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एक ऐसी सूफी आवाज जिसको तालिबानी सोच ने खामोश कर दिया

कराची के पापोश नगर कब्रिस्तान में अमजद साबरी को उनके पिता गुलाम फरीद साबरी की कब्र के साथ ही दफनाया गया

Shailesh Chaturvedi Updated On: Jun 25, 2017 01:29 PM IST

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एक ऐसी सूफी आवाज जिसको तालिबानी सोच ने खामोश कर दिया

अजय देवगन की एक फिल्म आई थी हल्ला बोल. फिल्म ज्यादा नहीं चली थी. इसमें एक कव्वाली थी- मोरे हाजी पिया... उसमें झक सफेद कपड़ों में एक कव्वाल दिखाई देते हैं. नाम है अमजद साबरी. पाकिस्तान के कव्वाल थे. रमज़ान में अमजद साबरी का जिक्र जरूरी हो जाता है.

पिछले साल रमज़ान का ही वक्त था, जब पाकिस्तान में उनकी हत्या हो गई थी. तारीख थी 22 जून. रमज़ान को तमाम पाक और मुकद्दस बातों के लिए याद किया जाता है. लेकिन हर साल जब रमज़ान आएगा, संगीत प्रेमियों को वो खून के धब्बे भी याद आएंगे, जो अमजद साबरी के शरीर से निकला था.

तमाम लोगों ने बजरंगी भाईजान देखी होगी. उसमें एक कव्वाली थी– भर दो झोली मेरी या मुहम्मद... ये कव्वाली अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग लोगों ने गाई है. फिल्म में अदनान समी ने गाई थी. इसे लेकर अमजद साबरी नाराज भी थे. दरअसल, कव्वाली को हाजी मकबूल अहमद साबरी ने कंपोज किया था. बात है 1975 की. अपने बड़े भाई हाजी गुलाम फरीद साबरी के साथ वो गाया करते थे. गुलाम फरीद साबरी कव्वालों में बेहद सम्मानित नाम हैं.

जिस अंडरपास के नीचे अमजद की मौत हुई वो उनके पिता के नाम पर है

अमजद दरअसल गुलाम फरीद साबरी के बेटे थे. सूफी गाया करते थे. ऐसी ही एक सूफी कव्वाली को लेकर ही पाकिस्तानी तालिबान के लोग नाराज थे. इसी वजह से उनकी हत्या कर दी गई. उसी ग्रुप के लोग, जिन्होंने बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की और मलाला पर गोलियां दागी थीं. 45 साल के अमजद साबरी कराची में लियाकताबाद के अपने घर की तरफ जा रहे थे. घर से वो कुछ ही मीटर दूर थे.

उनके घर के पास एक अंडरपास था. उस अंडरपास को पार किया ही था कि दो लोग मोटरसाइकिल पर आए. अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं. उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई. अजीब बात है कि जिस अंडरपास से निकलते ही उनकी हत्या हुई, वो उनके पिता गुलाम फरीद साबरी के नाम पर है. कराची के पापोश नगर कब्रिस्तान में उन्हें उनके पिता गुलाम फरीद साबरी की कब्र के साथ ही दफनाया गया.

मौत के रोज का एक और वाकया है, जो अजीब है. सुबह वो एक टीवी शो के लिए गए थे. समां टीवी पर वहां उन्होंने अपना कलाम पेश किया. उन्होंने एक नात सुनाई. उस वक्त माहौल पूरी तरह भावनाओं से सराबोर था. हर किसी की आंख से आंसू बह रहे थे. अमजद भी खुद पर काबू नहीं रख पाए थे. किसी को क्या पता था कि आखिरी बार अमजद कुछ गा रहे हैं. वहां से लौटते हुए ही उन पर हमला हुआ था.

साबरी परिवार का भारत से अटूट रिश्ता था. परिवार भारत से ही गया था. माना जाता है कि साबरी परिवार का तानसेन के खानदान से रिश्ता है. उनके पिता गुलाम फरीद साबरी और चाचा मकबूल साबरी को साबरी ब्रदर्स के रूप में अज़ीम शोहरत मिली. इन दोनों ने 70 के दशक में पश्चिमी मुल्कों में कव्वाली को मकबूल करने में अहम रोल अदा किया.

कॉमेडियन मोइन अख्तर के कहने पर कव्वाली गानी शुरू की थी

अमजद आजाद खयाल इंसान थे. उन्होंने प्रेम विवाह भी किया था. पिछले दिनों पाकिस्तानी अखबार डॉन में उनके बारे में काफी कुछ छपा था. इसमें उनकी पत्नी नादिया ने बताया था कि कैसे दोनों परिवार के लोग शादी के खिलाफ थे. लेकिन आखिर में मान गए.

नादिया ने अमजद के बारे में बताया कि परिवार के बगैर वो नहीं रह पाते थे. उनके घर में एक विशालकाय लूडो था, जिस पर उनके और उनके भाई के बच्चे खेला करते थे. उसमें दो टीमें होती थीं और जीतने वाली टीम को हजार रुपए का इनाम दिया जाता था. अमजद उसमें अपनी पसंदीदा टीम के लिए बेईमानी भी करते थे. ये किस्सा उनके भीतर के बचपन और बच्चों से उनके प्यार को ही दिखाता है.

अमजद ने 70 के दशक में गाना शुरू किया. स्कूल के एक फंक्शन में उन्होंने गाया – पैसा बोलता है. वहां पाकिस्तान के बड़े कॉमेडियन मोइन अख्तर मौजूद थे, जिन्होंने अमजद से कहा कि तुमको कव्वाली गानी चाहिए. यहां से जो सफर शुरू हुआ, वो 22 जून 2016 को बंद हुआ. उस शरीर को भले ही तालिबानी सोच ने खत्म कर दिया हो. लेकिन वो आत्मा हमेशा रहेगी. वो आवाज हमेशा रहेगी. वो गूंज हमेशा रहेगी कि भर दो झोली मेरी या मोहम्मद... लौटकर मैं न जाऊंगा खाली...

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