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पाकिस्तान से 'तीन तलाक' खत्म करने वाले अयूब खान से भारत जमीन पर जीता पर आसमान में पिछड़ गया

अयूब ख़ान, पाकिस्तान का पहला ऐसा सेनाध्यक्ष जिसने मार्शल लॉ लगाकर राष्ट्रपति की गद्दी हासिल की.

Avinash Dwivedi | Published On: May 14, 2017 04:44 PM IST | Updated On: May 14, 2017 04:44 PM IST

पाकिस्तान से 'तीन तलाक' खत्म करने वाले अयूब खान से भारत जमीन पर जीता पर आसमान में पिछड़ गया

अयूब ख़ान, पाकिस्तान का पहला ऐसा सेनाध्यक्ष जिसने मार्शल लॉ लगाकर राष्ट्रपति की गद्दी हासिल की. 1958 के इस वाकये के बाद जियाउलहक और परवेज मुशर्रफ जैसे सेनाध्यक्षों के लिए तानाशाही का रास्ता साफ हो गया. पर अयूब खान ने कुछ ऐसे भी काम किए थे, जो उस वक्त पाकिस्तान के लिए बेहद जरूरी थे और जिनके लिए आज भी पाकिस्तान उनका शुक्रगुजार होगा-

पाकिस्तान का धर्मनिरपेक्ष* संविधान

पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने संविधान का काम पूरा करने के लिए जस्टिस मुहम्मद शहाबुद्दीन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया था. कमीशन ने जब अपनी रिपोर्ट पेश की तो अयूब खान उससे सहमत नहीं थे. इसलिए उन्होंने शहाबुद्दीन रिपोर्ट से इतर संविधान लागू कर दिया. इस संविधान में कई बातें तो शहाबुद्दीन रिपोर्ट से ठीक उलट थीं.

इसमें राष्ट्रपति के चयन का 80 हजार लोगों को अधिकार दिया गया था. जिसे बाद में बढ़ाकर 1 लाख 20 हजार कर दिया गया. इन्हें बेसिक डेमोक्रेट्स कहा गया. जो यूं तो स्वतंत्र दिखते थे पर अयूब खान का उन पर कंट्रोल था. अयूब खान इस व्यवस्था को अमेरिका से और खुद को अमेरिकी क्रांतिकारी जैफर्सन से प्रभावित बताते थे. ऐसे ही अयूब खान ने जिस नेशनल असेंबली का गठन किया पर उसे भी सीमित अधिकार ही दिए. अखबारों पर भी अयूब खान ने नियंत्रण बनाए रखा.

* इस संविधान में अयूब खान की अपनी सोच शामिल थी. और राजनीति में धर्म के प्रयोग पर पाबंदी थी. नया संविधान इस्लाम की इज्जत करता था पर उसने इस्लाम को राजधर्म नहीं माना था. ऐसे में कुल मिलाकर ये एक उदार संविधान था.

हालांकि बाद में इसे बदल दिया गया और पाकिस्तानी संविधान में इस्लाम को राजधर्म बताते हुए पाकिस्तान को इस्लामिक देश बना दिया गया.

अयूब खान ने पाकिस्तान में खत्म किया था ट्रिपल तलाक

2 मार्च, 1961 को उन्होंने 'मुस्लिम फैमिली लॉ' बिल पास किया. जिसमें मनचाही संख्या में बहुविवाह करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही दूसरा विवाह करने के लिए वर्तमान पत्नी का राजी होना भी जरूरी था. तुरंत तलाक (ट्रिपल तलाक ही) पर भी पाबंदी लगा दी गई.

मतलब, शौहर बीवी को इस्लामिक कायदे के हिसाब से बस तीन बार तलाक, तलाक, तलाक बोलकर नहीं छोड़ सकता था. जो काम पाकिस्तान में अयूब खान 1961 में कर चुके, आज भी भारत के लिए मुश्किल का सबब बना हुआ है.

इसी कानून के तहत शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में एक मध्यस्थता परिषद् की स्थापना की गई. ये तीन बातों पर विचार करते थे -

1. किसी आदमी को एक शादी के रहते दूसरी शादी करने की अनुमति देना

2. शौहर और बीवी में अनबन होने पर समझौता कराना

3. तलाक की स्थिति में बीवी और बच्चों के निर्वाह के लिए हर्जाने की रकम तय करना.

अब्दुस सलाम.

अब्दुस सलाम.

भारत से कई वर्ष पहले शुरू हुआ था पाकिस्तानी स्पेस प्रोग्राम

बात 1960 की है. कराची में पाकिस्तान-अमरीकी काउंसिल का लेक्चर चल रहा था और एक स्पीकर ने अपने एक बयान से सबको चौंका दिया, 'पाकिस्तान अब स्पेस एज में दाखिल होने वाला है और बहुत जल्द हम अंतरिक्ष में एक रॉकेट भेजने वाले हैं.'

स्पीकर थे प्रोफ़ेसर अब्दुस सलाम. जब उनके भाषण का हिस्सा अगले दिन दुनिया के तमाम जाने-माने अख़बारों के पहले पन्नों पर छपा तो दुनिया पाकिस्तान की ये तरक्की देख दंग रह गई. ये वही अब्दुस सलाम थे जो आगे चल कर विज्ञान के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार जीतने वाले पहले मुसलमान और पाकिस्तानी थे.

अयूब खान के प्रेसिडेंट बनते ही अब्दुस सलाम ने उनसे स्पेस प्रोग्राम को लेकर नजदीकियां बढ़ा दी थीं. अयूब खान की रुचि भी इसमें थी. कराची में 'सुपारको' यानी पाकिस्तान स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमिशन की स्थापना हुई.

पाकिस्तान ने पहला रॉकेट 1961 में छोड़ा. हालांकि प्रारंभिक रॉकेट्स का मुख्य उद्देश्य मौसम के बारे में जानकारी जुटाना था. पर भारत इसके एक साल बाद ऐसा कर सका.

ये वो दौर था जब विज्ञान जगत में अब्दुस सलाम की तूती बोलती थी और उन्हें कुछ लोग 'पाकिस्तान का होमी भाभा' भी कहते थे. जानकार बताते है कि जनरल अयूब खान के दौर में पाकिस्तानी स्पेस कार्यक्रम काफ़ी 'फला-फूला' और अमरीका तक ने यहां होने वाले काम को सराहा. पर ये दौर सिर्फ दस साल रहा और जनरल याह्या खान और प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के दौर में प्राथमिकताएं तेज़ी से बदलीं और पाकिस्तानी स्पेस कार्यक्रम ठप्प हो गया.

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सेना के आदमी ने सेना को बढ़ाया पर जनता पिस गई

समाजविज्ञानी अमेली ब्लोम का कहना है, 'पाकिस्तानी सेना हमेशा से ही वैधता के संकट से जूझती रही है. क्योंकि ना ही उसने स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लिया था. ना ही पाकिस्तान के निर्माण में उसका कोई बड़ा योगदान था.' पर अयूब खान ने इसी सेना को वैधता ही नहीं दिलाई, शासन के योग्य भी बनाया.

दरअसल पाकिस्तानी सेना ब्रिटिश इंडियन आर्मी का एक भाग भर थी. पाकिस्तान का मानना है विभाजन के बाद से ही भारत बहुत फायदे में है. क्योंकि पाकिस्तान को ब्रिटिश इंडियन आर्मी के 36 फीसदी लोग ही मिले. यानी 4 लाख 10 हजार सैनिकों में से बस 1 लाख 40 हजार ही पाकिस्तान की आर्मी में गए.

मतलब भारत के पास पाकिस्तान के मुकाबले दुगनी बड़ी सेना थी. यही वजह थी कि पाकिस्तान ने आजादी के बाद अपने रक्षा बजट पर पानी की तरह पैसा बहाया. 1950-51 में पाकिस्तान ने बजट का 73 फीसदी और 1955-56 में 64 फीसदी सेना पर खर्च किया.

मगर पाकिस्तान का जन्म ही जब गलतफहमियों के साथ हुआ था तो पाकिस्तान को गुमराह तो होना ही था इसलिए पानी की तरह बहाया गया पैसा भी कुछ काम नहीं आया. माने इससे सेना पाकिस्तान में इतनी मजबूत हो गई कि पाकिस्तानी लोकतंत्र ही खतरे में आ गया.

दरअसल, आजादी के साथ ही पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया. कश्मीर पर हमले में अधिकांशत: कबायली शामिल थे पर सभी को पता है कि इन कबायलियों को सेना ने ही प्रशिक्षित किया था और हमले में भी सपोर्ट कर रही थी.

पर जब भारत ने यही आरोप पाकिस्तान पर लगाया तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान, जिनके पास उस वक्त रक्षा मंत्रालय भी था, इस बात से पूरी तरह मुकर गए. जिसके चलते पाकिस्तान के जिन सेना अफसरों ने इस ऑपरेशन में बहुत मेहनत की थी उसको बहुत निराशा हुई.

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साथ ही जनता को भी लगा कि उन्हें और शक्तिशाली नेतृत्व की जरूरत है जो पाकिस्तान के 'आंखों में आंखें डालकर' बात करे. इसलिए उनकी नजरे सेना के लोगों पर पड़ीं. इसी वक्त एक ब्यूरोक्रेट गुलाम मोहम्मद गवर्नर जनरल थे उन्होंने कमांडर इन चीफ अयूब खान को सरकार चलाने के लिए आमंत्रित किया.

पर अयूब खान ने मना कर दिया. इसके बाद उन्होंने रक्षा मंत्री का पद प्रधानमंत्री मलिक फिरोज खान नून की सरकार में स्वीकार कर लिया. एक समय पद के लिए मना करने वाले अयूब खान को जब सत्ता का सुरूर हुआ तो उन्होंने सैन्य तख्तापलट के जरिए सत्ता अपने हाथों में ले ली.

अयूब खान ने सेना में लगातार बढ़ोत्तरी की. हसन अस्कर रिज़वी अपनी 'किताब मिलिट्री, स्टेट एंड सोसाइटी इन पाकिस्तान' में लिखते हैं, 1958-69 के बीच यानि अयूब खान की प्रेसिडेंसी के पीरियड में पाकिस्तान की सेना का बजट देश के बजट का 46.13 फीसदी से 63.47 फीसदी तक रहा. और 10 बजटीय सालों में ये बजट 8 बार 50 परसेंट से ऊपर रहा.

अयूब खान ने सेना को महत्वपूर्ण पद तो दिए ही दिल खोलकर उनकी संख्या भी बढ़ाई. यही कारण था कि 1960 में पाकिस्तानी सेना 2.5 लाख का आंकड़ा पार कर गई. 1965-66 में ये 2 लाख 78 हजार और 1967-68 में 3 लाख 10 हजार पहुंच गई. अयूब खान इसी सेना के दम पर आखिरी तक सत्ता से चिपके रहे.

पर जब दबाव इतना बढ़ गया कि अब सत्ता में बने रहना मुश्किल हो गया तो उन्होंने पाकिस्तानी सेना में 'मशहूर पियक्कड़' नाम से मशहूर याह्या खान को 1969 में सत्ता देकर राजनीति से विदा ली. याह्या खान ने पाकिस्तानी आवाम पर और अत्याचार किए और उन्ही के वक्त में पाकिस्तान का विभाजन हुआ और एक नया देश बांग्लादेश बना.

अयूब खान की सबसे बड़ी असफलता- भारत से युद्ध

पाकिस्तान से भारत की 1965 में लड़ाई चल रही थी. भारत छंब में बुरी हालत में था. पाकिस्तानी फौजों ने बेहतरीन रणनीति से मुकाबला किया और छंब से पीछे हटकर भारतीय सेना को अखनूर के मोर्चे पर रहना पड़ा. लग रहा था अखनूर भी हाथ से निकल जाएगा. अख़नूर पर हमला कर रही डिवीजन के प्रमुख मेजर जनरल अख़्तर हुसैन मलिक थे.

पर इसी बीच पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल मूसा मेजर जनरल याह्या ख़ां की 7 डिवीज़न के मुख्यालय पर हेलिकॉप्टर से पहुंचे. मूसा ने तुरंत प्रभाव से याह्या को मलिक की कमान लेने के लिए कहा और इससे भी नाटकीय स्थिति तब पैदा हो गई जब मूसा ने मलिक को अपने हेलिकॉप्टर में रावलपिंडी चलने के लिए कहा.

जनरल याह्या खां.

जनरल याह्या खां.

ये खुलासा कभी नहीं हो पाया कि ऐसा क्यों हुआ? बहरहाल, इसका नतीजा ये हुआ कि बहुत कीमती समय ज़ाया हो गया और जनरल याहिया को चीज़ों को समझने में समय लगा और तब तक भारत ने अख़नूर में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली. फिर भारत के मजबूत पड़ने पर आपसी सहमति से युद्ध रुका.

बाद में ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच रूस के सहयोग से हुआ. पर इसे अयूब खान की सबसे बड़ी हार बताया जाता है. जिसे विपक्ष ने भी अच्छे से भुनाया और इससे अयूब खान की राजनीति खत्म हो गई.

चलते-चलते

अयूब खान ने मिलिट्री ट्रेनिंग ब्रिटेन की 'सैंडहर्स्ट' एकेडमी से ली थी. यहां पर उनके साथ ही जयंत नाथ चौधरी भी पासआउट होकर निकले थे, जिनका उपनाम 'मुच्छू' हुआ करता था. अयूब खान ने जब भारत पर 1965 में हमला किया. तो यही 'मुच्छू' यानि जयंत नाथ चौधरी भारतीय सेना के 'जनरल' और 'चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ' हुआ करते थे.

(सोर्सेज: मोहम्मद अयूब खान, फ्रेंड्स नॉट मास्टर्स, हसन अस्कर रिजवी, मिलिट्री, स्टेट एंड सोसाइटी इन पाकिस्तान, क्रिस्टोफर जैफरलॉट, पाकिस्तान पैराडॉक्स, आएशा जलाल, द स्टेट ऑफ मार्शल रूल, अमेली ब्लोम, रिसर्च पेपर्स ऑन इंटरनेट, विकीपीडिया, यूट्यूब)

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