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मीडिया को फेमिनिज्म के नाम पर खुद सेंसर बोर्ड नहीं बनना चाहिए

बड़े तबके का स्टैंड आजकल सामने वाले की हैसियत देख कर तय होता है

Animesh Mukharjee Updated On: Sep 16, 2017 02:00 PM IST

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मीडिया को फेमिनिज्म के नाम पर खुद सेंसर बोर्ड नहीं बनना चाहिए

ऊपर लिखी हेडलाइन में अगर फेमिनिज्म शब्द न लिखा जाता तो भी काम चल सकता था. यहां पर हमने यह शब्द इसलिए लिखा है ताकि स्पष्ट कर सकें कि कैसे एक वर्ग किसी भी तरह कंटेंट के चलने की संभावना को बढ़ाने के लिए उसे फेमिनिज़्म से जोड़ रहा है.

आपने तमाम वेबसाइट्स में बलात्कार, यौन शोषण और ऐसे तमाम मुद्दों पर खबरें पढ़ी होंगी. इन्हें छापने के पीछे तर्क दिया जाता है कि ये पितृसत्ता के खिलाफ, औरतों के हक की बात करने के लिए किया जाता है.

ऐसा ही कुछ एलजीबीटीक्यू समुदाय के पक्ष में खड़े होने वाले लोग भी कहते हैं. किंतु यदि आपने ध्यान दिया हो तो देखा होगा कि एलजीबीटी समुदाय के समर्थन के नाम पर बनने वाली फिल्मों, म्यूज़िक वीडियो में लेज़्बियन यानी समलैंगिक लड़कियों पर बनने वाले कंटेंट की तादाद ज़्यादा होती है. इसका कारण है कि दो लड़कियों के बीच के प्रेम संबंध बड़ी संख्या में सामान्य पुरुषों को आकर्षित करते हैं. अगर भद्दे तरीके से कहें तो दो लड़कियों को एक दूसरे को चूमते देखना कई पुरुषों की फैंटेसी हो सकता है जिसे एक्टिविज़म या स्टैंड लेने के नाम पर भुना लिया जाता है.

खैर आगे की बातें करने से पहले इस समय चल रहे एक चलन और उस पर मीडिया के खुद सेंसर बोर्ड बनने पर बात कर लेते हैं. क्रिंज पॉप का नाम तो आपने सुना ही होगा. ताहिर शाह, ढिंचक पूजा जैसे सुरों से भटके लोग कुछ भी गा रहे हैं. इस तरह के वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं. इनकी आलोचना ही इनके लोकप्रिय होने का मुख्य कारण है. इसी कड़ी में अगला नाम हैं ओमप्रकाश मिश्रा.

ओमप्रकाश मिश्रा ने हिलते-डुलते सुरों के साथ एक वीडियो बनाया है. ढिंचक पूजा से अलग इस गाने में एक अतिरिक्त समस्या है कि इसके ‘बोलना आंटी आऊं क्या, घंटी मैं बजाऊं क्या’ जैसे लिरिक्स द्विअर्थी और स्त्री विरोधी हैं.

इस गाने के की आलोचना में कई वेबसाइट्स पर आर्टिकल लिखे गए. यहां तक सब ठीक है. खराब चीज़ों की आलोचना होनी ही चाहिए. मगर इससे आगे जाकर एक अपील शुरू की गई कि इस वीडियो को रिपोर्ट किया जाए और यूट्यूब से हटवाया जाए. क्या ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं है? एक कॉर्पोरेट तरीके से चलने वाले संस्थान का किसी एक व्यक्ति के खिलाफ ऐसी अपील करना गलत नहीं है?

अगर ये ‘स्टैंड’ हर स्त्री विरोधी बातें कहने वाले के खिलाफ लिया जाता तो कोई दिक्कत नहीं होती मगर यहां पर एक कमज़ोर विरोधी को पीट कर हीरो बनने जैसी बात है. क्या किसी भी मीडिया हाउस में साहस है कि वो करीना कपूर से ‘मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार, गटका ले सैंया अल्कोहॉल से’ जैसे गानों पर डांस करने के लिए सवाल उठाए.

कुछ दिनों पहले ही कंगना रनौत का एआईबी के लिए किया गया एक वीडियो बहुत चर्चित हुआ है. वीडियो में जो कंटेंट है वो बहुत अच्छा है मगर इस वीडियो के साथ एक और बात जुड़ी है. इस वीडियो के डायरेक्टर तन्मय भट्ट हैं. वही तन्मय भट्ट जिन्होंने एक समय पर मज़ाक करते हुए ट्वीट किया था कि पारसी समुदाय की लड़कियों को थोड़ी बहुत वेश्यावृत्ति करनी चाहिए ताकि वो अपने समुदाय की गिरती हुई आबादी बढ़ा सकें.

तन्मय ऐसे कई विवादास्पद ट्वीट करके डिलीट कर चुके हैं.

तन्मय ऐसे कई विवादास्पद ट्वीट करके डिलीट कर चुके हैं.

इसके कुछ समय बाद ही लता मंगेश्कर का मज़ाक उड़ाने के चलते तन्मय को बुरी तरह से ट्रोल किया गाया था. तब इन लोगों ने तन्मय का समर्थन करते हुए उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया था. क्या तन्मय का स्त्री विरोधी मज़ाक करना इसलिए जायज है कि वो एक अमीर और अंग्रेजी बोलने वाले वर्ग से आते हैं. क्या कंगना से ये सवाल न पूछा जाए कि क्यों वो महिलाओं के प्रति ऐसे मजाक करने वालों के साथ ‘नारी मुक्ति’ का वीडियो बना रही हैं.

आजकल का ये चलन है कि कई भारी-भरकम शब्द मिलाकर गलत बातों को सही साबित करने की कोशिश होती है. तभी तो एक जर्मन तानाशाह के शारीरिक अंगों की जानकारी देने में भी लोग तमाम वाद तलाश लेते हैं. शायद गोस्वामी तुलसी दास इसीलिए लिख गए थे, ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’

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