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जनरल डायर: अगर जलियांवाला बाग हत्याकांड न हुआ होता तो...

डायर जलियांवाला बाग के जरिए पंजाब पर असर डालना चाहता था

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jul 24, 2017 03:08 PM IST

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जनरल डायर: अगर जलियांवाला बाग हत्याकांड न हुआ होता तो...

जनरल डायर के बारे में बात करते हुए किसी भी हिंदुस्तानी के जेहन में दो बातें आती हैं. एक तो जलियांवाला बाग और दूसरा ऊधम सिंह द्वारा जनरल डायर की लंदन में गोली मारकर हत्या. पंजाब के मुरी में पैदा हुए और शिमला में बड़े हुए हैरी डायर का नाम ऐसा है, जिससे हिंदुस्तान कभी अपने आपको नहीं जोड़ना चाहेगा.

मगर कभी-कभी सवाल उठता है कि इतिहास में ‘बूचर ऑफ अमृतसर’ (अमृतसर का कसाई) के नाम से जाना जाने वाले ‘कर्नल रेग्नल्ड ऐडवर्ड हैरी डायर’ का किरदार इतना ही है क्या? क्या होता अगर 1919 की बैसाखी के दिन वो कत्ल-ए-आम न हुआ होता? क्या आजादी की लड़ाई में जलियांवाला बाग ने दिशा बदलने वाला असर डाला था?

वैसे आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सरदार ऊधम सिंह ने जनरल डायर की नहीं 1940 में पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर की हत्या की थी. जिस जनरल डायर ने जलियांवाला बाग का कत्लेआम करवाया वो 1927 में ही दुनिया से जा चुका था. हालांकि माइकल ओ डायर ने भी इस हत्याकांड को सही ठहराया था.

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भारत में ब्रिटिश शासन के दो हिस्से हैं. एक ईस्ट इंडिया शासन का दौर है, जब 1857 का गदर हुआ. दूसरी ब्रिटिश क्राउन की हुकूमत है. वायसराय के शासन वाले इस दूसरे दौर में जलियांवाला बाग एक ऐसा बिंदु है, जिसने भारतीय राजनीति के दो सबसे बड़े नायकों को उभरने में मदद की.

गांधी और भगत सिंह को जो समकालीन इतिहास और समाज में महानायक का दर्जा प्राप्त है उसके पीछे की परिस्थितियों में जलियांवाला बाग कांड का अहम रोल है. कह सकते हैं कि इनकी महानता के उजाले के लिए जिस अंधेरे की जरूरत थी वो डायर के जरिए मिला.

गांधी को असहयोग तक ले जाने वाली घटना

गांधी जब अफ्रीका से भारत वापस आए तो दुनिया पहले विश्वयुद्ध की चपेट में थी. तिलक और गोखले दोनों को गांधी मे भविष्य दिखा. चंपारण के बाद सबके चहेते बने मोहनदास के सामने 1918 में अंग्रेजों ने एक प्रस्ताव रखा. जर्मन सेना की बढ़त से घबराई एलाइस फोर्सेस को लोगों की जरूरत थी.

Mahatma Gandhi

देश के बड़े नेताओं से अपील की गई कि वो नौजवानों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करें. गांधी ने ऐसा किया भी. उन्होंने बड़े पैमाने पर युवकों को प्रेरित किया. एक तरफ वो रॉलेट एक्ट का विरोध भी कर रहे थे दूसरी ओर सेना में भर्ती का आंदोलन भी चल रहा था.

दरअसल उस समय तक ये कांग्रेस के बड़े खेमें में ये आम अवधारणा थी कि अत्याचारी ईस्ट इंडिया कंपनी से अलग ब्रिटिश राज नैतिक, प्रगतिशील और बातों को समझने वाला है. उनको अपनी बातें समझाकर परेशानियों का हल निकाला जा सकता है.

जलियांवाला बाग ने अंग्रेजों के इस शराफत के मुखौटे को उतार फेंका. उस दिन भारतीय सिपाहियों से निहत्थी जनता पर गोलियां चलवाई गई थीं. इन सिपाहियों के पीछे संगीन लिए गोरे सैनिक खड़े थे. फायरिंग तभी रुकी जब सारी गोलियां खत्म हो गईं.

जलियांवाला बाग

उस दौर के नेताओं के लिए जलियांवाला बाग से भी बुरी उसके बाद की प्रतिक्रिया थी. जनरल डायर का कहना था कि अगर गलियां तंग न होती तो वो मशीन गन का इस्तेमाल करता. इस घटना के बाद ही गांधी का वो रूप दिखा जिसने ‘असहयोग आंदोलन’ की नींव रखी.

1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार और असहयोग आंदोलन की शुरूआत के साथ ही गांधी देश की राजनीति में उस स्तर पर पहुंच गए थे, जहां लगता था कि बस एक साल में आजादी मिल जाएगी. ऐसा हो भी जाता अगर ‘चौरी-चौरा’ न होता.

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अगर आपको बापू की शख्सियत की महानता देखनी हो तो इसका सबसे बड़े उदाहरणों में से एक चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन को रोक देना है. पूरा देश एक तरफ, कि थाने में बंद करके पुलिसवालों को जला देने की एक घटना के चलते देश की आजादी को नहीं रोक देना चाहिए.

यहां गांधी सब से टकरा जाते हैं. कि लक्ष्य से ज्यादा जरूरी उसे पाने का रास्ता है. अगर अन्ना और जेपी आंदोलन से उपजे नायकों से तुलना करेंगे तो समझ जाएंगें कि क्यों गांधी सही थे. वैसे जलियांवाला बाग के होने के पीछे भी चौरी-चौरा से मिलती जुलती एक घटना थी.

ठीक इसी तरह इस घटना ने नन्हें भगत सिंह पर बड़ा असर डाला था. भगत सिंह ही वो शख्स हैं जिन्होंने सशस्त्र क्रांति करने वालों को दर्शन और विचारधारा से जोड़ा. डायर जलियांवाला बाग के जरिए पंजाब पर असर डालना चाहता था वो असर ‘बम के दर्शन’ के रूप में कुछ ऐसे आया कि पूरी ब्रिटिश हुकूमत को उसकी गूंज सुनाई पड़ी.

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एक नन के साथ दुर्व्यवहार

1919 में परिस्थितियां कुछ ऐसी ही थीं कि सेना में विद्रोह का अंदेशा था. 10 अप्रैल को शहर में विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिनमें कम से कम 5 अंग्रेज मारे गए और कई प्रदर्शनकारियों को भी जान देनी पड़ी. 11 अप्रैल को मार्सेला शेरवुड नाम की एक जवान नन ने अपने स्कूल के 600 बच्चों की छुट्टी कर दी. वो साइकिल से जा रही थी कि कुछ लोगों ने उसे पकड़कर पीटा, कपड़े उतार कर बाजार में घुमाया और गली में मरने के लिए फेंक दिया.

डायर इस घटना से बौखला गया. उसने आदेश दिया, ‘जहां उस नन को फेंका गया था, वहां से हर हिंदुस्तानी को पेट के बल रेंग कर निकलना पड़ेगा. इन लोगों को समझना पड़ेगा कि यूरोपियन औरतें उनकी देवियों जितनी पवित्र होती हैं, जिन्हें वो छू नहीं सकते. जैसे वो अपनी देवियों के सामने दंडवत करते हैं, वैसे ही इस जगह पर करेंगे.’

लेकिन डायर ने इसके बाद वो किया जो न सिर्फ उसके बल्कि पूरे ब्रिटिश शासन के दामन पर एक धब्बे की तरह लग गया. बात सिर्फ जलियांवाला बाग में बिना चेतावनी के गोली चलवाने की नहीं थी.

हंटर कमीशन के सामने पेश होकर डायर ने कहा, ‘सभा करने की मनाही थी तो मैंने तुरंत फायर करवाया. अगर थोड़ी गोलियां चलती तो खौफ नहीं पैदा होता. मुझे ‘अच्छी तरह’ से गोलियां चलवानी थीं, ताकि सही संदेश दिया जा सके. अगर मैं लोगों को सिर्फ भगा देता तो वे वापस आ जाते. तब मैं खुद को मूर्ख महसूस करता.’

हत्याकांड का शोक तक नहीं मनाने दिया

जलियांवाला बाग के दूसरे दिन डायर का एक आदेश अमृतसर के लोगों को सुनाया गया. इसमें कहा गया था कि आप लोग तय कर लें कि आपको युद्ध करना है या शांति चाहिए. अगर शांति चाहिए तो तुरंत अपनी दुकाने खोलिए. सामान्य तरीके से काम करिए. नहीं तो मैं मानूंगा कि आपको युद्ध करना है. मैं एक सिपाही हूं और मेरे लिए सारे युद्ध एक से हैं. यूरोपियन लोगों की हत्या का बदला लेना हुआ तो आपसे और आपके बच्चों से भी इसका बदला लिया जाएगा.

 Jallianwala Bagh

जलियांवाला बाग के बाद डायर को कोई सजा तो नहीं हुई मगर उसके प्रमोशन रोक दिए गए. ऑनरेरी ब्रिगेडियर जनरल डायर को जीवन भर कर्नल के रैंक पर ही रहना पड़ा. ब्रिटिश खेमा डायर पर दो हिस्सों में बंट गया.

‘मॉर्निंग पोस्ट’ नाम के अखबार ने इंग्लैंड डायर के पक्ष में ‘मैन हू सेव्ड इंडिया’ का कैंपेन चलाया. इस कैंपेन के तहत डायर के लिए लगभग 26 हज़ार पाउंड जमा हुए. डायर के समर्थकों में ‘जंगलबुक’ के लेखक रुडयार्ड किपलिंग भी थे. उन्होंने डायर की मौत पर कहा था कि उसने वही किया जो उसके हिसाब से उसकी ड्यूटी थी.

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