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सीएम योगी आदित्यनाथ: नेहरू की धर्मनिरपेक्षता का हुआ अंतिम संस्कार! 

वहम पालने की जरूरत नहीं है क्योंकि नेहरूवादी सेक्युलरिज्म के दिन अब लद गये हैं

Sreemoy Talukdar Updated On: Mar 21, 2017 08:30 PM IST

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सीएम योगी आदित्यनाथ: नेहरू की धर्मनिरपेक्षता का हुआ अंतिम संस्कार! 

योगी आदित्यनाथ का यूपी का मुख्यमंत्री बनना जितना राजनीति का सवाल है उतना ही विचारधारा का भी. बीजेपी अब पूरे आत्मविश्वास में है और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता का अंतिम संस्कार कर रही है. इस राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत साल 2014 में ही हो चुकी थी.

सत्ता के सिद्धांत बदल जाएं तो इनके एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए क्या मायने निकलते हैं? यह सवाल गहराई से सोच-विचार की मांग करता है. इस सवाल पर हम तनिक ठहरकर विचार करेंगे...फिलहाल यही समझने की कोशिश करें कि राजनीतिक ताकत कैसे किसी विचारधारा का दबदबा कायम करती है?

मैं यहां स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि राजनीतिक ताकत हर सूरत में किसी विचारधारा के दबदबे की हालत कायम करे ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है. ऐसा कुछ शर्तों के अधीन होता है. कुछ जरूरी शर्तों के पूरे होने की स्थिति में सत्ता का बदलाव जरूरी हो जाता है.

और एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो जाए तो फिर पुरानी सूरत कायम नहीं की जा सकती है. मेरे ऐसा कहने का क्या मतलब निकलता है?

मेरे कहने का मतलब यह है कि बीजेपी के हिंदुत्व के सबसे प्रखर चेहरे को यूपी के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाकर नरेंद्र मोदी कांग्रेस-मुक्त भारत के अपने वादे की तस्वीर को अंतिम रूप दे रहे हैं. कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करना पहला कदम था. कांग्रेस सिर्फ राजनीतिक पार्टी ही नहीं है, वह एक राजनीतिक विचार भी है.

मोदी अब कांग्रेस के ‘आयडिया ऑफ इंडिया’ को बदल रहे हैं और इसकी जगह भारत का एक नया विचार पेश कर रहे हैं. मोदी के नए भारत के विचार की जड़ें भारत की बहुलतावादी धार्मिक परंपराओं में हैं.

यह यूरोपीय तर्ज की उस धर्मनिरपेक्षता के एकदम उलट है जो अब तक हमारे राजनीतिक विमर्श की रीढ़ हुआ करती थी. 2014 में एक ताकतवर पार्टी बनकर उभरने के बाद बीजेपी अब हिंदुस्तानियों को एक वैकल्पिक विश्वदृष्टि प्रदान कर रही है. यह विश्वदृष्टि हमारी बौद्धिक चौहद्दी के भीतर अबतक दबी-कुचली थी और उसे हाशिए पर रखा गया था.

भारत की विचारधारा की चौहद्दी में अब भारी उलट-फेर हो रहा है. यह बात बिल्कुल जाहिर है कि यूपी का जनादेश बहुत अहमियत रखता है और यह जनादेश एक राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य को हमेशा के लिए बदल सकता है. कैसा होगा यह भविष्य?

क्या हमारा भविष्य उज्ज्वल होगा या वह एकदम अंधकारमय होने जा रहा है? इस सवाल पर विद्वानों की राय अलग-अलग है.

Narendra Modi BJP

यूपी चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी दफ्तर जाते हुए पीएम मोदी

कुछ विद्वान जैसे कि सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के निर्देशक प्रताप भानु मेहता ने राजनीति की मुख्यधारा में ‘योगी’ के सिंहासन पर आ जमने को ‘नागवार और मनहूस’ करार दिया है तो अमेरिकी इंडोलॉजिस्ट (भारतविद्या के विशारद) और वेदों के जानकार डेविड फ्रॉले ने कहा है कि भारत को इस 'नए नेतृत्व से, जिसकी जड़ें धार्मिक परंपराओं में हैं, फायदा होगा.'

हालांकि, मुख्यधारा की मीडिया की ज्यादातर प्रतिक्रियाओं का स्वर अविश्वास और हताशा का है. मीडिया और देश के नागरिक-संगठन कह रहे हैं कि भारत 'हिंदुत्व की प्रयोगशाला' और 'अल्पसंख्यकों की कब्रगाह' में तब्दील हो जाएगा.

इन तर्कों के गुण-दोष की जांच का काम यहीं छोड़कर हम यह देखते हैं कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से ‘सेकुलरिज्म’ यानी धर्मनिरपेक्षता की चालू परिभाषा के सामने कैसे अपने वजूद का संकट आन खड़ा हुआ है.

धर्मनिरपेक्षता की चालू परिभाषा

धर्मनिरपेक्षता की चालू परिभाषा का रिश्ता यूरोप में चर्च और राज्य सत्ता के बीच चली बहस से है और इस बहस का रिश्ता यूरोप की उस घटना से है जिसे विचारों के इतिहास में 'एनलाइटेंमेंट' यानी प्रबोधन के नाम से जाना जाता है.

यूरोप में तब चर्च बहुत प्रभावशाली हुआ करता था और उसका आदमी की जिंदगी के तकरीबन हर पहलू पर भारी असर था. राज्यसत्ता को भी तब चर्च के असर की चौहद्दी में चलना पड़ता था.

जवाहर लाल नेहरू यूरोप के एनलाइटेंमेंट से बड़े प्रभावित थे. राष्ट्र-निर्माण के अपने जुनून में जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू-बहुल भारत में अल्पसंख्यकों के हितों की हिफाजत के लिए सेक्युलरिज्म की पश्चिमी धारणा को लाद दिया. उनके इरादे नेक थे लेकिन एक समस्या खड़ी हो गई.

यूरोपीय तर्ज का सेक्युलरिज्म अपने मूल रूप में चर्च और राज्यसत्ता का साफ-साफ अलगाव खोजता है. यूरोप में प्रचलित यह आधुनिक सोच भारतीय परंपराओं के साथ मेल नहीं खाती है. भारत में धर्म का अर्थ सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है. भारत में धर्म जीवन जीने के एक पूरे तरीके का नाम है.

हमारे यहां जब किसी को धार्मिक कहा जाता है तो इसका अर्थ सिर्फ इतना भर नहीं होता कि उस व्यक्ति का जीवन पूजा-पाठ में बीतता है बल्कि यह भी होता है कि वह व्यक्ति सत्य और न्याय के रास्ते पर चल रहा है.

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पीएम मोदी यूपी का सीएम बनने पर योगी आदित्यनाथ को बधाई देते हुए (फोटो: पीटीआई)

इस अर्थ में देखें तो धर्म इस या उस, 'रिलीजन' का नाम नहीं. हमारे यहां कोई मुसलमान या ईसाई भी धार्मिक हो सकता है बशर्ते वह धर्म के रास्ते पर चले.

नेहरू पश्चिम की दुनिया के पढ़े-लिखे थे. उन्होंने धर्म को 'रिलीजन' के अर्थ में देखा. जाहिर है, ऐसे में उन्हें लगा कि धर्म का आदमी की जिंदगी के हर पहलू पर बहुत ज्यादा अंकुश है और धर्म के प्रति वे सहज नहीं रह सके.

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नेहरू ने साफ-साफ लिखा कि,  'धर्म (रिलीजन) अपना महत्व खो चुका है, (अगर कभी कोई महत्व हुआ करता था तो) और इस शब्द से असमंजस पैदा होता है. न खत्म होने वाली बहस और तर्क-वितर्क का सिलसिला कायम होता है. बेहतर यही है कि अब इस शब्द का इस्तेमाल ही न किया जाए. (नेहरू अगेंस्ट नेहरुवियन्स: में राजीव भागर्व) 

सरलीकरण के चक्कर में बात को घटाकर  कहने का खतरा तो है. तो भी, यह कहना जायज जान पड़ता है कि नेहरूवादी विश्वदृष्टि और हिंदुस्तानियों की भरी-पूरी धार्मिक जिंदगी कोई मिलान न था.

नेहरू की नजर में भारतीय असभ्य

नेहरू की तुलना टेनिसन की कविता के नायक यूलिसस से की जा सकती है जिसे अपने राज्य के लोग असभ्य लगते थे, उनके लिए उसे असमान कानून लागू करने पड़ते थे और वह सोचा करता था कि, 'इन लोगों का काम खाना-सोना और सिक्के बटोरना है, ये लोग तो मुझे जरा भी नहीं जानते.'

गोपाल और आयंगर के हवाले से राजीव भार्गव, 'इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' के अपने लेख में लिखते हैं नेहरू हिंदू-राष्ट्र के विचार से खासतौर से चिंतित थे और मानते थे कि, 'कुछ लोगों को बेशक यह सुनकर बहुत अच्छा लगेगा कि हम हिंदू राष्ट्र का निर्माण करने जा रहे हैं लेकिन मैं समझ ही नहीं पाता कि इसका अर्थ क्या होता है.'

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भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी

इस लेख में नेहरू आगे कहते हैं, 'हिंदू इस राष्ट्र में बहुसंख्या में हैं और जो भी उनकी इच्छा होगी वह किया जाएगा लेकिन जैसे ही आप हिंदू-राष्ट्र की भाषा में बोलने में लगते हैं, उसे सिवाय एक राष्ट्र के और कोई नहीं समझ सकता. वह इकलौता राष्ट्र पाकिस्तान है क्योंकि वे लोग इस भाषा से परिचित हैं. वे इस्लामी राष्ट्र के अपने निर्माण को दुनिया के सामने झट से जायज ठहराते हुए कहेंगे कि देखो हमलोग कुछ वैसा ही कर रहे हैं. जो हिंदू नहीं हैं हिंदू-राष्ट्र उनकी हैसियत में कमी करेगा.'

हमारे इस लेख का विषय इस बात की परीक्षा करना नहीं है कि नेहरू सही सोचते थे या गलत. यहां मुद्दे की बात यह है कि कांग्रेस के भारी-भरकम और चुनौती विहीन दबदबे के कारण नेहरूवादी विश्वदृष्टि ने जड़ जमा ली है.

भारत के बुद्धिजीवियों के दिल में धर्म को लेकर नेहरू का नजरिया घर कर गया है. दबदबे की यह स्थिति दशकों तक कायम रही, लड़ाई के सारे पैंतरे अपनाए गए. जागीरदारी की बड़ी चौकसी से हिफाजत हुई, विरोध में उठने वाली तमाम आवाजों को या तो खामोश कर दिया गया या बड़े जतन के साथ उनके सुर बदल दिए गए.

जवाहरलाल नेहरू नैतिकता के अपने भाव-संसार में भले सबको समेटकर चलने के पक्षधर हों लेकिन उनकी राह पर चलने वाली बौद्धिक संतानें ऐसी कतई नहीं थीं.

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हिंदुस्तान टाइम्स के अपने लेख में स्वप्न दासगुप्ता ने लिखा है कि, 'लगातार छह दशकों तक बिना चुनौती के जारी रहने के कारण नेहरूवादी विचारों पर बनी सहमति ने बुद्धिजीवियों की दुनिया में कॉमन-सेन्स का रूप ले लिया. खासकर, उन लोगों के बीच जो विचारों के मामले में उदारता की मांग करने वाले पेशों में थे.'

दासगुप्ता के मुताबिक, 'ये तबका आत्ममोह के अपने दरबार में बैठकर ऐसे किसी को भी दरवाजे के भीतर घुसने से रोक देता था जो उसके वामपंथी और उदारवादी सोच के सांचे में सही नहीं बैठता हो. नतीजा यह हुआ कि नेहरूवादी सोच को चुनौती उस मुकाम से मिली जो बुद्धिजीवियों के विरोध के लिए जाना जाता है. आप इस चुनौती से बच भी नहीं सकते क्योंकि इसके पीछे चुनावी राजनीति का बल है.'

वक्त गुजरने के साथ नेहरूवादी तर्ज का सेक्युलरिज्म एकदम ही भ्रष्ट हो गया और आखिरकार उन सारी चीजों का पर्याय बन गया खुद नेहरू जिनके खिलाफ थे.

राजनीतिक विचारधारा को चुनौती

मोदी की अगुवाई में बीजेपी अपनी राजनीतिक ताकत के जोर में विचारधारा के इसी दबदबे को चुनौती दे रही है. इस मुकाम तक का सफर आसान नहीं रहा. हम अक्सर सरकारों के बदलने को सत्ता का सचमुच का बदलाव समझ लेने की भूल करते हैं.

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चुनाव प्रचार के दौरान लाल बहादुर शास्त्री के घर पहुंचे पीएम मोदी

सत्ता के स्वभाव में सचमुच का बदलाव तब होता है जब अकादमिक परंपराओं की लगाम सत्ता अपने हाथ में रखती है और बौद्धिक तथा राजनीतिक संवाद के मंचों तक पहुंचने के तमाम दरवाजों पर नजर रखते हुए देश के भावी नागरिकों को तैयार करती है.

कोई पार्टी सत्ता में पूरे पांच साल तक रह सकती है लेकिन ऐसा होने भर से उसे विचारधारा की चौहद्दी नये सिरे से तय करने की ताकत नहीं मिल जाती.

मोदी की जीत अपने विस्तार, विजन और अहमियत में भारी-भरकम है. इससे बीजेपी को सेक्युलरिज्म की उस कहानी को चुनौती देने का मौका मिला है जिसका आज दिन तक दबदबा चला आ रहा था.

इंडियन एक्सप्रेस में पिछले हफ्ते छपे अपने लेख में प्रताप भानु मेहता ने बीजेपी के इस कदम को भांपते हुए लिखा कि, 'बीजेपी अब संस्थाओं पर अपना दबदबा कायम करने के लिहाज से बड़ी मजबूत स्थिति में है. राज्यसभा से लेकर राष्ट्रपति के पद तक को एक नया रूप देने के लिहाज से इस जीत के बड़े गहरे मायने हैं.'

मेहता आगे कहते हैं, 'इस तरह का चुनावी, सामाजिक और सांस्थानिक दबदबा अनिवार्य रूप से बीजेपी को अपनी विचारधारा का वर्चस्व कायम करने की स्थिति में ले जाएगा. उसके सामने अब कहीं से कोई चुनौती नहीं रहेगी.'

बीजेपी की विचारधारा का यही दबदबा आज हमारी आंखों के आगे है. बीजेपी को लगता है कि जनादेश ने उसे हिंदू-राष्ट्र कायम करने तथा भारत के हवा-पानी के अनुकूल पड़ने वाले उस सेक्युलरिज्म की तरफ ले जाने का लाइसेंस दे दिया है जिसकी जड़ें भारत की बहुलतावादी धार्मिक परंपराओं में हैं.

हालांकि, अब भी खास जोर विकास पर ही रहेगा लेकिन वह ‘रामराज्य’ की चौहद्दी के भीतर होगा.

हिंदू संन्यासी बनाम मुख्यमंत्री

बहरहाल, इन मुहावरों पर नेहरूवादी सेक्युलरिज्म के लेंस से देखकर फैसला देना एक भूल कहलाएगा. यहां डेविड फ्रॉले की उस बात की याद दिलाना ठीक होगा जो उन्होंने ट्वीटर पर लिखी है. फ्रॉले ने लिखा है कि, 'योगी आदित्यनाथ यूपी के अब तक के सारे मुख्यमंत्रियों से बेहतर साबित होंगे. निष्ठावान हिंदू संन्यासी होने के नाते उनके शासन में इस बात की गारंटी होगी कि किसी के साथ भेदभाव ना हो, सबके साथ इंसाफ का बर्ताव हो.'

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योगी आदित्यनाथ नाथ परंपरा का पालन करते हैं, वे गोरखपुर मठ के महंत हैं

पद्म भूषण से सम्मानित फ्रॉले ने स्वराज मैग के लेख में कहा है कि, 'नाथपंथी योगी अहिंसा के व्रत का पालन करते हैं लेकिन वे हिंसा के खिलाफ लड़ाई भी करते हैं- 'साधु-संन्यासी और योगी अहिंसा के व्रत का पालन करते हैं लेकिन इस व्रत में यह भी शामिल है कि कोई अधर्मी हमला करे तो उससे लोगों को बचाया जाय.'

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फ्रॉ ने अपने लेख में आगे लिखा है, 'मुसलमान आक्रांता जब मंदिरों और तीर्थस्थलों को मटियामेट करने के लिए हमले कर रहे थे तो नाथपंथी योगी इस हमले से बचाव के लिए आगे की पांत में खड़े थे. गुरु गोविन्द सिंह के नेतृत्व में मुगलों से लड़ते हुए सिखों ने भी इसी क्षत्रिय धर्म को अपनाया. नेपाल के शूरवीर गोरखाओं में गोरखनाथ और नाथ-योगियों के जमाने से ही यह क्षत्रिय-परंपरा चली आ रही है. यहां तक कि ब्राह्मण और साधुओं ने भी दो हजार साल पहले सिकंदर के आक्रमण के वक्त उनसे लोहा लिया था.'

साधे-साफ शब्दों में कहें तो मोदी ने योगी आदित्यनाथ को यूपी के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाकर हिंदू-राष्ट्र की शुरुआत के संकेत दे दिए हैं.

हम बस यही उम्मीद लगा सकते हैं कि यह हिंदू-राष्ट्र अपने दायरे में इतना तंग नहीं होगा कि हिंदू पाकिस्तान लगने लगे. इस हिंदू-राष्ट्र को बहुत कुछ उसी तरह का होना चाहिए जिसकी ओर वामसी जुलुरी ने हफिंग्टन पोस्ट के अपने लेख में इशारा किया है.

जुलुरी ने लिखा है, 'नौजवान हिंदू अपने को एक महान सभ्यता का वारिस मानते हैं और मूल्यवान समझते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस सभ्यता का अतीत गौरवशाली रहा है बल्कि इसलिए भी कि इस सभ्यता में एक अाध्यात्मिक संदेश है और वही अाध्यात्मिक संदेश सबके साथ मिल-जुल कर रहने और सभी धर्मों की इज्जत करने के मनोभाव की बुनियाद में है.'

अगर देश के मुस्लिम...ईसाई...सिख...बौद्ध...जैन और अलग-अलग किस्म के लोग हिन्दू भाषा, रीति-रिवाज, जाति और इतिहास के आधार पर बंटे हुए हैं तो भी वे एक भूमि और इतिहास के गहरे साझीदार हैं.

वे ये अच्छी तरह से समझते हैं कि यह मनोभाव भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष होने के कारण नहीं बल्कि सभी धर्मों के साथ सम्मान का बर्ताव करने की प्राचीन हिंदू-विरासत की देन है.

यह सभ्यता और विचारधारा की जमीन पर होने वाला बदलाव है. लड़ाई की लकीर खिंच गई है. अभी तक ये लड़ाई खत्म नहीं हुई है. लेकिन, वहम पालने की जरूरत नहीं है क्योंकि नेहरूवादी सेक्युलरिज्म के दिन अब लद गये हैं.

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