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योगी आदित्यनाथ का गौप्रेम और नेहरू से मोदी तक देश का राजनीतिक कायाकल्प

अब आंसू बहाना बंद कीजिए क्योंकि राजनीति की नेहरुवादी धारणा अब बहुत गहरे दफना दी गई है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Mar 21, 2017 02:22 AM IST

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योगी आदित्यनाथ का गौप्रेम और नेहरू से मोदी तक देश का राजनीतिक कायाकल्प

उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के साथ वक्त का पहिया एक तरह से पूरा घूम गया है. आदित्यनाथ गोरखधाम पीठ (इसे गोरक्षपीठ भी कहते हैं) के प्रमुख हैं.

इलाके के राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड़ के कारण गोरक्ष-पीठ का पूर्वी उत्तरप्रदेश और तराई क्षेत्र के सामाजिक जीवन पर एक तरह से पूरा दबदबा है.

योगी आदित्यनाथ महंथ अवैद्यनाथ की राजनीतिक विरासत के वारिस हैं. वे योगी आदित्यनाथ के गुरु और पितातुल्य रहे हैं. महंत अवैद्यनाथ के गुरु थे महंत दिग्विजयनाथ. दोनों स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्नचारी के गो-रक्षा आंदोलन के निष्ठावान कार्यकर्ता थे.

1951 के लोकसभा चुनाव में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के विरुद्ध फूलपुर की सीट से लड़े. इस चुनाव में उनकी बुरी तरह से हार हुई.

हालांकि, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने गो-रक्षा का अपना आंदोलन जारी रखा और कई दफे इस आंदोलन ने हिंसक रुप लिया लेकिन गो-रक्षा संबंधी उनके विचारों को कभी भी मुख्यधारा की राजनीति में जगह नहीं मिली.

महंत अवैद्यनाथ हिन्दू महासभा के थे और 1962 से उन्होंने मनीराम असेम्बली सीट की नुमाइंदगी की. बाद को चार दफे (1970, 1989, 1991 तथा 1996) में वे लोकसभा की गोरखपुर सीट से जीतकर संसद पहुंचे.

लेकिन, अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में चली हिन्दुत्व की राजनीति की मुख्यधारा में महंत अवैद्यनाथ को केंद्रीय स्थान हासिल नहीं हुआ. वे हमेशा धुर दक्षिणपंथी राजनीति के हाशिए पर रहे.

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बीजेपी नेता दयाशंकर की पत्नी स्वाति सिंह आदित्यनाथ से आशीर्वाद लेते हुए

अतीत से अलगाव

आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाना अतीत से साफ-साफ अलगाव की सूचना तो है ही, साथ ही बड़े जतन से खड़े किये गये भारतीय राजनीति के नेहरुवादी ढांचे को भी गहरी चुनौती मिली है जिसमें राजनीति को धर्म से अलग रखकर चला जाता है.

अगर कोई यह माने कि संघ-परिवार के हार्डलाइनर के दबाव में महंत को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाया गया तो इसे हद दर्जे का भोलापन ही माना जायेगा.

इससे अलग, अगर कोई कहे कि बीते जमाने में जो हिन्दुत्व की राजनीति में हाशिए पर हुआ करता था वह एक ऐसे वक्त में जब पार्टी की अगुवाई मोदी और शाह के हाथो में है, अचानक ही मुख्यधारा में चला आया है तो एक अनुमान के रुप में यह कहीं ज्यादा ठीक कहलाएगा.

...और दरअसल गौर करें तो दिख सकता है कि इस बेतुकेपन के पीछे एक तुक छुपी हुई है. जरा बीजेपी के मेनिफेस्टो की याद कीजिए जिसमें वादा किया गया है कि पार्टी के सरकार में आने के साथ पूरे सूबे में मशीन से चलने वाले कसाईघर बंद किए जायेंगे.

इस फैसले का मतलब बड़ा साफ है. जिन कसाईघरों को मुसलमान मालिकों का माना जाता है उनका कामकाज तुरंत ठप्प हो जायेगा. इसका असर हिन्दुओं से ज्यादा मुसलमानों पर होगा क्योंकि बड़े पशुओं को काटने की जगहों पर मुसलमान मजदूर ज्यादा तादाद में काम करते हैं.

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पश्चिम यूपी में ये कसाईघर बड़े पैमाने पर सामाजिक असंतोष और संघर्ष के कारण बनकर उभरे हैं. ग्रामीण इलाकों से बराबर ऐसी शिकायतें आती हैं कि उपद्रवी मिजाज के कुछ लोग गाय-भैंस चुराकर उन्हें कसाईखाने में बेच देते हैं.

इस चुनाव में बीजेपी ने इस मुद्दे को उठाया और सभी मशीनीकृत कसाईघर को बंद करने का वादा किया. जाहिर है, योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के साथ यह फैसला तुरंत अमल में आ जाएगा. चूंकि, नये मुख्यमंत्री की छवि गोरक्षक की है तो माना जा सकता है कि वे इस फैसले पर पूरी कड़ाई से लागू करेंगे.

गोरखपुर और उससे लगते पूर्वी उत्तरप्रदेश के कई जिलों में आदित्यनाथ ने स्वयंसेवकों की एक सेना तैयार की है जो सांप्रदायिक संघर्ष की स्थिति में बड़ी बेहयाई से हिन्दुओं का पक्ष लेता है.

एक सच्चाई यह है कि योगी आदित्यनाथ की आक्रामकता को स्थानीय हिन्दुओं में स्वीकृति हासिल है जो अपने आप में इस बात की निशानदेही करता है कि मुलायम-मायावती या फिर अखिलेश के राज में माहौल कितना पक्षपात भरा रहा है.

मऊ और आजमगढ़ में योगी के स्वयंसेवकों ने मुखालफत में खड़ी एक सरकार के होते मुख्तार अंसारी जैसे गैंगस्टर से लोहा लिया और आदित्यनाथ की छवि एक हिफाजत करने वाले शख्स की बनी.

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योगी को मुख्यमंत्री बनाए जाना पीएम मोदी का मास्टर स्ट्रोक हो सकता है

एंटी-रोमियो स्कवॉड

इन बातों को देखते हुए योगी एंटी-रोमियो जत्था तैयार करने के काम के लिए एकदम सही व्यक्ति हैं. यह जत्था उन मुसलमान लड़कों को सबक सिखाने के लिए तैयार किया जाना है जो गर्ल्स कॉलेज के आस-पास छेड़खानी किया करते हैं.

किसानों की कर्जमाफी और बिजली आपूर्ति जैसे मसलों को देखने के लिए मंत्रिमंडल में कुछ और लोग हैं ही. योगी को यूपी के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाकर बीजेपी ने साफ संदेश सुनाया है कि पार्टी अब प्रखर हिन्दुत्व की राह पर है.

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वो जमाना गया जब वाजपेयी और आडवाणी जैसे नेता एक सौम्य हिन्दुत्व की लकीर पर चलते थे और अपनी बात कहने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते थे जो सबको भाये, जिसमें सबके लिए गुंजाइश हो. नई बीजेपी के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं है.

क्या यह विचित्र संयोग नहीं है कि जिस फूलपुर की संसद मे नुमाइंदगी कभी नेहरु ने की उसी सीट का प्रतिनिधित्व अब यूपी के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कर रहे हैं जिनकी छवि संघ-परिवार के हिन्दुत्व के हार्डलाइनर की है?

बेशक, कहा जा सकता है कि 1951 में गो-रक्षक प्रभुदत्त ब्रह्मचारी की हार का बदला आज संघ परिवार ने ले लिया है. लखनऊ में आज सियासत का जलवा एक नये युग की शुरुआत की राह खोलेगा. यह राह बीते जमाने से हर मायने में अलग होगी.

नई बीजेपी हिन्दुत्व को अपना मकसद मानकर उसकी तरफ निस्संकोच होकर बढ़ेगी. बीते वक्त में गैर-बीजेपी पार्टियां मुस्लिम वोट बटोरने के लिए ऐसे ही बेधड़क कदम उठाती थीं.

और, विडंबना देखिए कि यह सबकुछ संविधान के दायरे में रहते हुए किया जायेगा. इन बातों का संदेश बड़ा साफ है कि अब आंसू बहाना बंद कीजिए क्योंकि राजनीति की नेहरुवादी धारणा अब बहुत गहरे दफना दी गई है.

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