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सेकुलर वोटों का विभाजन रोकने का जिम्मा सिर्फ औवैसी पर क्यों?

ओवैसी के यूपी में चुनाव लड़ने को लेकर क्यों दिग्विजय आरोप लगा रहे हैं

Dilip C Mandal Updated On: Feb 22, 2017 06:09 PM IST

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सेकुलर वोटों का विभाजन रोकने का जिम्मा सिर्फ औवैसी पर क्यों?

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी इस बार यूपी के चुनाव में पहली बार हाथ आजमा रही है. ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल ए मुस्लमीन (एआईएमआईएम) यूपी में 35 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

इससे पहले महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम अपने दो एमएलए जिता चुकी है. बिहार में पार्टी ने छह सीट पर चुनाव लड़ा था. किसी पर भी जीत नहीं मिली. यह मुख्य रूप से हैदराबाद और आसपास के इलाकों की पार्टी है और वहां से ही ओवैसी सांसद हैं.

अब वह देश के बाकी हिस्सों में अपना असर बढ़ाने की कोशिश कर रही है. इस सिलसिले में वह दलितों और मुसलमानों का समीकरण बनाने की कोशिश करती है. महाराष्ट्र में उसे सीमित सही, लेकिन सफलता मिली है.

हर पार्टी को अधिकार देता है सम्मान

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भारतीय लोकतंत्र किसी भी राजनीतिक पार्टी को संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून की धाराओं के तहत चुनाव लड़ने की सुविधा देता है. एआईएमआईएम के देश के विभिन्न हिस्सों में चुनाव लड़ने को इस दृष्टि से एक सामान्य राजनीतिक गतिविधि माना जाना चाहिए.

लेकिन ओवैसी के तेलंगाना से बाहर निकलने को हमेशा संदेह की नजर से देखा जाता है. यह संदेह अक्सर सेकुलर खेमे से आता है.

मिसाल के तौर पर, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया है कि ओवैसी ने बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह से घूस ली है. सिंह के मुताबिक, बिहार चुनाव के दौरान औवेसी अमित शाह से मिले थे और उन्हें बीजेपी से 400 करोड़ रुपए मिले थे.

ओवैसी पर आरोप है कि वे यूपी में भी यही काम कर रहे हैं. दिग्विजय ने आरोप लगाया है कि एमआईएम, बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए हर चुनाव में प्रत्याशी मैदान में उतारती है. कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने भी ओवैसी को बीजेपी का एजेंट बताया था.

यह एक अजीब स्थिति है. कांग्रेस के नेता कांग्रेस या अपने गठबंधन पार्टनर के लिए वोट मांगें, यह सही है. लेकिन कोई और पार्टी चुनाव लड़े या न लड़े, यह कांग्रेस कैसे तय कर सकती है?

अब अगर कोई यह पूछे कि कांग्रेस ने यूपी में पिछले विधानसभा चुनाव में 355 उम्मीदवार क्या सोच कर उतारे थे, तो कांग्रेस का क्या जवाब होगा? 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सिर्फ 28 उम्मीदवार जीते थे. कांग्रेस के 355 उम्मीदवारों ने मिलकर सिर्फ 13.26 फीसदी वोट जुटाए.

अब सवाल उठता है कि कांग्रेस के जो 327 उम्मीदवार जीत नहीं पाए, वे किसके वोट काट रहे थे? जाहिर है, अगर वोटों का विभाजन सेकुलर और कम्यूनल आधार पर होता है, तो कांग्रेसी उम्मीदवारों ने सेकुलर वोट ही काटे होंगे. क्या कांग्रेस ने सेकुलर वोट काटने के लिए बीजेपी से पैसे लिए थे?

यह आरोप उतना ही बेतुका है, जितना यह कहना कि ओवैसी ने बीजेपी से पैसे लिए थे.

इससे भी बुरा हाल 2007 के विधानसभा चुनाव में था, जब कांग्रेस ने 393 सीटों पर उपने उम्मीदवार उतारे. उसके सिर्फ 22 कैंडिडेट जीते, 371 हार गए और सब मिलाकर, 8.84 फीसदी वोट ही उसे मिले.

2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 402 उम्मीदवारे खड़े किए, 377 उम्मीदवार हार गए. सिर्फ 25 ही जीत पाए और कुल वोट आए 8.99 फीसदी. इतने सारे उम्मीदवारों को जो थोड़ा-बहुत वोट मिल रहा था, वह कांग्रेस को न मिलता, तो किसे मिलता?इसका जवाब कांग्रेस को देना चाहिए.

कई राज्यों में हार जाते हैं कांग्रेस के उम्मीदवार

rahul gandhi

कई राज्यों में कांग्रेस उम्मीदवार तो बड़ी संख्या में उतारती है, पर उसके ज्यादातर उम्मीदवार हार जाते हैं. लेकिन उस पर यह आरोप नहीं लगता कि उसकी वजह से सेकुलर वोट बंट जाता है. ऐसी ही स्थिति में सेकुलर वोटों के विभाजन का आरोप ओवैसी पर कैसे लग सकता है?

आम आदमी पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 432 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. पार्टी को सिर्फ 2 फीसदी वोट मिले. पार्टी के 428 उम्मीदवार हार गए. ऐसे में क्या यह नहीं कहा जा सकता है अगर वे वोट नहीं काटती तो, मुमकिन है कि बीजेपी के कुछ उम्मीदवार हार जाते.

यह बात बेतुकी है. ओवैसी के यूपी में चुनाव लड़ने के बारे में सवाल पूछने जितना ही बेतुका.

कोई भी नई राजनीतिक शक्ति जब काम शुरू करती है, या कोई पार्टी जब किसी नए इलाके में जाती है, तो अक्सर उसकी हैसियत छोटी होती है. बड़ी और स्थापित पार्टियों का उससे डरना स्वाभाविक है. लेकिन उसके खिलाफ घूसखोरी जैसे आरोप लगाना अनर्गल है. अगर यह सच है तो कांग्रेस को ओवैसी की घूसखोरी के प्रमाण देने चाहिए.

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