S M L

राजनीति की बिसात पर टिके रहने की शरद यादव की कोशिश सफल होगी?

बीजेपी-जेडीयू के नए गठबंधन में शरद यादव अपनी भूमिका देख नहीं पा रहे हैं

Amitesh Amitesh Updated On: Aug 10, 2017 05:33 PM IST

0
राजनीति की बिसात पर टिके रहने की शरद यादव की कोशिश सफल होगी?

जेडीयू के राज्यसभा सांसद और पूर्व अध्यक्ष शरद यादव बिहार में तीन दिनों की अपनी सियासी यात्रा पर निकले हैं. शरद अपनी इस यात्रा में पार्टी कैडर्स से उनके दिल का हाल पूछेंगे. हालांकि उसके पहले ही उन्होंने अपना हाले दिल बयां कर दिया है.

दिल्ली से पटना पहुंचते ही शरद यादव ने एक बार फिर महागठबंधन से अलग होने के नीतीश कुमार के फैसले पर सवाल खड़ा कर दिया. शरद ने इसे बिहार की 11 करोड़ जनता के साथ धोखा बताया.

हालांकि, महागठबंधन टूटने का दर्द शरद यादव की जुबां से पहले भी छलका है लेकिन इस बार बिहार पहुंचते ही पार्टी के खिलाफ गर्म तेवर दिखाने से साफ है कि उन्हें अब अलग रास्ता अपनाने से कोई गुरेज नहीं है.

शरद यादव के भीतर का आत्मविश्वास यह बताने के लिए काफी है कि भले ही नीतीश ने उनको ठेंगा दिखा दिया हो पर उनके पुराने दोस्त लालू अब उनके साथ हो लिए है.

जेडीयू के निशाने पर है लालू और शरद यादव की 'दोस्ती'.

बिन बैसाखी शरद कुछ भी नहीं

शरद यादव के बागी तेवर का राज भी यही है क्योंकि 'बाहरी' शरद बिहारी राजनीति में अब तक किसी ना किसी बैसाखी के सहारे ही चलते रहे हैं. जनता दल में रह चुके शरद यादव पहले जनता दल के जनाधार की बदौलत मध्यप्रदेश से आकर बिहार की सियासत में अपने हित साधते रहे. जब लालू यादव से अनबन हुई तो नीतीश कुमार के साथ हो लिए.

नीतीश की साफ-सुथरी छवि और उनके जनाधार के अलावा बीजेपी का साथ मिला तो शरद यादव का कद भी काफी बढ़ गया. बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू-बीजेपी की सरकार चल रही थी तो केंद्र में शरद यादव बतौर एनडीए संयोजक यूपीए सरकार के खिलाफ ताल ठोक रहे थे.

उस वक्त शरद यादव का बीजेपी प्रेम उफान पर था. एनडीए संयोजक के तौर पर शरद यादव की पूछ बीजेपी के भीतर भी खूब थी. इस मोहब्बत का आलम यह था कि जब मोदी विरोध के नाम पर नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़ा तो उस वक्त पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी शरद यादव इस फैसले से सहमत नहीं थे.

लेकिन मजबूरी थी बैसाखी की राजनीति की, क्योंकि शरद यादव नीतीश कुमार के नाम पर ही बिहार की सियासत में 'बाहरी' होते हुए भी जड़ जमाए हुए थे.

इतने बेचैन क्यों हैं शरद यादव?

अब जबकि नीतीश कुमार ने चार साल बाद 2017 में लालू यादव का साथ छोड़ फिर से बीजेपी का हाथ पकड़ लिया है तो शरद यादव की बेचैनी पर सवाल खड़े हो रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि जब शरद यादव चार साल पहले बीजेपी के साथ ही रहना चाहते थे तो अब उन्हें बीजेपी के साथ आने में क्या तकलीफ है.

nitish-modi

दरअसल इन चार सालों में हालात बदल चुके हैं. शरद यादव इस वक्त जेडीयू के भीतर ही हाशिए पर हैं. एक साल पहले ही पार्टी अध्यक्ष का पद भी उनके हाथ से चला गया और पार्टी के भीतर निर्णायक फैसलों में भी उनकी वो अहमियत नहीं रह गई है.

लगता है शरद यादव इस वक्त पार्टी के भीतर अपनी कम होती हैसियत और उपेक्षा के शिकार हैं. उन्हें इस बात की नाराजगी है कि राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के फैसले की बात हो या फिर बीजेपी के साथ जाने का पार्टी का फैसला, उनसे सलाह-मशविरा तक नहीं की गई.

शरद यादव के करीबी सूत्रों के मुताबिक, शरद यादव को लगता है कि इस वक्त वो अगर नीतीश कुमार के खिलाफ खड़े होते हैं तो मोदी विरोधी मोर्चा में बड़े चेहरे के तौर पर सामने आ सकते हैं. सभी विपक्षी पार्टियों को एक कर शरद यादव एक बार फिर से संसद से लेकर सड़क तक सरकार विरोधी आंदोलन के सूत्रधार के तौर पर अपने-आप को स्थापित कर सकते हैं.

विद्रोहियों का साथ लगाएगी नैय्या पार?

महागठबंधन टूटने के बाद से ही शरद यादव जेडीयू के कुछ राज्यसभा सांसदों और विधायकों के साथ लगातार संपर्क में बने हुए है लेकिन कोई विधायक खुलकर अभी नीतीश के खिलाफ बोलने की हिमाकत नहीं कर पा रहा है.

शरद यादव का आकलन है कि अगर धीरे-धीरे जेडीयू के भीतर के लोगों को नीतीश के खिलाफ लामबंद किया जाए तो एक बार फिर से वो बिहार में बाहरी होते हुए भी अपने-आप को सियासी तौर पर जिंदा रख सकते हैं.

उनकी यही कोशिश इस बार उन्हें इतना मुखर होकर अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ बोलने का साहस दिला रही है.

पार्टी विरोधी गतिविधियों को लेकर शरद यादव के करीबी जेडीयू के महासचिव अरुण श्रीवास्तव पर कारवाई हो चुकी है. इसके बाद शरद यादव पर भी कारवाई का संकेत दिखने लगा है.

sharad yadav

नीतीश कुमार ने एक सवाल के जवाब में इशारों ही इशारों में कहा है कि एक ही झटके में कुछ और दिक्कतें खत्म हो जाएंगी. नीतीश कुमार के इस बयान का मतलब समझने वाले समझ चुके हैं.

जनाधारहीन शरद रहे या जाएं, नीतीश के लिए एक ही बात

कुछ इसी तरह का संकेत जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी दिया है. नीरज कुमार का कहना है, ‘शरद यादव का दौरा आरजेडी प्रायोजित है. लगता है शरद यादव भ्रष्टाचार के सामने समर्पण कर चुके हैं. लालू-तेजस्वी अब शरद यादव के आदर्श बन चुके हैं. अगर उनका दिल लालू से मिल गया है तो वो उनसे हाथ मिला लें. उनका पार्टी में रहना या जाना हमारे लिए चिंता की बात नहीं है.’

अगर शरद यादव जेडीयू से अलग हो जाते हैं या फिर निकाल दिए जाते हैं तो नीतीश कुमार को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. उल्टा, जेडीयू में नीतीश कुमार के सामने के सभी कांटे बाहर हो जाएंगे. फिलहाल तो शरद यादव के तेवर देखकर ऐसा ही कुछ होता लग रहा है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi