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हद है! ट्रोल्स के लिए बाहुबली हिंदूवादी फिल्म हो गई और वो गालियां देने लगे

बाहुबली2 की आलोचना करने के लिए एना वेट्टीकाड को ट्रोल किया गया था, ये उनका जवाब है.

Anna MM Vetticad | Published On: May 07, 2017 03:46 PM IST | Updated On: May 07, 2017 03:46 PM IST

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हद है! ट्रोल्स के लिए बाहुबली हिंदूवादी फिल्म हो गई और वो गालियां देने लगे

'कहानी आप नहीं हैं. आप किस्सागो हैं. किसी घटना को सिर्फ बयां कर रहे हैं. आप उस घटना के किरदार नहीं हैं. आप उसके चश्मदीद मात्र हैं'.

पिछले आठ सालों से, जब से मैंने पढ़ाने का काम शुरू किया है, तब से न जाने कितनी बार मैंने ये बात अपने छात्रों को बताई होगी. एक पत्रकार को खबर बताते वक्त अपनी हस्ती को मिटा देना होता है. हमें बात को अपने ऊपर केंद्रित नहीं रखना चाहिए. हमारी जिम्मेदारी अपनी खबर, अपनी कहानी के किरदारों को उजागर करना है, खुद को नहीं. मैंने ये बात भी अपने शागिर्दों को कई बार कही होगी.

जब मेरे संपादक ने मुझसे कहा कि मुझे बाहुबली को लेकर सोशल मीडिया पर हुई ट्रॉलिंग पर लिखना चाहिए, तो अपनी यही बातें याद करके मैं हिचकिचा रही थी. संपादक ने फैसला मुझ पर छोड़ दिया था. मेरे खिलाफ सांप्रदायिक नफरत का जहर उसी वक्त से उगला जा रहा था, जब मैंने बाहुबली-2 का रिव्यू फ़र्स्टपोस्ट के लिए लिखा था.

पत्रकारिता के उसूलों की एक बात और भी है. जिसके मुताबिक आपका खुद का तजुर्बा, जमाने के लिए खबर या कहानी बन जाता है. तब उसे बयां करना, दूसरों से साझा करना जरूरी हो जाता है.

बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज मैं खबरची नहीं. आज मैं अपनी ही कहानी की किरदार हूं. आज मैं अपना ही तजुर्बा आप लोगों से साझा कर रही हूं.

फिल्म समीक्षक के तौर पर हम अक्सर किसी कलाकार के फैन्स के गुस्से का शिकार होते हैं. जब भी हम उनके पसंदीदा स्टार के खिलाफ लिखते हैं, तो वो हमें निशाना बनाते हैं. मगर, धर्म की बुनियाद पर किसी फिल्म समीक्षक को निशाना बनाने का चलन नया है.

इसीलिए सोशल मीडिया पर मेरे खिलाफ जो कहा गया, उसे यहां बताना जरूरी है. क्योंकि मेरा निजी तजुर्बा, एक खबर भी है, सबक भी और समाज में आ रहे बदलाव का संकेत भी है.

ट्विटर पर आए एक कमेंट की एक मिसाल देखिए, 'वामपंथी, ईसाई-इस्लामिक गुंडा अन्ना वेट्टिकाड भी अब फिल्मों की समीक्षा कर रही है. हिंदू धर्म के खिलाफ उसकी नफरत हिला देने वाली है'.

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'अन्ना वेट्टिकाड को बाहुबली फिल्म देखना कितना बड़ा टॉर्चर लगा होगा. एक ऐसी फिल्म जिसमें हिंदू रीति-रिवाजों की बुराई करने के बजाय उनका जश्न मनाया गया'.

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'बाहुबली फिल्मों के खिलाफ तुम्हारी नफरत तुम्हारे लेख में साफ झलकती है. सबको इसकी वजह मालूम है. मैं इसका संकेत देता हूं, ये H से शुरू होकर Indu पर खत्म होता है'.

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और भी बहुत कुछ मेरे खिलाफ ट्विटर पर लिखा गया. जब मैंने नफरत भरे इन ट्वीट्स का स्क्रीनशॉट लेकर इसके बाकी लोगों के देखने के लिए ट्वीट किया तो उसका जवाब भी देखिए, 'बिच, तुमने सारी जिंदगी हिंदुओं की निंदा की है. बाकी धर्मं की निंदा तो की नहीं कभी तुमने. इसलिए तुम्हारी बात पर कोई यकीन नहीं करेगा'.

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एक और ने लिखा, 'पोप का पेशाब पीने वाली, तुम हिंदुओं के जश्न की तस्वीरें बर्दाश्त नहीं कर सकतीं'.

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एक और ने लिखा कि, 'किसी फिल्म का रिव्यू पढ़ने से पहले आपको लेखक का नाम देखना चाहिए. अगर वो अन्ना वेट्टिकाड है, तो वो हिंदू नाम का जिक्र भी होगा तो फिल्म की ऐसी-तैसी कर देगी'.

एक और ने ट्विटर पर मेरे रिव्यू के जवाब में लिखा, 'सिर्फ 2.5 स्टार! हद है. अगर फिल्म में किसी खान या तुगलक ने काम किया होता, तो तुम पक्का उसे 5 स्टार देतीं'.

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किस और ने लिखा, 'तुम सबसे खराब फिल्म समीक्षक होग. हमें पता है कि तुम बाहुबली-2 जैसी हिंदूवादी फ़िल्मों की बुराई ही करोगी. जाओ उर्दूवादी बॉलीवुड की फिल्मों का लुत्फ उठाओ'.

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इसी शख्स ने आगे लिखा 'ये फिल्म एक हजार करोड़ से ज्यादा कमाएगी और बॉलीवुड में खानों का और उर्दू वालों का राज खत्म करेगी...बॉलीवुड में तो दाऊद, उसकी बहन और कसाब पर ही फिल्में बनती आई हैं'.

कई और लोगों ने ट्विटर पर मेरा नाम बिगाड़ा. किसी ने वेट्टी लिखा तो किसी ने पत्ती लिखा. मलयालम में इसका मतलब कुत्ता होता है. शायद मुझे गाली देने के लिए वो मेरे नाम के साथ काफियाबंदी की कोशिश कर रहे थे.

इसकी तमाम मिसालें आप देख सकते हैं.

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मैं इन तमाम गालीवादियों का हौसला नहीं बढ़ाऊंगी. मैं उनके बारे में लिखकर उनको तवज्जो नहीं देना चाहती.

लेकिन यहां जरूरी है कि ऐसे निजी हमलों की पड़ताल की जाए. ये इसलिए जरूरी है कि पिछले कुछ सालों में फिल्मों के बारे में होने वाली ऑनलाइन चर्चा में ये एक नया चलन शुरू हुआ है.

आपने देखा होगा कि बाहुबली-2 फिल्म को आम तौर पर काफी सराहा गया है.

यही वजह है कि बाहुबली के फैन हम जैसे मुट्ठी भर लोगों से बेहद खफा हैं. उन्हें लगता है कि फिल्म की कामयाबी के जश्न में हम जैसे लोगों ने खलल डाला है. वो अपनी पसंद की राय न होने पर उसे बर्दाश्त करना नहीं जानते. इंडियन एक्सप्रेस की शुभ्रा गुप्ता को भी मेरी तरह हमले झेलने पड़े हैं. एक बाहुबली फैन ने शुभ्रा पर तो भारतीय न होने तक का आरोप लगा दिया.

इसी तरह एनडीटीवी पर सायबल चटर्जी को भी बाहुबली के फैन्स के गुस्से का शिकार होना पड़ा है. चटर्जी पर तेलुगू सिनेमा से नफरत करने और शहरी वामपंथी होने का इल्जाम भी लगाया गया. चटर्जी के बारे में लिखा गया कि वो बंगाली है इसलिए इस दुनिया की हर चीज की निंदा करना जरूरी समझता है.

यहां कुछ बातें समझनी जरूरी हैं.

पहली बात तो ये कि हम जैसे लोगों पर निजी हमले चौंकाने वाले नहीं हैं. फिल्म समीक्षक ऐसे हमलों के शिकार होते रहे हैं.

दूसरी बात ये कि इन हमला करने वाले सोशल मीडिया ट्रॉल्स ने बाहुबली सीरीज की फिल्मों को हिंदू फिल्में करार दिया है.

तीसरी बात ये कि मैं इन लोगों के इस आरोप से इत्तेफाक नहीं रखती कि बाहुबली की खराब समीक्षा इसलिए की गई क्योंकि ये तेलुगू फिल्म थी. मेरा मानना है कि उत्तर भारत के अंग्रेजी मीडिया में हिंदी फिल्मों के प्रति एक लगाव, एक झुकाव है. ये बाकी भाषाओं की फिल्मों के बारे में उतनी चर्चा नहीं करते, जितनी हिंदी फिल्मों की खबरें छापते हैं. बाहुबली सीरीज की फिल्में और रजनीकांत की फिल्में इसका अपवाद हैं. इस मुद्दे पर तो अलग से बहस की जानी चाहिए.

चौथी अहम बात ये है कि बाहुबली भले ही हिंदी फिल्म न हो, मगर बाहुबली के ये ट्रॉल, बॉलीवुड के तीन खानों की कामयाबी से नाखुश हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि वो हिंदू नहीं हैं. इसीलिए उन्हें उर्दू वाले कहकर व्यंग किया जा रहा है.

और पांचवी बात ये कि जैसा सांप्रदायिक जहर मेरे खिलाफ उगला गया, वैसा जहर पिछले तीन सालों से लगातार ऑनलाइन उड़ेला जा रहा है. इसके निशाने पर निरपेक्ष फिल्म समीक्षा और फिल्मों की चर्चा है. यानी सिनेमा के सांप्रदायिकरण की कोशिश हो रही है.

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फिल्म के पोस्टर्स से भी अजोबीगरीब तरीके से छेड़छाड़ की गई

फिल्मों और फिल्मी सितारों को लेकर फैन्स में अक्सर जुनून पैदा होता है. जब इस जुनून को अपनी पसंद की राय नहीं मिलती. जब इस जुनून से भरे लोगों को हम जैसे लोगों के लेख मिलते हैं, जो फिल्मों पर सवाल खड़े करते हैं, तो वो नफरत से भर उठते हैं. फिर वो हमारी काबिलियत और हमारी ईमानदारी पर सवाल उठाते हैं. गाली-गलौज करते हैं

लेकिन बाहुबली के समर्थक ट्रॉल्स का बर्ताव इससे भी आगे का है. हिंदू कट्टरपंथी, लंबे समय से बॉलीवुड में तीन खानों के राज से नाखुश हैं. उन्हें फिल्मी दुनिया की धर्मनिरपेक्षता रास नहीं आती.

नब्बे के दशक में ये हिंदू कट्टरपंथी बहुत कम तादाद में थे. समाज की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं थे. कुछ लोगों को याद करना चाहिए कि जब साल 2000 में ऋतिक रोशन की फिल्म कहो न प्यार है ने कामयाबी के झंडे गाड़े थे, तो संघ परिवार ने एक हिंदू सितारे के उदय का जश्न मनाया था.

ये आडवाणी की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद के ढहने और मुंबई के दंगों और बम धमाकों के बाद का दौर था. देश बड़ी उथल-पुथल से गुजर रहा था. लेकिन उस दौर में भी हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने फिल्मों और सितारों को हिंदू-मुस्लिम के खांचे में बांटकर देखना नहीं शुरू किया था. साल 2000 में भी बीजेपी केंद्र में सरकार चला रही थी. लेकिन तब बीजेपी उतनी ताकतवर नहीं थी, जितनी आज है. जब 2006 में आमिर खान ने नर्मदा बचाओ आंदोलन को लेकर अपनी राय रखी, तब से वो संघ परिवार के दुश्मनों की लिस्ट में शामिल हो गए. बीजेपी शासित गुजरात में उनके पुतले जलाए गए. उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

फिर 2010 में आईपीएल से पाकिस्तानी खिलाड़ियों को अलग रखने का विरोध करके शाहरुख खान, शिवसेना का निशाना बन गए. क्योंकि शाहरुख ने शिवसेना के आगे झुकने से इनकार कर दिया था. आमिर खान की फिल्म फना (2006) पर गुजरात में पाबंदी लगा दी गई थी. शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज खान (2010) में विरोध के बावजूद पूरे देश में रिलीज की गई. दोनों ही फिल्में बेहद कामयाब रहीं. उस वक्त देश में कांग्रेस का राज था. इन फिल्मों की कामयाबी से हिंदूवादियों के दिल जल गए थे. संघ परिवार और कट्टरवादी हिंदुओं से टकराव के बावजूद तीनों खानों की लोकप्रियता कम नहीं हुई. फिल्मी दुनिया धर्मनिरपेक्ष रही.

लेकिन नरेंद्र मोदी की शानदार चुनावी जीत और एक के बाद एक मिलती सियासी कामयाबी ने अब मंजर पूरी तरह बदल दिया है. अब फिल्म समीक्षा को लेकर ऑनलाइन कट्टरता ने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं. सोशल मीडिया पर उस वक्त तूफान सा आ गया जब आमिर खान और शाहरुख खान ने 2015 में देश में बढ़ती असहिष्णुता पर फिक्र जताई. हिंदूवादी बातें करने वाले सोशल मीडिया के ये ट्रॉल और लेखक, इन सितारों खिलाफ खड़े हो गए.

इनकी नीयत पर बहस छेड़ दी. इस बहस में कट्टरवादियों ने उन दर्शकों को भी शामिल कर लिया जो फिल्मों को धार्मिक चश्मे से नहीं देखते थे. तब से सोशल मीडिया पर सितारों, समीक्षकों और फिल्मों के धार्मिक बंटवारे का दौर तेज हो गया. आज ऑनलाइन कट्टरपंथी धर्मनिरपेक्षता पर लगातार हमले कर रहे हैं. वो कलाकारों को हिंदू और मुसलमान कहकर बुलाते हैं. वो फिल्म समीक्षकों को हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के खांचे में रखते हैं. अब ये बात बेहद आम हो गई है.

मैंने इसी साल लिखा था कि जिस वक्त शाहरुख खान की फिल्म रईस और ऋतिक रोशन की काबिल रिलीज हुई, तो, संघ लॉबी ने सोशल मीडिया पर मुहिम छेड़ दी थी. वो चाहते थे कि दर्शक हिंदू कलाकार ऋतिक रोशन की फिल्म काबिल को रईस पर तरजीह दें, और उसे ही देखें, ताकि हिंदू सितारे ऋतिक की फिल्म हिट हो.

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बहुत से लोग होंगे जो मेरी बात से सहमत नहीं होंगे. उन्हें लगेगा कि मैं बेबुनियाद इल्जाम लगा रही हूं. लेकिन उन्हें इन ऑनलाइन ट्रॉल्स के लिखने के पैटर्न और उनकी भाषा को देखना होगा. जिस वक्त ये हिंदू कट्टरपंथी, रईस के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए थे. उस वक्त बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने ट्विटर पर काबिल फिल्म का कुछ इस तरह से प्रमोशन किया था, 'जो रईस देश के नहीं वो किसी काम के नहीं.

हमें ऐसे काबिल लोगों के साथ खड़े होना चाहिए जो देशभक्त हैं. अब ये काबिल जनता की जिम्मेदारी है. काबिलों का हक बेईमान रईसों के हाथों नहीं मारा जाना चाहिए'. विजयवर्गीय ने कहा कि वो तो नोटबंदी को लेकर अपनी बात रख रहे थे. मगर उनका ट्वीट देखकर यकीन करना मुश्किल है.

इन कट्टरपंथियों के हीरो ऋतिक रोशन, अजय देवगन और अक्षय कुमार हैं क्योंकि वो हिंदू हैं. अजय देवगन तो लंबे वक्त से मोदी के समर्थक रहे हैं. इसी तरह 2014 से अक्षय कुमार ने सिर्फ देशभक्ति वाली फिल्में ही करने का फैसला किया, जो आज के हुक्मरानों का सबसे पसंदीदा विषय है. फिलहाल ऋतिक रोशन ने तो ऐसा कुछ नहीं किया कि उनका झुकाव इन कट्टरपंथियों की तरफ जाहिर हो. हालांकि उन्हें इसका फायदा जरूर मिल रहा है.

ऑनलाइन हिंदूवादियों की कट्टरता की सिर्फ यही मिसालें नहीं हैं. 2015 में इन ट्रॉल्स ने शाहरुख खान की फिल्म दिलवाले का बायकॉट करने को कहा. इसी तरह आमिर खान के स्नैपडील का ब्रांड एंबेस्डर होने पर इन लोगों ने सोशल मीडिया पर स्नैपडील के खिलाफ मुहिम चलाई. आमिर खान को Incredible India के अभियान के ब्रांड एंबेस्डर से हटा दिया गया. इसके कुछ महीनों बाद उस वक्त के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इशारों में ये मान लिया था कि उनकी पार्टी की तरफ से एक सोशल मीडिया टीम ने स्नैपडील के खिलाफ मुहिम चलाई थी.

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आमिर खान कई बार ट्रोल्स के निशाने पर आए

हालांकि सलमान खान इस तरह के नफरत भरे अभियान के शिकार नहीं हुए. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि उन्हें मुसलमान होने का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ा. लेकिन, जब से 2014 के प्रचार अभियान के दौरान सलमान खान, मोदी के साथ नजर आए थे, तब से वो ऑनलाइन हिंदूवादियों के निशाने पर आने से बचे हुए हैं. उन्हें आम तौर पर तभी निशाना बनाया जाता है जब बॉलीवुड के तीनों खानों पर एकसाथ हमला किया जाता है.

सलमान के लिए अच्छी बात ये भी है कि उनके पिता सलीम खान, मोदी के करीबी हैं. 2014 में सलीम खान ने मोदी के बारे में एक उर्दू वेबसाइट का उद्घाटन किया था. खुद सलमान खान भी ऐसे मुद्दों पर कुछ भी कहने से बचते रहे हैं, जिससे वो बीजेपी या सरकार समर्थकों के निशाने पर आ जाएं.

यूं तो ये सारी बातें हिंदी सिनेमा से जुड़ी हैं. मगर फिल्मों का ऑनलाइन सांप्रदायिकरण बाहुबली सीरीज की तेलुगू फिल्मों की वजह से ज्यादा हुआ है. बाहुबली-1 2015 में आई थी. और अब बाहुबली-2 आई है. शायद हिंदूवादियों की ऑनलाइन आर्मी को लगता है कि अगर अक्षय कुमार, अजय देवगन और ऋतिक रोशन, खानों का राज नहीं खत्म कर पाए हैं, तो अब ये काम दूसरे फिल्म उद्योग के सितारे करेंगे. बीजेपी पर हमेशा हिंदी बेल्ट की पार्टी होने का आरोप लगता रहा है. शायद यही वजह है कि बीजेपी के समर्थक ट्रॉल के निशाने पर हिंदी फिल्म उद्योग ही रहा.

इस दौरान, 2015 में भी मैं इस नफरत की शिकार हुई थी. तब मैने द हिंदू के बिजनेसलाइन में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था, अवंतिका का बलात्कार. मैंने इसमें बाहुबली फिल्म में अवंतिका के यौन शोषण को लेकर लिखा था. फिल्म बाहुबली-1 में शिवुडू उर्फ शिवा के हाथों अवंतिका उसकी सेक्स स्लेव ही बनती दिखाई गई थी. उस वक्त तक मुझे सिर्फ राजनैतिक मसलों को लेकर ही निशाना बनाया जाता रहा था. मुझे ईसाई धर्मांध कहा जाता था. पर उस लेख को लेकर पहली बार मेरी फिल्म समीक्षा को सांप्रदायिक करार दिया गया था.

बाहुबली फिल्म की समीक्षा को लेकर जितना ही मुझे निशाना बनाया गया, उतना ही मुझे समर्थन भी मिला है. ऐसे लोग मेरे साथ खड़े हुए हैं, जो फिल्मों के भी फैन हैं और जो ऐसी बहस का हिस्सा भी बनना चाहते हैं. Daily O नाम की वेबसाइट ने तो मेरे समर्थन में एक लेख भी लिखा, जबकि मैं खुद अपने हक में ये लेख लिखने से कतरा रही थी.

मैं यहां साफ कर दूं की ट्रॉल शब्द कहकर अपने विरोधियों को हल्के में लेते हुए खारिज नहीं कर रही हूं.

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ट्रॉल वो हैं जो बेवजह आक्रामक हो रहे हैं. ऑनलाइन गाली-गलौज कर रहे हैं. जो धमकियों और निजी हमलों से डराना चाहते हैं. जो अपनी पहचान और धार्मिक आस्था, जाति और लिंग के हवाले से आप पर हमले कर रहे हैं. पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया पर मुझे बहुत सारा तजुर्बा हुआ है. यहां पर समझदार, सुलझे हुए और शालीन लोग भी हैं. ऐसे विरोधी भी हैं जो बेहद सज्जनता से विरोध करते हैं. अपना ऐतराज जताते हैं.

लेकिन उन लोगों से बात या बहस करना मुमकिन नहीं जो धार्मिक नफरत वाली जुबान बोलते हैं. मुझे लगता है कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने वाले जवाब के भी हकदार नहीं. हां, उनके नाम जरूर उजागर होने चाहिए. जिससे आम लोग उनकी हरकतों को देखें, समझें. जो उनकी नफरत भरी मुहिम से सावधान रहें. वो चाहते हैं कि डरा-धमकाकर हमारे अंदर उनके जैसी सोच और जबान पैदा करें. ठीक उसी तरह, जिस तरह वो आम जिंदगी में कट्टरपंथी हरकतों से हमें डराना दबाना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि हम खाने-पीने, पढ़ने से लेकर शादी-ब्याह और अब फिल्में देखने का फैसला भी उनके हिसाब से करें.

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