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हिंदुत्ववादी अराजक गुंडों पर नकेल कसना योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी चुनौती

अगर योगी ऐसा करने में विफल रहे तो यही साबित होगा कि वे सिर्फ कागज के शेर हैं

Sreemoy Talukdar Updated On: Apr 26, 2017 11:19 AM IST

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हिंदुत्ववादी अराजक गुंडों पर नकेल कसना योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी चुनौती

खराब कानून व्यवस्था उत्तर-प्रदेश में एक प्रमुख चुनावी मुद्दा था. इससे चुनाव में समाजवादी पार्टी को भारी नुकसान हुआ और 14 साल बाद सूबे की सत्ता हासिल करने में बीजेपी को मदद मिली.

पांच बार सांसद रह चुके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नो-नॉनसेंस प्रशासक की छवि है. उन्होंने गोरखपुर में कानून का राज स्थापित किया था. उन्हें 1990 के दशक के अराजक गोरखपुर को कानून का पालन करने वाले शहर में बदलने का श्रेय जाता है.

लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनका एक महीने का कार्यकाल अगर कोई संकेत देता है तो वह यह है कि उन्हें आगे बहुत कुछ करना होगा.

सामाजिक तौर पर देखें तो कानून बेहद नाजुक मामला है. इसे लागू करने वाला कमजोर हो या उसमे संकल्प की कमी हो तो ये बड़ी आसानी से अराजकता में तब्दील हो जाती है.

अखिलेश सरकार ने अपने शासनकाल के ज्यादातर हिस्से में कानून व्यवस्था का जिम्मा अपराधियो और गुंडों के हवाले कर दिया था. इन गुंडों ने सूबे में समानांतर सत्ता स्थापित की और राज्य के रसूख को हाशिए पर पहुंचा दिया. इसका परिणाम सबको मालूम है.

कुछ लोग मानते हैं कि राज्य में खराब कानून व्यवस्था से जनता का ध्यान हटाने के लिए ही समाजवादी कुनबे में कलह का नाटक किया गया था.

Akhilesh Yadav

अखिलेश सरकार पर अपराध के आंकड़ों में छेड़छाड़ का आरोप लगा था

आंकड़ों से छेड़छाड़

मीडिया में खबरें आई थीं कि अपराध को कम दिखाने के लिए यूपी पुलिस ने आंकड़ो की बाजीगरी की थी. यह काम समाजवादी सरकार को शर्मसार होने से बचाने और चुनाव प्रचार के दौरान कुछ बोलने लायक छोड़ने के लिए किया गया था.

लिहाजा ज्यादातर जघन्य अपराध दर्ज ही नहीं किये गये या फिर उन्हें आईपीसी की जगह स्थानीय विशेष कानूनों (स्पेशल लोकल लॉज – एसएलएल) के तहत दर्ज किया गया ताकि वे नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की जद में आने से बच सकें.

एनसीआरबी ने 2015 में उत्तर प्रदेश के अपराध के आकंड़ों में इस गड़बड़ी को सबके सामने ला दिया था. इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक एनसीआरबी में देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश में आईपीसी के तहत 112 मामले ही दर्ज थे जबकि उस दौरान दिल्ली में यह आंकड़ा 917 था.

जब एसएलएल के आंकड़ों पर गौर किया गया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. दोनों आंकड़ों को मिलाकर उत्तर प्रदेश में जघन्य अपराध के आंकड़े 1293 पर पहुंच गए- यानी आईपीसी के तहत दर्ज आंकड़ों के मुकाबले दस गुना ज्यादा अपराध.

वहीं दोनों आंकड़ों को मिलाकर दिल्ली का आंकड़ा 958 पर रहा- यानी आईपीसी के आंकड़े के ही आसपास. अपराध के दूसरे संकेतकों से भी इसी तरह के नतीजे सामने आए.

अखिलेश राज में दंगा, अपहरण, फिरौती, बलात्कार और हत्या जैसे मामले बढ़े लेकिन प्रशासन इससे लगातार इनकार करता रहा. समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने बुलंदशहर में मां और बेटी के बलात्कार को 'राजनीतिक साजिश' करार दिया था.

gayatri prajapati

गायत्री प्रजापति पर रेप का आरोप लगने के बाद एसपी डिफेंस मोड में आ गई थी

गायत्री प्रजापति पर आरोप

पुलिस बलात्कार के आरोपी मंत्री गायत्री प्रजापति को 'पकड़ने में नाकाम' थी और चुनाव प्रचार के दौरान समाजवादी पार्टी के एक विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली लड़की की हत्या कर दी गई थी.

बीजेपी ने वादा किया था कि वह सूबे की सत्ता में आई तो कानून का राज स्थापित करेगी. योगी आदित्यनाथ अब अपने वादे और प्रदर्शन के बीच की दूरी को पाटने में जुटे हैं.

योगी आदित्यनाथ तेज रफ्तार से चल रहे हैं. उन्होंने नौकरशाही में व्याप्त सड़ांध को दूर करने के सराहनीय संकल्प का प्रदर्शन किया है. पिछली सरकारों के दौरान नौकरशाही सत्ता के साथ भ्रष्टाचार में संलिप्त रही है.

योगी के कार्यभार संभालने के बाद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले 'सब चलता है' का रवैया बदल रहा है. जवाबदेही तय हो रही है. कुछ जिलाधिकारियों समेत तमाम आईएएस और आईपीएस अफसरों का तबादला हो गया है. रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुके बहुत से कर्मचारियों को नमस्ते कर दिया गया.

अधिकारियों को रिश्वतखोरी के खिलाफ चेताया जा चुका है. योगी ने अपने मंत्रियों को खुद की संपत्ति का ऐलान करने का निर्देश दिया है.

व्यक्तिगत इमानदारी को काम और वादे का मानक बना दिया गया है. किसानों का कर्ज माफ हो गया है. निरंतर बिजली की आपूर्ति पर काम शुरू हो गया है.

सरकार ने नर्सरी से ही अंग्रेजी शिक्षा के अलावा शैक्षणिक संस्थानों में फीस को तर्कसंगत बनाने और ज्यादा मेडिकल कॉलेज खोलने का वादा किया है.

यह एक महीने के मुख्यमंत्री का बेहद आकर्षक रिपोर्ट कार्ड है. लेकिन कानून व्यवस्था को पटरी पर लाना योगी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है और यह बेहद मुश्किल काम है.

हाल के दिनों में पुलिस थानों पर हमले, आगजनी, सरकारी संपत्ति का नुकसान और अधिकारियों को मारने-पीटने और धमकाने की कई घटनाएं सामने आई हैं. ये घटनाएं बीमारी के गंभीर होने के लक्षण हैं.

CM Yogi

योगी सरकार राज्य में महिलाओं की सुरक्षा और बेहतर कानून व्यवस्था के दावे के साथ सत्ता में आयी है

योगी सरकार से उम्मीदें

इस बीमारी की रोकथाम के लिए योगी सरकार को पहले जांच-पड़ताल करनी होगी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की ताकत घटी है. अपराधियों और अराजक तत्वों में पुलिस-प्रशासन का खौफ न होना किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द होता है.

हालांकि, उत्तर प्रदेश के इस हालात के लिए योगी जिम्मेदार नहीं हैं. लेकिन इसे बदलने की जिम्मेदारी उन पर है. शानदार जीत से हिंदुत्ववादी संगठनों में पैदा हुआ गुरूर भी उनकी राह को कठिन बनाएगा.

लिहाजा, यह सिर्फ कानून व्यवस्था का ही मामला नहीं रहा. कानून-व्यवस्था की बहाली एक राजनैतिक चुनौती बन गई है. जिस तरह बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदुत्ववादी गुंडों ने आगरा में पुलिस थानों पर तांडव किया उससे यही साबित होता है कि उनमें कानून का कोई डर नहीं है.

इन हिंदुत्वादियों ने एक आरोपी को छुड़ाने के लिए ऐसा किया था. आखिर ऐसे हालात पैदा कैसे हुए? इसके दो कारण हैं. पहला, उत्तर प्रदेश में अब कोई भी पुलिस से नहीं डरता. यह पिछली समाजवादी सरकार की विरासत है.

दूसरा, हिंदुत्व ध्वजावाहक होने का दावा करने वाले गुंडे मानते हैं कि अराजकता फैलाने का अब उनका वक्त आ गया है. दावे और सच्चाई में भले ही जमीन-आसमान का अंतर हो लेकिन इन पर लगा हिंदुत्व का ठप्पा इन्हें मनमानी करने का मौका देता है और राजनैतिक संरक्षण भी मुहैया कराता है.

लेकिन ये घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती हैं और बदनामी को न्योता देती हैं. अगर योगी आदित्यनाथ प्रदेश में कानून-व्यवस्था बहाल करने के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें इन गुंडों को बेनकाब करना होगा और उन्हें कानून की ताकत दिखानी पड़ेगी.

एक दक्षिणपंथी छात्र संगठन का सदस्य किसी पुलिस अधिकारी को थप्पड़ मारने का दुस्साहस करे तो इससे पुलिस बल में बहुत ही गलत संदेश जाता है. योगी को प्रशासनिक सख्ती के साथ राजनैतिक इच्छाशक्ति भी दिखानी होगी.

उन्हें ये सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे तत्वों के खिलाफ दर्ज मामलों की तर्कसंगत परिणति हो और राज्य में पुलिस प्रशासन किसी भी दबाव में न आए.

अगर योगी ऐसा करने में विफल रहे तो यही साबित होगा कि वे सिर्फ कागज के शेर हैं.

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