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शिवराज सरकार में हुई गोलीकांड की गूंज क्या गुजरात तक सुनाई देगी?

शिवराज सिंह ने मंदसौर की गंभीरता को नहीं समझते हुए पूरी पार्टी को संकट में डाल दिया है.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh | Published On: Jun 11, 2017 12:27 PM IST | Updated On: Jun 11, 2017 01:41 PM IST

शिवराज सरकार में हुई गोलीकांड की गूंज क्या गुजरात तक सुनाई देगी?

मंदसौर गोलीकांड के बाद से देश की राजनीतिक आबोहवा में अचानक ही बदलाव नजर आने लगा है. लंबे समय से मुद्दे की तलाश में बैठी विपक्ष को मंदसौर की घटना के बाद एक बड़ा मुद्दा मिल गया है.

मंदसौर में किसानों पर जिस तरह से गोलियां बरसाई गई और इस गोलीकांड में 6 किसानों की मौत हुई, उसके बाद से देश में एक अलग तरह का राजनीतिक माहौल उभरने लगा है. देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को मानो संजीवनी मिल गई हो. देश की कमजोर विपक्ष को मंदसौर की घटना ने एक बार से जिंदा करने का काम किया है.

देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं का मंदसौर का धुआंधार दौरा चल रहा है. इस दौरे के बीच कुछ राजनीतिक पार्टियों ने दूसरे राज्य में भी सभाएं करनी शुरू कर दी हैं. राजनीतिक पार्टियां प्रार्थना सभा जैसे आयोजन कर इस मुद्दे को जिंदा रखना चाह रही है.

किसानों की प्रार्थना सभा में नेता

शनिवार शाम दिल्ली स्थित किसान घाट पर आम आदमी पार्टी ने पुलिस गोलीबारी में मारे गए किसानों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना सभा आयोजित की. सभा में पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली संयोजक गोपाल राय, दिल्ली सरकार में मंत्री इमरान हुसैन और कई अन्य विधायकों के साथ पार्टी के सैंकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहे. प्रार्थना सभा में कार्यकर्ताओं ने मोमबत्ती जलाकर और दो मिनट का मौन धारण कर दिवंगत किसानों की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की.

पिछले तीन सालों में पहली बार देखा गया है जब देश में किसान आंदोलन को लेकर बीजेपी बैकफुट पर आ गई है. किसानों के ताजा आंदोलन ने बीजेपी थिंक टैंक के लिए एक बड़ी मुसीबत पैदा कर दी है.

राजनीतिक पंडित मानते हैं कि मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों की मौत के बाद देश के राजनीतिक हालात लंबे समय तक निशान छोड़ने वाले हैं. धीरे-धीरे देश के कई और राज्यों में किसान आंदोलन शुरू हो जाएंगे. महाराष्ट्र, तमिलनाडु में पहले से ही किसान आंदोलन चल रहे हैं.

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पूर्व के किसान आंदोलनों से देश की सियासत पर असर पड़ा है. सरकारें बदली हैं और कई नेताओं के सियासी भविष्य पर इसका असर पड़ा है. मंदसौर गोलीकांड का असर मध्यप्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के साथ-साथ देश के दूसरे राज्यों में पड़ सकता है.

बेंगलुरु में यूथ कांग्रेस के मेंबर पीएम मोदी और शिवराज सिंह के पुतले जलाते हुए.

बेंगलुरु में यूथ कांग्रेस के मेंबर पीएम मोदी और शिवराज सिंह के पुतले जलाते हुए.

शिवराज की करनी पार्टी भुगतेगी?

मंदसौर गोलीकांड को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कहीं ज्यादा चिंतित पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह हैं. बीजेपी और पीएम मोदी की चिंता इस घटना से पूरे देश पर पड़ने वाले असर को लेकर है. गुजरात में इसी साल चुनाव होने हैं. विपक्षी पार्टियां खासकर कांग्रेस इस घटना को जिंदा रखने की खूब कोशिश करेगी. क्योंकि मंदसौर गोलीकांड में मरने वाले 6 में से 4 किसान पाटीदार समुदाय से आते हैं.

जिस देश में किसान को धर्म-मजहब से बढ़कर देखा जाता है. जिस देश की पहचान किसानों से होती हो, उस देश में किसानों पर गोली बरसाने का असर सियासत पर नहीं पड़े, ऐसा सोचना बेमानी होगा. खासकर एक जाति विशेष के किसानों का ज्यादा संख्या में हताहत होना बीजेपी के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है.

पाटीदार समुदाय से पहले ही आंकड़े खराब

गुजरात के पाटीदार समुदाय में मंदसौर गोलीकांड को लेकर काफी आक्रोश है. पश्चिमी मध्यप्रदेश का यह इलाका गुजरात और राजस्थान सीमा से सटा हुआ है. हम आपको बता दें कि पहले से ही पाटीदार समाज का एक धड़ा बीजेपी से आक्रोशित चल रहा है. आरक्षण की मांग को लेकर पिछले साल पाटीदार समुदाय ने बड़ा आंदोलन किया. ऐसे में मंदसौर की घटना आग में घी डालने का काम किया है.

मंदसौर घटना के बाद पाटीदार समुदाय के लिए आरक्षण आंदोलन की अगुवाई करने वाले हार्दिक पटेल सक्रिय हो गए हैं. मंदसौर घटना के बाद हार्दिक पटेल जल्द ही इसको राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं.

मध्यप्रदेश में लगभग 7 लाख पाटीदार समुदाय के लोग हैं. मंदसौर और नीमच जहां आंदोलन हो रहे हैं वहां पर करीब 3 लाख पाटीदार समुदाय के लोग रहते हैं. वहीं गुजरात जहां इसी साल चुनाव होने जा रहे हैं लगभग 17 प्रतिशत मतदाता पाटीदार समाज से आते हैं. पिछले कुछ सालों से बीजेपी गुजरात की सत्ता पर अगर कायम है तो उसमें पाटीदारों का योगदान सबसे ज्यादा है.

पिछले एक-दो सालों से वैसे भी हार्दिक पटेल पाटीदार समाज के आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं. जो बीजेपी के खिलाफ जा रहा है और अब मंदसौर की घटना ने बीजेपी के लिए और नाराजगी बढ़ा दी है. खासतौर पर पीएम मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चिंता बढ़ाने में शिवराज सिंह का कम योगदान नहीं है.

हार्दिक पटेल इस मौके को जरूर राजनीतिक तौर पर भुनाना चाहेंगे.

हार्दिक पटेल इस मौके को जरूर राजनीतिक तौर पर भुनाना चाहेंगे.

शिवराज सरकार की लापरवाही ने बिगाड़ा मामला

जानकार मानते हैं कि किसान आंदोलन और मंदसौर गोलीकांड में मध्यप्रदेश सरकार ने शुरूआत से ही बिना गुजरात चुनाव और मध्यप्रदेश चुनाव की चिंता करते हुए लापरवाही की.

शिवराज सरकार 1 जून से किसानों के चल रहे आंदोलन को किसान आंदोलन मानने से इंकार करती रही. मध्यप्रदेश सरकार सिर्फ आरएसएस समर्थित भारतीय किसान संघ को ही किसानों के हित में लड़ने वाली संगठन मानती रही. मध्यप्रदेश सरकार के अड़ियल रुख के कारण आंदोलन में शामिल किसानों की नाराजगी बढ़ती गई. राज्य सरकार के द्वारा आंदोलन कर रहे किसानों को किसान न मानकर असामाजिक तत्व कहा गया. जिससे आंदोलन और बढ़ता गया.

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जब पुलिस के द्वारा गोली चलाई गई तब भी शिवराज सिंह नहीं जागे. पहले तो उनकी सरकार ने किसानों की मौत के लिए असामाजिक तत्वों को जिम्मेदार ठहराया और आंदोलन को हिंसक बनाने के पीछे कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया. जब उन्हें धीरे-धीरे गंभीरता समझ में आई तो पहले मरने वाले किसानों को 5 लाख रुपए, फिर 10 लाख रुपए और फिर एक करोड़ रुपए मुआवजा देने का एलान किया गया.

कुल मिलाकर शिवराज सिंह की सरकार ने मंदसौर मामले की गंभीरता को नहीं समझते हुए पूरी पार्टी को संकट में डाल दिया है. एक तरफ मोदी सरकार तीन साल के जश्न में डूबी थी तो दूसरी तरफ मंदसौर की घटना ने मोदी फेस्ट को फीका कर दिया. साथ ही गुजरात चुनाव की चिंता को भी और बढ़ा दिया है. विपक्ष का बीते कुछ सालों में बीजेपी पर ये सबसे सामान्य आरोप है कि वो विरोधी आवाजों को कुचल देना चाहती है. मंदसौर की घटना बाद विपक्ष के इस आरोप को और बल मिल सकता है.

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