विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

पुण्यतिथि विशेष बाबू जगजीवन राम : एक सफल रक्षा मंत्री जो दो बार प्रधानमंत्री बन सकता था

इतने बरसों बाद एक बार फिर कांग्रेस को मीरा कुमार के बहाने बाबू जगजीवन राम की याद आई है

Suresh Bafna Updated On: Jul 06, 2017 11:51 AM IST

0
पुण्यतिथि विशेष बाबू जगजीवन राम : एक सफल रक्षा मंत्री जो दो बार प्रधानमंत्री बन सकता था

आजादी के आंदोलन के दौरान जिन नेताओं ने भारत के भविष्य को गढ़ने में ऐतिहासिक योगदान दिया, उनमें बाबू जगजीवन राम का नाम अगली पंक्ति में शामिल है. आज भी जब हम बाबूजी का जिक्र करते हैं तो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद आना स्वाभाविक है. एक सफल रक्षा मंत्री के तौर पर बाबू जगजीवन राम ने पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. भारत की एकता और सुरक्षा के लिए बांग्लादेश का निर्माण बेहद जरूरी हो गया था.

दलितों से भेदभाव का विरोध किया

बाबू जगजीवन राम के संसदीय जीवन का इतिहास 50 साल का रहा है, जो एक विश्व रिकॉर्ड है. दलित समुदाय से होने के कारण उनको बचपन से ही सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का शिकार होना पड़ा. बिहार के आरा के जिस स्कूल में वो पढ़ते थे, वहां हिंदू और मुसलमान छात्रों के लिए पीने के पानी के अलग-अलग मटके रखे जाते थे. जब दलित समुदाय के छात्रों ने हिंदू छात्रों के लिए रखे मटके से पानी पिया तो कथित ऊंची जाति के छात्रों ने उसका विरोध किया.

स्कूल के प्रिंसिपल ने दलितों के लिए एक और मटका रखवा दिया. छात्र जगजीवन राम ने दलितों के लिए रखे मटक को फोड़कर अपना विरोध प्रकट किया. अंत में प्रिंसिपल ने तीसरा मटका न रखने का निर्णय लिया. स्कूल की इस घटना ने बाबू जगजीवन राम के राजनीतिक जीवन की दिशा तय कर दी.

एक बार जब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्थापक मदन मोहन मालवीय 1925 में आरा के इस स्कूल में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए तो जगजीवन राम की भाषण कला से काफी प्रभावित हुए. उन्होंने जगजीवन राम को बीएचयू में पढ़ने के लिए आमंत्रित किया. बाबूजी ने अपना भाषण संस्कृत में दिया था.

फर्स्ट डिविजन में मैट्रिक पास करने के बाद जगजीवन राम ने बनारस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. यहां भी बाबूजी को सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का शिकार होना पड़ा. यहां तक कि नाई ने उनके बाल काटने से मना कर दिया. बाबूजी ने विश्वविद्यालय में होनेवाले इस भेदभाव के खिलाफ पीड़ितों को एकजुट कर विरोध प्रकट किया.

जगजीवन राम की बेटी और लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार के अनुसार ‘बाबूजी ने जब प्रथम श्रेणी में मैट्रिक परीक्षा पास की तब एक ईसाई नन ने दादीजी को प्रस्ताव दिया था कि वह लखनऊ के किसी ईसाई स्कूल में दाखिला दिला देंगी. और बाद में उनके बेटे को अमेरिका भी भिजवाया जा सकता है. दादीजी ने यह कहकर प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि आप पढ़ाने के साथ-साथ उसका धर्म परिवर्तन कर देंगे.’

बाबूजी के पिताजी ब्रिटिश आर्मी से रिटायर होने के बाद शिव नारायणी संप्रदाय के महंत हो गए थे. बाबू जगजीवन राम भी हिंदू महासभा के सदस्य थे. हिंदू महासभा के माध्यम से बाबूजी छुआछूत और सामाजिक भेदभाव को खत्म करना चाहते थे.

बांग्लादेश के निर्माण की वजह से बाबूजी को लोग रक्षा मंत्री के रूप में अधिक जानते हैं, लेकिन कृषि मंत्री के तौर पर भी वे उतने ही सफल रहे हैं. पहली हरित क्रांति को साकार रूप देने में उनकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता है.

मीरा कुमार

बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार, जिन्हें यूपीए ने अपने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है

मोरारजी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल हुए

1968 में कृषि मंत्री के तौर पर बाबूजी ने लोकसभा में बयान दिया था कि वैदिक काल में ब्राह्मण भी गोमांस खाते थे. तब शंकराचार्य जी ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि जगजीवन राम का बयान आपत्तिजनक है, इसलिए इसे लोकसभा की कार्रवाई से बाहर किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर नीलम संजीव रेड्‍डी को तलब किया. लोकसभा ने सर्वानुमति से स्पीकर से कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट से कह दें कि संसद पर उसका कोई न्यायाधिकार नहीं है.

बाद में बाबूजी ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी समुदाय की भावना को आहत करना नहीं था. उन्होंने ऋगवेद के श्लोक संस्कृत में सुनाकर साफ किया कि जो कुछ कहा वह गलत नहीं था. संस्कृत भाषा के अच्छे ज्ञाता होने के नाते ऐसे मामलों में उनकी बातों को विरोधी भी स्वीकार करते थे.

1938 से 1979 तक लगातार कैबिनेट के सदस्य बने रहने का रिकॉर्ड भी जगजीवन राम के नाम पर है. 1946 में नेहरूजी की प्रोविजनल कैबिनेट में जगजीवन राम सबसे युवा मंत्री के रूप में शामिल हुए थे. जनता के साथ-साथ वो सांसदों के बीच भी लोकप्रिय बने रहे. 1977 में जब इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से संवैधानिक संकट पैदा हुआ था, तब सबसे पहले इंदिरा गांधी जगजीवन राम से मिलने उनके निवास पर गईं थीं. इंदिरा ने उनसे वादा किया था कि यदि उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा तो वो ही अगले प्रधानमंत्री होंगे.

26 जून, 1975 को देश में इमरजेंसी लगाए जाने के बाद कुछ महीनों तक इंदिरा गांझी और जगजीवन राम के रिश्ते सामान्य रहे, लेकिन सरकार और पार्टी से जुड़े कई निर्णयों पर दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. 1977 में आपातकाल हटने के बाद जगजीवन राम ने हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम से नई पार्टी का गठन कर लिया. बाद में जयप्रकाश नारायण के कहने पर जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा.

जनता पार्टी की जीत के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर दावा पेश किया, लेकिन मोरारजी देसाई के सामने उनका दावा टिक नहीं पाया. वो मोरारजी के शपथ कार्यक्रम में नहीं गए. फिर जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर वो मोरारजी कैबिनेट में शामिल हुए. प्रधानमंत्री पद की दौड़ के दौरान ही चौधरी चरण सिंह के समर्थकों ने उनके बेटे सुरेश राम के कथित सैक्स स्कैंडल को उजागर किया था.

फिर जब 1979 में मोरारजी की सरकार दोहरी सदस्यता के मामले पर गिर गई तो एक बार फिर चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम के बीच राजनीतिक युद्ध हुआ. इंदिरा गांधी चाहती थीं कि युवा तुर्क चंद्रशेखर यह जिम्मेदारी लें कि जगजीवन राम उनके हितों के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे तो वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

जनता पार्टी संसदीय दल में बहुमत के बावजूद राष्ट्रपति संजीव रेड्‍डी ने बाबूजी को शपथ नहीं दिलाई, इस तरह दूसरी बार बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद की लड़ाई हार गए. 1980 में इंदिरा गांधी के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद बाबूजी ने बहुत कोशिश की कि फिर से कांग्रेस में शामिल हो जाएं, लेकिन इंदिरा गांधी ने उनको माफ नहीं किया.

बाबू जगजीवन राम (फोटो: फेसबुक)

बाबू जगजीवन राम (फोटो: फेसबुक से साभार)

दलित महिलाओं को पानी पिलाने के लिए नियुक्त किया

केंद्रीय मंत्री के तौर पर एक बार जब वो पुरी के जग्गनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गए तो उनको प्रवेश की अनुमति मिल गई लेकिन उनकी पत्नी इंद्रा देवी को इजाजत नहीं दी गई. मंदिर प्रशासकों के इस निर्णय के विरोध में बाबूजी ने भी भगवान जग्गनाथ के दर्शन करने से इनकार कर दिया. इंद्रा देवी ने अपनी डायरी में लिखा ‘इस घटना से भगवान जग्गनाथ के दर्शन करने की इच्छा पूरी तरह खत्म हो गई. अपने भक्तों के बीच भेदभाव करने वाला दुनिया का जग्गनाथ कैसे हो सकता है?’

बाबू जगजीवन राम ने दलित होने के नाते बचपन से ही सामाजिक स्तर पर होने वाले भेदभाव का सामना किया था, लेकिन इस भेदभाव के खिलाफ लड़ाई करते हुए उन्होंने कभी भी किसी समुदाय के प्रति दुराभाव नहीं दिखाया. रेल मंत्री के रूप में उन्होंने रेलवे स्टेशनों पर हिंदू और मुस्लिम पानी की व्यवस्था को खत्म कर के दलित महिला को पानी पिलाने के लिए नियुक्त किया था.

बाबू जगजीवन राम की राजनीतिक विरासत आज कांग्रेस पार्टी के नेताओं के लिए अचानक उपयोगी दिखाई देने लगी है. जब बीजेपी ने राष्ट्रपति पद के लिए दलित वर्ग से जुड़े नेता को अपना उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस पार्टी को जगजीवन राम की याद आई और उनकी बेटी मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया. अपने जीवन के अंतिम सालों में बाबूजी चाहते थे कि वो फिर से कांग्रेस पार्टी में शामिल हों, लेकिन इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को यह स्वीकार नहीं था.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi