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योगी आदित्यनाथ के यूपी में पुलिस को लगा एनकाउंटर का चस्का, अब तक 18...

अपराधियों का सफाया करने के नाम पर छोटे अपराधियों का एनकाउंटर करना कहां तक सही है?

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Sep 21, 2017 04:30 PM IST

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योगी आदित्यनाथ के यूपी में पुलिस को लगा एनकाउंटर का चस्का, अब तक 18...

उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नई व्यवस्था के तहत अपराध नियंत्रण पर आधिकारिक आंकड़े जारी किए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक योगी सरकार के 180 दिनों के कार्यकाल में पुलिस और अपराधियों के बीच 420 एनकाउंटर हुए. इनमें 15 कुख्यात अपराधी भी मारे गए हैं.

आखिरी के जो 15 एनकाउंटर हुए उनमें पुलिस ने 10 अपराधियों को मार गिराया. खास बात ये है कि ये आंकड़े 14 सितंबर तक जुटाए गए. यानी बीते 48 दिनों में पुलिस ने 10 अपराधियों को मुठभेड़ में ढेर किया. इससे जाहिर होता है कि उत्तर प्रदेश में हर पांचवें दिन एक अपराधी मौत के घाट उतार दिया गया.

दो दिन बाद 17 सितंबर को मुज़फ्फरनगर में...

उत्तर प्रदेश में अपराध नियंत्रण पर आधिकारिक आंकड़े जारी होने के महज दो दिन बाद यानी 17 सितंबर को पुलिस ने मुज़फ्फरनगर में जान मोहम्मद नाम के एक अपराधी को मुठभेड़ में मार गिराया. पुलिस का कहना है कि जान मोहम्मद ने पुलिस पर फायरिंग की थी.

तीन दिन बाद 18 सितंबर को इटावा में...

वहीं 18 सितंबर को इटावा में सुंदर यादव नाम के बदमाश ने भी पुलिस पार्टी पर फायरिंग की. जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने उसे भी ढेर कर दिया.

चार दिन बाद 19 सितंबर को ग्रेटर नोएडा में...

19 सितंबर को ग्रेटर नोएडा में बविंद्र नाम के अपराधी को एनकाउंटर में मार दिया गया. यहां भी वही रटी-रटाई दलील दी गई कि अपराधी ने पुलिसवालों को देखकर फायरिंग शुरू कर दी थी, लिहाजा मजबूरी में पुलिस को जवाबी फायरिंग करनी पड़ी.

एनकाउंटर को लेकर जोश में यूपी पुलिस

एनकाउंटर को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस इन दिनों खूब जोशो-खरोश में है. ऐसा लग रहा है कि अपराधियों को मारने के लिए पुलिस को लाइसेंस वापस मिल गया है. शायद यही वजह है कि एनकाउंटर के बहाने पुलिस लोगों को मनमाने ढंग से मौत के घाट उतार रही है. हालांकि पुलिस इन्हें हत्या नहीं मानती, बल्कि इनके लिए वो कानूनी तौर पर साफ-सुथरे और मर्दानगी से भरे शब्दों का इस्तेमाल करती है.

UP Police Dial 100

दरअसल पुलिस इन तथाकथित मुठभेड़ों को 'रैंबो का इंसाफ' या 'सिंघम की दहाड़' कह कर प्रचारित कर रही है. पुलिस का दावा है कि अपराधियों के सफाए का उसका अभियान आम जनता को पसंद आ रहा है.

इसलिए, कहना गलत नहीं होगा कि यूपी में फिलहाल मुठभेड़ों की बाढ़ आई हुई है. 15 सितंबर तक, बीते छह महीनों में 15 लोगों को मुठभेड़ों में मारा जा चुका है. जबकि 19 सितंबर को ये संख्या बढ़कर 18 हो गई.

पुलिस पर उठने लगे सवाल

उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर के नाम पर हो रही हत्याओं पर पुलिस के आला अधिकारी बेफिक्र नजर आ रहे हैं. इससे न सिर्फ पुलिस की खून पीने वाली प्रवृत्ति उजागर हुई है, बल्कि उसकी कार्यशैली पर सवाल उठना शुरू हो गए हैं. राज्य पुलिस हेडक्वार्टर में पब्लिक रिलेशन ऑफिसर और लखनऊ के एडिशनल एसपी राहुल श्रीवास्तव के एक ट्वीट से यूपी पुलिस का एनकाउंटर प्रेम साफ जाहिर हो जाता है.

लखनऊ के नजदीक 1 सितंबर को एक कथित भगोड़े अपराधी सुशील कुमार के एनकाउंटर में मारे जाने के बाद राहुल श्रीवास्तव ने ये ट्वीट किया था. जिसमें उन्होंने लिखा,- “#यूपी पुलिस एनकाउंटर एक्सप्रेस हाल्ट्स इन द कैपिटल....माइल्स टू गो”

राहुल श्रीवास्तव यह कहना चाहते थे कि यूपी पुलिस की एनकाउंटर एक्सप्रेस राजधानी लखनऊ में कुछ देर के लिए रुकी है...लेकिन अभी उसे बहुत आगे तक जाना है. इस ट्वीट से जाहिर है कि यूपी में मुठभेड़ों का ये सिलसिला फिलहाल थमने वाला नहीं है, क्योंकि पुलिस ने सूबे को अपराध मुक्त करने के लिए एनकाउंटर को सबसे आसान उपाय मान लिया है.

एडिशनल एसपी राहुल श्रीवास्तव ने एक दिन बाद, लखनऊ के एक स्थानीय अखबार की एक रिपोर्ट को रिट्वीट किया था. इस रिपोर्ट में सुशील कुमार के एनकाउंटर की खबर थी, जिसमें कहा गया था कि 'मुख्यमंत्री योगी के यमराज (पुलिस) की कार्रवाई जारी.' आप सभी बखूबी जानते हैं कि यमराज को मौत का देवता माना जाता है.

सुशील कुमार के एनकाउंटर के दो हफ्ते बाद यूपी पुलिस ने प्रदेश में हुई सभी मुठभेड़ों के आंकड़े सार्वजनिक किए. इन आंकड़ों को पेश करते वक्त एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) आनंद कुमार ने बहुत होशियारी से काम लिया और पुलिस के खूनी खेल को उचित ठहराया.

सरकार की मर्जी से एनकाउंटर

द हिंदू अखबार में आनंद कुमार का जो बयान छपा था, उसके मुताबिक, सभी एनकाउंटर समाज के हित को ध्यान में रखते हुए किए गए. इनमें सरकार की मर्जी और जनता की अपेक्षाएं शामिल थीं. पुलिस ने सभी कार्रवाइयां संवैधानिक और कानूनी शक्ति के दायरे में कीं.

एनकाउंटर के नाम पर की गईं ये हत्याएं कितनी कानूनी और संवैधानिक हैं ये हर कोई जानता है. लेकिन मुठभेड़ों का ये मुद्दा सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है. इस साल जून के शुरू में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इंडिया टीवी से बातचीत के दौरान कहा था, 'हम राज्य में और अराजकता नहीं होने देंगे, हमने पर्याप्त चेतावनियां दी हैं, अब हम बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं. अपराधी और गैंगस्टर या तो जेल में होंगे या राज्य से भाग जाएंगे.'

कुछ दिनों बाद, यूपी के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मुख्यमंत्री योगी के बयान में अपनी बात जोड़ते हुए कहा था, 'आज अपराधियों को इस बात से डर लगता है कि उन्हें अपराध छोड़ना होगा या यूपी छोड़ना होगा, या शायद ये दुनिया ही न छोड़ना पड़ जाए.'

Agra: UP BJP President Keshav Prasad Maurya addresses an election rally in Agra on Thursday. PTI Photo (PTI2_2_2017_000230B)

अपने डिप्टी केशव प्रसाद मौर्य की धमकी का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न सिर्फ समर्थन किया बल्कि उसे सराहा भी. योगी बोले थे, 'अगर अपराध करेंगे तो ठोक दिए जाएंगे.'

हाल ही में 16 सितंबर को उन्होंने न्यूज 18 उत्तर प्रदेश को दिए इंटरव्यू में कहा था, 'उत्तर प्रदेश में पुलिस अब गोली का जवाब गोली से देगी. पिछली सरकारों के विपरीत, मैंने अपराधियों से उपयुक्त तरीके से निपटने के लिए पुलिस को सभी जरूरी अधिकार दे दिए हैं.'

मुख्यमंत्री योगी के ऑफिशियल ट्विटर हैंडल @CMOfficeUP से 19 सितंबर को एक के बाद एक कई ट्वीट किए गए, जिनमें से एक ट्वीट में सूबे में हुई मुठभेड़ों को महिमा मंडित किया गया. अपनी सरकार की छह महीने की उपलब्धियों को गिनाते हुए योगी ने लिखा, '6 महीनों में 430 एनकाउंटर.' हालांकि उनके ट्वीट में खतरनाक अपराधियों के एनकाउंटर की तादाद 17 बताई गई, जबकि ये आंकड़ा अब बढ़कर 18 तक पहुंच गया है.

इन सब के बीच अहम बात ये है कि योगी सरकार ने सूबे को अपराध मुक्त करने के लिए हिंसा को वैधता प्रदान कर दी है. पुलिस अफसरों और सिपाहियों के रवैये को देखकर तो ऐसा ही लगता है.

तरक्की का शॉर्टकट!

उत्तर प्रदेश में पुलिसवालों के लिए एनकाउंटर तरक्की पाने का शॉर्ट कट हो गया है, लिहाजा हर कोई जल्द से जल्द अपना हिस्सा पाने की जुगत में लगा हुआ है. लखनऊ रेंज के आईजी जय नारायण सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली है, जिसमें उन्होंने लिखा है, 'गाजियाबाद से एक यादगार खबर.'

अपनी इस फेसबुक पोस्ट में जय नारायण सिंह ने एक अखबार की रिपोर्ट शेयर की है, ये रिपोर्ट तब की है जब जय नारायण गाजियाबाद में बतौर एसएसपी तैनात थे. इस रिपोर्ट की हेडलाइन थी, 'अब तक छप्पन नहीं, अट्ठावन.'

UPencounters

दरअसल ये लाइन बॉलीवुड की एक फिल्म से ली गई है, जो मुंबई पुलिस के 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' दया नायक से प्रेरित थी. अखबार की रिपोर्ट में जय नारायण सिंह को दया नायक से बेहतर बताया गया था, क्योंकि उन्होंने दया नायक से 2 एनकाउंटर ज्यादा किए थे.

अपराधियों से निपटने के मामले में योगी सरकार कुछ पुराने पुलिस अफसरों की मानसिकता से प्रभावित नजर आ रही है, जैसे कि जूलियो रिबेरो और केपीएस गिल. इन पुलिस अफसरों ने पंजाब में आतंकवाद और सीमा पार से घुसपैठ रोकने के लिए 'आंख के बदले आंख' के सिद्धांत को अपनाया था.

UP Police

लेकिन ये सोचने वाली बात है कि उत्तर प्रदेश के हालात इससे अलग हैं, वहां आतंकवाद नहीं है. ऐसे में रोजमर्रा होने वाले छोटे-मोटे अपराधों के लिए भी 'गोली के बदले गोली' की नीति कहां तक जायज है? कायदे में यूपी सरकार और पुलिस का ये रवैया सरासर अनैतिक और अनौपचारिक है.

छोटे अपराधियों का भी एनकाउंटर!

उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ एनकाउंटर में पकड़े गए या मारे गए ज्यादातर लोग छोटे-मोटे अपराधी हैं. उदाहरण के लिए 15 सितंबर के बाद मारे गए तीनों अपराधी- जान मोहम्मद, सुंदर यादव और बविंद्र के सिर पर 12000 से लेकर 15000 रुपए तक का इनाम था.

ऐसे में इन्हें उन कुख्यात और खतरनाक अपराधियों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता, जिनसे समाज को बहुत बड़ा खतरा हो. लखनऊ के एडिशनल एसपी राहुल श्रीवास्तव के ट्विटर अकाउंट  (@upcoprahul) की टाइमलाइन के मुताबिक, बविंद्र को उस वक्त मार गिराया गया, जब वो चुराई हुई होंडा सिटी कार और 1.5 लाख रुपए लेकर भाग रहा था.

अगर गुजरे जमाने की बात करें तो, एनकाउंटर के बाद पुलिस की ऐसी कहानियां आम बात रही हैं. राज्य के एक पूर्व डीजीपी का कहना है कि, हाल में हुए लगभग सभी एनकाउंटर संदिग्ध लग रहे हैं. पूर्व डीजीपी के मुताबिक, 'अगर आप रिकॉर्ड देखें तो एनकाउंटर में मारे गए सभी अपराधियों के सिर पर इनाम दिखाया गया है. यानी खतरनाक अपराधियों की श्रेणी में रखकर, उनके सफाए की तैयारी पहले ही कर ली गई थी.'

क्या एनकाउंटर ही एकमात्र रास्ता?

क्या इसे अपराधियों से निपटने का सभ्य तरीका माना जाना चाहिए? उत्तर प्रदेश के हालात न तो कश्मीर जैसे हैं, और न ही नॉर्थ ईस्ट जैसे, न ही वहां माओवादियों का खतरा है. फिर एनकाउंटर के नाम वहां इतना खून-खराबा क्यों? दरअसल उत्तर प्रदेश में ज्यादातर अपराध और अपराधी राजनीतिक संरक्षण का नतीजा हैं.

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(फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड में शामिल ज्यादातर टॉप गैंगस्टर किसी न किसी रूप में किसी नेता से जुड़े हुए हैं और उनका काम करते हैं. ऐसे में इन गैंगस्टर को उस नेता का संरक्षण मिला रहता है. जबकि कई गैंगस्टर तो चुनाव जीतकर खुद भी नेता बन गए हैं.

पुलिस रिकॉर्ड्स में ब्रजभूषण शरण सिंह, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, रमाकांत यादव, डीपी यादव, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी के नाम बड़े अपराधी या गैंगस्टर के तौर पर दर्ज हैं. ये सभी अपने-अपने इलाके में समानांतर सरकार चलाते हैं.

इनमें से कुछ गैंगस्टर तो जेल में बैठ-बैठे ही बाहर की दुनिया पर राज करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन गैंगस्टरों के खिलाफ एनकाउंटर जैसी कार्रवाई की हो? उल्टा पुलिस इन संगठित अपराधियों और गैंगस्टरों के अधीन रहकर काम करती है और उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है.

एक उदाहरण ये भी

उदाहरण के लिए अगर हम 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों पर नजर डालें तो, अखिलेश यादव सरकार ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (एडिशनल डायरेक्टर जनरल) पर खासा दबाव डाला था, और उनसे दंगों में मुसलमानों की हत्याओं के लिए हिंदुओं के खिलाफ गंभीर कार्रवाई करने को कहा था.

तब उस वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने जवाब दिया था, 'मैं भाड़े का हत्यारा बनने के लिए पुलिस में भर्ती नहीं हुआ था.' जाहिर है, सरकार का निर्देश न मानने का खामियाजा इस पुलिस अधिकारी को उठाना पड़ा, और उन्हें पोस्टिंग से हटा दिया गया. लेकिन जिस तरह से उन्होंने राजनीतिक बाहुबलियों के सामने घुटने टेकने से इनकार किया, वो वाकई काबिले तारीफ है.

UP Police

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ये बात कुबूल करते हैं कि एनकाउंटर के नाम पर किसी की भी हत्या करने का निरंकुश लाइसेंस मिल जाने से पुलिसवाले खुद अपराधी बन जाएंगे. एनकाउंटर की वकालत करने वाले पुलिस अधिकारियों पर नाराजगी जताते हुए प्रकाश सिंह ने कहा, 'अगर किसी असली एनकाउंटर में कोई अपराधी मारा जाता है, तो उसमें कुछ भी गलत नहीं. लेकिन प्रदेश को अपराध मुक्त बनाने के लिए एनकाउंटर को हथियार बनाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है.'

फर्जी मुठभेड़ के लिए बदनाम यूपी पुलिस

फर्जी मुठभेड़ों को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस खासी बदनाम रही है. पीलीभीत में 13 निर्दोष सिखों की हत्या और मेरठ के मलियाना में बेगुनाह मुसलमानों की हत्याओं के केस अब भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं. गाजियाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में फर्जी मुठभेड़ों की घटनाओं से पुलिस रिकॉर्ड भरे पड़े हैं.

खास बात ये है कि वहां पुलिसवालों ने एनकाउंटर के नाम पर ज्यादातर 'छोटे अपराधियों' को ही मारा है, ताकि आला अधिकारियों की शाबाशी और वाहवाही लूट सकें. साल 2000 से 2004 के दौरान गाजियाबाद में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आए.

सुप्रीम कोर्ट की अगुवाई में जब देश भर की सभी अदालतों में फर्जी एनकाउंटर की जांच शुरू हुई थी, तब ऐसा लगा था कि अब एनकाउंटर के नाम पर लोगों की हत्याओं का सिलसिला रुक जाएगा. और एनकाउंटर के बहाने अपनी छाती ठोकने वाले और अब तक छप्पन जैसे डॉयलाग बोलने वाले पुलिस अधिकारियों के दिन लद गए हैं.

लेकिन लगता है कि यूपी पुलिस अपने अतीत से कोई सबक नहीं सीखना चाहती है. फिलहाल तो उत्तर प्रदेश में लोग चोर-डकैत और ठगों के बजाए हत्या का लाइसेंस लिए घूम रही पुलिस से ज्यादा डरे हुए हैं.

यूपी पुलिस संगठित गिरोह: जस्टिस आनंद 

वैसे योगी सरकार अगर इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नरायण मुल्ला के दशकों पुराने एक फैसले पर गौर करे तो यकीनन अच्छा काम करेगी. पुलिस फोर्स की ज्यादतियों के एक गंभीर अभियोग में, जस्टिस मुल्ला ने लिखा था: 'देश में कोई भी ऐसा गैरकानूनी और आपराधिक गैंग नहीं है, जिसके अपराधों के रिकॉर्ड की बराबरी भारतीय पुलिस के अपराधों के रिकॉर्ड से की जा सके...उत्तर प्रदेश पुलिस अपराधियों का एक संगठित गिरोह है'

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सरकार के पास अब भी वक्त है कि वो एनकाउंटर के नाम पर लोगों की हत्याओं का खूनी खेल बंद करे. क्योंकि पुलिस को सशक्त बनाने की मुहिम में उसे हत्या का लाइसेंस देना भविष्य में सरकार को महंगा पड़ सकता है. सरकार की शह के चलते पुलिसवाले बेलगाम हो चले हैं, ऐसे में प्रदेश में एनकाउंटर का आंकड़ा जल्द ही आसमान छूने लगे तो हैरत की बात नहीं होगी.

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