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उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने वेंकैया आखिर क्यों हैं सबके ख़ास?

सत्ता के केंद्र में पार्टी रहे या न रहे लेकिन वेंकैया हर दौर में पार्टी के केंद्र में जरूर रहते आए हैं.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval | Published On: Jul 17, 2017 09:38 PM IST | Updated On: Jul 17, 2017 09:38 PM IST

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उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने वेंकैया आखिर क्यों हैं सबके ख़ास?

दो महीने पहले पत्रकारों ने जब वेंकैया नायडू से राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा था कि 'न मैं राष्ट्रपति बनना चाहता हूं  और न उपराष्ट्रपति बनना चाहता हूं...मैं 'उषापति' बनकर खुश हूं.' एक बार फिर वेंकैया ने कहा कि उन्हें किसी भी पद की महत्वाकांक्षा नहीं है.

सत्ता के केंद्र में पार्टी रहे या न रहे लेकिन वेंकैया हर दौर में पार्टी के केंद्र में जरूर रहते आए हैं. वेंकैया के सियासी सफर को देखेंगे कि पद और प्रतिष्ठा उनके पास अनायास ही पहुंचते आए हैं. वाजपेयी की सरकार हो या फिर केंद्र की मोदी सरकार हो नायडू अपनी योग्यता से हमेशा ही सत्ता के शिखर पर रहे हैं.

वेंकैया की वाकपटुता और रिश्तों में सामंजस्य बिठाने की विलक्षण प्रतिभा ही उन्हें वाजपेयी-आडवाणी के दौर में शीर्ष नेताओं के करीब रखा करती थी तो आज केंद्र की मोदी सरकार में वो सबके पसंदीदा हैं. एनडीए ने राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिये अगर उत्तर से रामनाथ कोविंद का नाम चुना तो दक्षिण से सिर्फ एक ही नाम सुना. वो नाम वेंकैया नायडू का ही रहा जिस पर सभी ने सर्वसम्मति से अपनी मुहर लगाई.

New Delhi: Union Ministers Rajnath Singh and Venkaiah Naidu meeting with CPI(M) general secretary Sitaram Yechury on Presidential poll as part of the ruling party's outreach to stitch a consensus in New Delhi on Friday. PTI Photo by Kamal Singh(PTI6_16_2017_000089B)

वेंकैया नायडू को राज्यसभा का लंबा अनुभव है. वो 1998 से लगातार राज्यसभा के सदस्य है. उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति होते हैं और सदन की कार्रवाई में अहम भूमिका निभाते हैं. उपराष्ट्रपति के पास ही राज्यसभा के संचालन की भी जिम्मेदारी होती है. ऐसे में वेंकैया नायडू बीजेपी की सबसे सही पसंद माने जा सकते हैं.

वेंकैया नायडू ने अपने सियासी सफर में कई बड़ी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन किया. साल 2004 में एनडीए की हार के बाद एकबारगी लगा कि वेंकैया का सितारा डूबने वाला है लेकिन उनकी राजनीतिक सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. पहले वो बीजेपी अध्यक्ष बने तो साल 2005 में बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने. ये वेंकैया नायडू के सियासी उत्थान का छोटा सा उदाहरण भर है कि वो कभी वाजपेयी सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे तो आज मोदी सरकार में शहरी विकास मंत्री हैं. साथ ही दूसरे अन्य मंत्रालय भी उनके पास हैं.

वेंकैया नायडू ने राजनीति की शुरूआत में अपनी पहचान आंदोलनकारी नेता के रूप में बनाई थी. नेल्लोर के आंदोलन में हिस्सा लिया और विजयवाड़ा के आंदोलन का नेतृत्व किया. 1974 में वे आंध्र विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए. सत्तर के दशक में जेपी आंदोलन से जुड़े. आपातकाल के बाद ही उनका जुड़ाव जनता जनता पार्टी से हो गया. 1977 से 1980 तक जनता पार्टी की युवा शाखा के अध्यक्ष रहे. बाद में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा. 1993 से 2000 तक वेंकैया बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव रहे. पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा को देखते हुए साल 2002 में उन्हें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की कमान सौंपी गई.

वेंकैया बीजेपी के सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक माने जाते हैं. तभी कभी वो वाजपेयी-आडवाणी के बेहद करीबी रहे तो आज मोदी-शाह की पसंद हैं. उनकी कार्यशैली की ऊर्जा के चलते ही उन्हें केंद्र सरकार ने कई संसदीय समितियों का सदस्य भी बनाया है.

अब पार्टी में उनके लंबे संसदीय अनुभवों और राजनीतिक दूरदर्शिता को देखते हुए उन्हें उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है. इसकी एक दूसरी राजनीतिक वजह भी है. दक्षिण भारत में वेंकैया की पहचान कद्दावर नेता के रूप में है. बीजेपी दक्षिण भारत में अपना आधार बढ़ाना चाहती है. वेंकैया नायडू को उपराष्ट्रपति पद का दावेदार बनाए जाने से तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी की पैठ बढ़ सकेगी.

ऐसे में वेंकैया नायूड बीजेपी के लिये हर लिहाज से सबसे मुफीद नाम और उम्मीदवार हैं. जिस नाम पर सहमति बनाने के लिये पार्टी को माथापच्ची नहीं करनी पड़ी होगी.

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