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राष्ट्रपति चुनाव 2017: क्या नीतीश को मना पाएंगे लालू?

राष्ट्रपति चुनाव में जदयू कोविंद का समर्थन करने वाली एकमात्र बड़ी विपक्षी पार्टी है

Amitesh Amitesh | Published On: Jun 23, 2017 02:35 PM IST | Updated On: Jun 23, 2017 02:35 PM IST

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राष्ट्रपति चुनाव 2017: क्या नीतीश को मना पाएंगे लालू?

विपक्ष की बैठक के बाद जैसे ही राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर मीरा कुमार के नाम का ऐलान हुआ, आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार से मीरा कुमार के लिए समर्थन की अपील की.

बिहार में लालू के सहयोगी नीतीश पहले ही एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के साथ जाने का ऐलान कर चुके हैं, फिर भी लालू के भीतर एक आस बची दिख रही है, उन्हें लगता है नीतीश भूल सुधार जरूर करेंगे. ऐतिहासिक भूल करने से शायद बच जाएंगे.

ये हम नहीं कह रहे हैं, ये खुद लालू यादव का कहना है जो नीतीश कुमार के कदम को ऐतिहासिक भूल बताकर उन्हें ‘गलत रास्ते’ पर जाने से बचने की अपील करते दिख रहे हैं.

नीतीश से फैसले पर पुनर्विचार करने को कहेंगे

लालू यादव ने दिल्ली में कहा कि पटना जाकर वो नीतीश कुमार से अपने फैसले पर फिर से विचार करने के लिए कहेंगे. लालू ने कहा कि जेडीयू से ज्यादा विधायक हमारे पास हैं. फिर भी हमने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. जब से बिहार में सरकार बनी है तब से मैंने उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होने दी. लालू का मानना है कि हमने फासीवादी ताकतों को हराने के  लिए नीतीश से हाथ मिलाया था.

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आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव के इस बयान में नीतीश कुमार के लिए किए गए अपने त्याग को दिखाने की कोशिश की गई है. लेकिन, इसमें भी लालू के जिद्दी रवैये के बजाए उनके भीतर समाया वो डर दिख रहा है.

लालू को डर है कहीं नीतीश कुमार आने वाले दिनों में उनका हाथ छिटक कर बीजेपी का साथ ना पकड़ लें. एनडीए के नेताओं की तरफ से आ रहा बयान भी लालू के भीतर के डर को और बढ़ा जाता है.

हर तरफ से घिरे हुए हैं लालू

लालू का डर स्वाभाविक भी है. फिलहाल लालू यादव और उनके परिवार पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है. लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाले में सुनवाई पहले से ही हो रही है. निचली अदालत से सजायाफ्ता लालू फिलहाल बेल पर बाहर हैं.

लालू को 950 करोड़ रूपए के चारा घोटाले में पांच साल की सजा सुनाई जा चुकी है, जिसके बाद 15वीं लोकसभा से उनकी सदस्यता भी चली गई थी. अगले कुछ महीनों में चारा घोटाले में चल रही सुनवाई में उन पर फैसला आ सकता है. अगर फैसला उनके खिलाफ आया तो लालू को फिर से जेल जाना पड़ सकता है.

दूसरी तरफ, लालू यादव के दोनों बेटे, बेटियों, दामाद और पत्नी राबड़ी देवी के ऊपर बेनामी संपत्ति के मामले में आयकर विभाग की कारवाई ने पूरे परिवार को परेशान कर दिया है. आयकर विभाग ने दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों के अलावा पटना की भी करीब 175 करोड़ रूपए बाजार मूल्य की 14 बेनामी संपत्तियों को अटैच कर दिया है.

आयकर विभाग ने इस मामले में लालू यादव की बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती और उनके पति शैलेष से पूछताछ भी की है.

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अगर नीतीश भी गए तो रह जायेंगे अकेले

लालू को लगता है कि इस विपरीत हालात में अगर प्रदेश की सरकार से भी उनकी पार्टी की विदाई हो जाती है तो फिर उनके लिए मुश्किलें ज्यादा बढ़ जाएंगी क्योंकि पहले से ही केंद्र में एक ऐसी सरकार है जिससे लालू का छत्तीस का आंकड़ा है.

लालू को डर इस बात से है कि कहीं नीतीश एक बार फिर से बीजेपी के साथ ना हो जाएं. ऐसा होने पर इस संकट की घड़ी में लालू बिल्कुल अकेले और असहाय पड़ जाएंगे. क्योंकि इस बार लालू का पूरा कुनबा आयकर विभाग की कार्रवाई में फंस सकता है.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का कहना है, 'जब 2012 में नीतीश ने एनडीए में होते हुए यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का साथ दिया तो फिर अगले ही साल 2013 में वो यूपीए के ही साथ चले गए. अब पांच साल बाद जब 2017 में नीतीश ने महागठबंधन में होते हुए कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के बजाए एनडीए के रामनाथ कोविंद के साथ खड़े हैं. ऐसे में समझ जाना चाहिए कि अगले साल 2018 में क्या होगा.’

मांझी का बयान भले ही एक राजनैतिक बयान है लेकिन, इस तरह की चर्चा सियासी गलियारों में पहले से हो रही है. खासतौर से लालू यादव और उनके परिवार के खिलाफ अलग-अलग मामलों में हो रही कार्रवाई के बाद नीतीश कुमार की छवि पर आंच आ सकती है.

नीतीश की भी अपनी दुविधा

शायद इसीलिए नीतीश इन सभी मामलों में चुप्पी बनाए रखते हुए लालू से दूरी बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. उनकी यही कोशिश कई मौकों पर उन्हें बीजेपी के साथ खड़ी कर देती है.

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बीजेपी से अलग होने के बाद पिछले लोकसभा चुनाव में  नीतीश कुमार को बड़ा झटका लगा था. एक साफ-सुथरी छवि के नेता होने के बावजूद नीतीश का बेस वोट बैंक उनसे खिसक कर बीजेपी के साथ चला गया था. इसके बाद ही नीतीश ने लालू के साथ समझौता किया.

लोकसभा चुनाव के बाद 2015 के आखिर में हुए विधानसभा चुनाव में लालू के ‘बेस’ और नीतीश के ‘फेस’ की ऐसी जुगलबंदी बनी जो बीजेपी को पछाड़कर नीतीश को फिर से बिहार में सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया था.

लालू यादव एक बार फिर से नीतीश को अपने ‘बेस’ की अहमियत की याद दिलाकर उन्हें बीजेपी के उम्मीदवार के साथ जाने से रोक रहे हैं. लेकिन, अपने ‘फेस’ की अहमियत समझने वाले नीतीश लालू के बेस के बजाए अपना फेस बचाना चाह रहे हैं जिससे वो लालू के साथ होते हुए भी उनके साथ खड़े नहीं होना चाहते हैं.

ऐसे में अब राष्ट्रपति चुनाव के वक्त छटपटा रहे लालू के लिए नीतीश को मना पाना मुश्किल ही लग रहा है.

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