाव-भाव, न चाल-ढाल.

कई साल का भ्रम तब दूर हुआ, जब किसी पुरानी मैगजीन में फूलन के सरेंडर की तस्वीर देखी. तब समझ आया कि सीमा बिस्वास उस एक तस्वीर के 2 घंटे तक सेल्युलाईड पर रचती रहीं.

मगर फूलन देवी की बैंडिट क्वीन से असमानता सिर्फ एक बच्चे का ऑब्जरवेशन भर नहीं है. फिल्म में कई तरह के संदेश देने के लिए फूलन के किरदार को बहुत ज्यादा तोड़ा मरोड़ा गया. और ये तब हुआ जब फूलन देवी न सिर्फ जिंदा थी, बल्कि बीहड़ के बाहर जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रही थीं.

फिल्म शुरुआत में ही स्थापित करती है की फूलन बचपन में अबोध थी, जिसे अधेड़ उम्र के आदमी को बेच दिया गया. इसके बाद ‘नीची जाति’ से होने के कारण ‘ठाकुरों’ ने उसका शोषण किया.

वास्तविक्ता में ये कहानी हिंदी सिनेमा के विजय जैसी नहीं है. फूलन बचपन से ही उदंड और लड़ाका थी. उसको और उसके परिवार को परेशान करने वालों में सबसे बड़ा नाम ठाकुरों का नही, उसके चचेरे भाई मैयादीन का था.

फिल्म में मैयादीन का किरदार गायब हैं. इसके अलावा फूलन का अपने पहले पति के साथ-साथ अपनी सौत को बुरी तरह से पीटना भी हटा दिया गया है. इसके पीछे शेखर कपूर तर्क देते हैं कि वो उसकी फेमिनिस्टिक अप्रोच को कम नहीं करना चाहते थे.

India's bandit queen Phoolan Devi (R), at New Delhi's government guest house, talks with reporters M..

उसे खुद की कहानी से ही दूर रखा गया

शेखर कपूर की फूलन के प्रति इम्पैथी पैदा करने वाली बात को मान लेते हैं. सिनेमाई नायकत्व के अपने गणित होते हैं. मगर इससे अलग भी कई ऐसी घटनाएं फिल्म को बनाते समय हुईं, जिन्हें सिर्फ सिनेमा की रचनात्मक स्वतंत्रता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है.

निर्देशक के तौर पर शेखर फूलन से नहीं मिले. न ही उनके किरदार को निभाने वाली सीमा बिस्वास कभी उनसे मिलीं. सच को दिखाने वाली फिल्म को बनाने वालों का उससे कतराना संशय पैदा करता है. इसी संशय को लेकर मशहूर लेखिका अरुंधती रॉय ने दो लेख लिखे थे.

इनमें बताया गया था कि फूलन के नाम को जोड़कर, बलात्कार को एक माध्यम बनाकर एक सच जैसी लगने वाली फिल्म बना दी गई. हालांकि अरुंधति अपनी विचारधारा के चलते कई जगह अतिरेक में आ जाती हैं मगर उनकी बात का लब्बो लुआब बिलकुल ठीक है. ऐसा लगता है कि फिल्म फूलन की कहानी से ज़्यादा बलात्कार को बेचती है.

‘बैंडिट क्वीन’ का बलात्कार वाला सीक्वेंस वीभत्स होने तक क्रूर है. फिल्म जिस तरह से लोगों के दिमाग में यौन हिंसा की छाप छोड़ती है वैसा हिंदी सिनेमा में कम ही दिखाई पड़ता है. मगर इस बात का स्याह पहलू भी है, जिस किरदार के ऊपर गैंगरेप और परेड को फिल्माया गया था वो उस समय इस दुनिया में मौजूद थी. फिल्म का इंटरनैशनल वर्जन फूलन को दिखाने से मना कर दिया गया.

सीरी फोर्ट में दिल्ली के एलीट क्लास के लिए एक स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई थी. फूलन उस समय वहां से कुछ मीटर दूर ही रह रही थीं. मगर उन्हें स्क्रीनिंग में नहीं आने दिया गया था. अंत में मामला कोर्ट में गया और. अदालत के आदेश पर फिल्म बैन हुई, फूलन को दिखाई गई और बाद में कई कट्स के साथ भारत में रिलीज़ हुई.

सांसद के रूप में संसद जातीं फूलन देवी (फोटो: रॉयटर्स)

सांसद के रूप में संसद जातीं फूलन देवी (फोटो: रॉयटर्स)

सवाल जिनके स्पष्ट जवाब नहीं है

बेशक ‘बैंडिट क्वीन’ हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में जगह रखती है. इस में जिस बेबाकी से चीजों को दिखाया गया है, वो अदभुत है. लेकिन अगर फूलन देवी दबे कुचले वर्ग से आई एक महिला न होती तो भी क्या ये बेबाकी रहती? एमएस धोनी और सचिन पर बनी बायोपिक में उन्हें महानायक दिखाना छोड़ दीजिए. अज़हर की कहानी में भी मैच फिक्सिंग के पूरे विवाद को धो-पोंछ कर साफ कर दिया गया.

क्या फूलन देवी के साथ ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि 53 मुकद्मों में उलझी, नई जिंदगी तलाश रही एक ग्रामीण औरत को कानून का डर दिखाना आसान था. क्योंकि अब उसने कानून को डराना छोड़ दिया था.

जाते-जाते. मेरे दादा जी, जो उस फूलन के दौर में चंबल में ही सरकारी अफसर थे. डाकुओं के किस्से सुनाया करते थे. फूलन के बारे में बताते थे कि उसके कई कथित प्रेमी और पति उसके साथ खिंचवाई गई कुछ नजदीकी तस्वीरों को सरकारी अफसरों को दिखाया करते. अपने काम निकलवाने के लिए. इसके साथ ही वो जोड़ते थे कि फूलन के साथ जो हुआ उसके बदले में उसने जो किया वो कुछ ज्यादा नहीं था. उसकी जगह कोई मर्द होता तो शायद और ज्यादा खून खराबा करता.

फूलन देवी भले ही चंबल की सबसे चर्चित दस्यु सरगनाओ में से एक रही हों मगर एक औरत होने की नियति से पूरी तरह नहीं बच पाईं.

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