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बिहार: नीतीश कुमार महागठबंधन की 'असहज स्थिति' में क्यों पड़े?

नीतीश बीजेपी के करीब जाते दिख रहे हैं तो ये उनकी चालाकी भरा एक और कदम है उससे ज्यादा कुछ नहीं

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jun 27, 2017 07:14 PM IST

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बिहार: नीतीश कुमार महागठबंधन की 'असहज स्थिति' में क्यों पड़े?

बिहार में महागठबंधन की सरकार डांवाडोल है. इस बार जेडीयू नेता केसी त्यागी के बयान ने हलचल पैदा की है. केसी त्यागी ने कहा है कि जेडीयू और उनके नेता नीतीश कुमार एनडीए के साथ ज्यादा सहज थे. उनका कहना है कि जेडीयू यूपीए का पार्ट नहीं है. कांग्रेस को चेतावनी के लहजे में कहा है कि महागठबंधन सिर्फ बिहार में हुआ है और ये कांग्रेस को याद रखना चाहिए.

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए केसी त्यागी ने कहा है कि कांग्रेस नीतीश कुमार का चरित्र हनन करने में लगी हुई है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि गुलाम नबी आजाद के बयान के बाद अब गठबंधन कहां बचता है. इस जवाब के बाद अब तय करना जरूरी हो जाता है कि बिहार में ऐसे राजनीतिक हालात क्यों बने पड़े हैं और इसके जिम्मेदार क्या नीतीश कुमार ही हैं.

नीतीश की चालाकी और लालू की मजबूरी 

बिहार में नीतीश कुमार और महागठबंधन असहज स्थितियों का सामना कर रहा है. हालांकि नीतीश कुमार असहज स्थितियों का सामना करना जानते हैं. वो मौके के हिसाब से राजनीतिक फैसले लेते हैं.

इसे उनकी राजनीतिक चालाकी कहा जा सकता है, जिसकी मिसाल देकर उनकी विचारधारा पर सवाल भी खड़े किए जा सकते हैं लेकिन इसी के बूते उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी राजनीति बचाए रखी है. एक राजनेता के तौर पर उनकी साफ सुथरी छवि ने नीतीश को ऐसी हर परिस्थिति से निकालने में खासी मददगार रही.

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राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन करना नीतीश का एक ऐसा ही राजनीतिक चालाकी वाला फैसला है. इस फैसले ने बिहार की महागठबंधन वाली सरकार के सामने असहज स्थितियां पैदा कर दी हैं. हालात चाहे जैसे बन पड़े हों लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल लालू यादव के सामने है.

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तस्वीर: तेजस्वी यादव के फेसबुक वाल से साभार

महागठबंधन की सरकार को बचाए रखना लालू यादव की मजबूरी है और इस कोशिश में वो किस कदर जूझ रहे हैं ये देखने को भी मिल रहा है. सोमवार को बिहार बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी ने कुछ चुभती हुई बातें कहीं लेकिन वो ज्यादा मौजूं दिखती हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि लालू यादव में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो गठबंधन तोड़ दें.

सुशील कुमार मोदी बोले, ‘अगर गठबंधन टूटता है तो सर्वाधिक नुकसान हजार करोड़ की बेनामी संपत्ति के मामले में घिरे उनके बेटों और परिवार को होने वाला है. अपने बेटों को बचाने के लिए उन्हें राज्य सरकार का संरक्षण चाहिए. ऐसे में आरजेडी के गरजने वाले बादल यानी प्रवक्ता कभी बरसेंगे नहीं.’

विपक्ष में नीतीश अकेले क्यों?

भ्रष्टाचार के आरोपों में लालू अपने परिवार समेत चौतरफा फंसे हैं. ऐसे में वो सरकार से बाहर जाने का जोखिम बिल्कुल भी नहीं लेना चाहेंगे. वहीं नीतीश कुमार के सामने स्थितियां ज्यादा अनुकूल है. वो जानते हैं कि अगर आरजेडी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो वो बीजेपी के सहयोग से अपनी सरकार बचाए रख सकते हैं. इस बारे में संकेत भी साफ हैं.

रामनाथ कोविंद के नीतीश के समर्थन देने की बात से ही बीजेपी नेताओं की उनसे पुरानी दोस्ती याद आने लगी थी. इसी निश्चिंतता की वजह से जेडीयू नेता आरजेडी और कांग्रेस के प्रति हमलावर भी रहे हैं.

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गैर बीजेपी दलों के गठबंधन में नीतीश कुमार अलग-थलग पड़ गए हैं. और ऐसा नीतीश कुमार की अपनी विचारधारा से भटकाव से ज्यादा उनकी रणनीति को अहमियत न दिए जाने की वजह से हुआ है.

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एक वक्त में खुद नीतीश कुमार ने बिहार की तर्ज पर पूरे देश में महागठबंधन की वकालत की थी. नीतीश कुमार ने खुद कहा था कि उनकी लेफ्ट पार्टियों से बात भी हो गई है, एक कॉमन प्लेटफॉर्म पर आकर ही हम बीजेपी का मुकाबला कर सकते हैं.

लेकिन नीतीश कुमार जिस पहल को लेकर आगे बढ़े उसको तवज्जो नहीं दी गई और इसी वजह से कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के गठबंधन से उनका मोहभंग हुआ.

नीतीश के लिए आसान नहीं था महागठबंधन का फैसला 

ये बात माननी होगी कि बीजेपी और मोदी के प्रचंड लहर के सामने खड़े होने का दम नीतीश कुमार ने ही दिखाया. न सिर्फ दिखाया बल्कि लहर से पार पाकर उन्हें परास्त भी किया. और ऐसा सिर्फ नीतीश कुमार की अपनी राजनीतिक समझ और मौके की नजाकत भांपकर लिए गए फैसले की बदौलत संभव हुआ.

2015 में लालू यादव के साथ जाने का फैसला लेना आसान नहीं था. लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करते हुए उन्होंने ये कदम उठाया. तमाम आलोचनाओं से बेपरवाह होकर आगे बढ़े क्योंकि उन्हें लगा कि यही एक तरीका है जिसके बूते मोदी से अलग होकर एक अलग लकीर खींची जा सकती है. और ऐसा हुआ भी. लेकिन इसके बाद की रणनीति में नीतीश कुमार को विपक्ष के गठबंधन में वो अहमियत नहीं मिली.

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महत्वाकांक्षी नीतीश 

नीतीश जानते हैं कि मोदी को उनके तय किए एजेंडे में उन्हें हराया नहीं जा सकता. ये बात उन्होंने विपक्ष के गठबंधन को बार-बार समझाने की कोशिश की. कुछ मीडिया रिपोर्ट के हवाले से ये भी कहा जाता है कि अप्रैल में सोनिया गांधी से हुई उनकी मुलाकात में उन्होंने यही सलाह दी थी. उन्होंने कहा था कि मोदी की हर बात पर प्रतिक्रिया देने के बजाए विपक्ष अपना सेक्युलर एजेंडा तय करे. लेकिन उनकी बात के हिसाब से रणनीति नहीं बन पाई.

राजनीति में महत्वाकांक्षा होना बुरी बात नहीं है इसलिए नीतीश प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हों इसमें कोई गलत बात नहीं है. शायद यूपी चुनाव के नतीजों के बाद उन्होंने खुद को अपनी इस महत्वाकांक्षा से दूर कर लिया है.

विपक्ष का बिखराव 2019 में मोदी के सामने उन्हें खड़ा होने को कोई समझदार कदम नहीं मानता. राहुल गांधी, ममता बनर्जी या मुलायम सिंह यादव जैसे चेहरे विपक्ष के गठबंधन में नीतीश का यकीन डगमगाने के लिए काफी हैं. अगर स्थितियां ऐसी बनी हैं जिसमें नीतीश बीजेपी के करीब जाते दिख रहे हैं तो ये उनकी चालाकी भरा एक और कदम है उससे ज्यादा कुछ नहीं.

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