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जब माखनलाल चतुर्वेदी ने अंग्रेजी अखबारों की होली जलाने से डॉ लोहिया को रोक दिया था

डा.लोहिया ने ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक वाली चर्चित कविता के लेखक चतुर्वेदी जी से कहा कि ‘दादा, लड़ाई लड़नी है.

Surendra Kishore Surendra Kishore | Published On: May 15, 2017 10:50 AM IST | Updated On: May 15, 2017 11:32 AM IST

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जब माखनलाल चतुर्वेदी ने अंग्रेजी अखबारों की होली जलाने से डॉ लोहिया को रोक दिया था

मशहूर साहित्यकार और पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी की सलाह पर डॉ.राम मनोहर लोहिया ने अंग्रेजी अखबारों की होली जलाने का विचार त्याग दिया था. यह बात 1958 की है. इस मुददे पर चतुर्वेदी जी से आशीर्वाद लेने डॉ. राम मनोहर लोहिया खंडवा गये थे. चतुर्वेदी जी खंडवा में रहते थे.

डा.लोहिया ने ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक वाली चर्चित कविता के लेखक चतुर्वेदी जी से कहा कि ‘दादा, लड़ाई लड़नी है. दक्षिण में जिससे पूछा, उसी ने एक ही बात कही, जो लड़ाई लड़नी है, उसके लिए हिंदी में केवल एक व्यक्ति हैं जिसका समर्थन पाना विजयश्री पाने के समान है, वह हैं माखन लाल चतुर्वेदी.’

याद रहे कि तब लोहिया की उम्र मात्र 48 साल थी और दादा की उम्र 69 साल. डा.लोहिया में उत्साह अधिक था तो दादा में वैचारिक प्रौढ़ता. डॉ. लोहिया की इस बात पर दादा ने कहा कि ‘आते ही लड़ाई की बातें ! सन 28 के बाद मिले हो. इतने वर्षों के बाद भी तुममें कोई अंतर दिखाई नहीं देता.’

इस पर डॉ. लोहिया ने कहा कि वह लड़ाई तो अंग्रेजों से थी. यह तो घर की लड़ाई है. ज्यादा महत्वपूर्ण है, इन दिनों. दो दिग्गजों की उस ऐतिहासिक मुलाकात का विवरण सधी कलम से श्रीकांत जोशी ने लिखा है.

जोशी के अनुसार दादा ने कहा कि ‘रात भर की यात्रा करके आए हो, पहले सामने के कमरे में जाओ, स्नान करो, नाश्ता करो, भोजन करो, दोपहर के बाद बातें होंगीं. तब तक लड़ाई का रुख भी कुछ कम हो लेगा.’

अब जरा चतुर्वेदी जी के बारे में कुछ बातें. हमलोग छात्र जीवन में ही उनका नाम सुन रखा था. देश प्रेम से भरी उनकी सिर्फ एक कविता को लेकर, उस कविता का शीर्षक है ‘पुष्प की अभिलाषा.’

उसकी अंतिम पंक्तियां यहां दर्ज करने लायक हैं. ‘मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक. ’

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कई अन्य कारणों से माखनलाल जी की देश में बड़ी प्रतिष्ठा थी. इसीलिए तो 1942 के आंदोलन के एक नायक डॉ.राम मनोहर लोहिया ‘दादा’ से मिलने खंडवा पहुंच गये थे. अब जरा दोनों महारथियों के बीच की बातचीत पर एक नजर !

डा. लोहिया ने कहा कि हमारी पार्टी की योजना अंग्रेजी अखबारों की होली जलाने की है. हिंदी के विकास में ये ही बाधक हैं. ये हमारी गुलाम वृत्ति को कायम रखे हुए है. गांधी जी ने जिस तरह विदेशी कपड़ों का बोनफायर कर खादी को प्रतिष्ठित किया था, उसी तरह अंग्रेजी पत्रों के बोनफायर से हिंदी और हिंदी पत्रकारिता की रक्षा की जा सकती है.

नम्र भाषा अपना महत्व खो चुकी है, अब जब तक कुछ ऐसी बात न हो, जो जन सामर्थ्य को व्यक्त करे और परिस्थितियों को एक धक्का दे ,तब तक कोई बदलाव संभव नहीं प्रतीत होता.

यदि आपका समर्थन मिले तो आपके अनुमोदन का उल्लेख करते हुए साहित्य, राजनीति, समाज, व्यवसाय और दूसरे क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों का सहयोग प्राप्त कर एक अपील की जा सकती है. एक अखिल भारतीय मूवमेंट की शुरुआत की जा सकती है.

डॉ. लोहिया ने चतुर्वेदी जी के सामने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से अपने विचार रखे. दादा कुछ देर चुप बैठे रहे. फिर बड़ी ही शांत वाणी में उन्होंने कहा,‘लोहिया जी, हिंदी के प्रति आपकी चिंता से मुझे प्रसन्नता हुई. राजनीति में मुझे इतनी गहन चिंता अन्य किसी के मस्तिष्क में अंकित नहीं दिखाई दे रही है, जैसी आपके मस्तिष्क पर है. यह बहुत बड़ी बात है. राजनीति यदि संस्कृति तक पहुंचती है, भाषा का सुहाग बनना चाहती है तो माना जा सकता है कि हम सचमुच स्वाधीन राष्ट्र हैं. किंतु ऐसा कुछ भी अभी नहीं है. आपकी वाणी ने मेरी निराशा को कम किया है. किंतु हिंदी के भविष्य के बारे में मैं निराश नहीं हूं. हिंदी ने राजनीति का मुंह कभी नहीं देखा.

दादा ने डॉ. लोहिया से यह भी कहा कि यदि हम अंग्रेजी अखबारों की होली जलाते हैं तो अपनी ही कमजोरी का इजहार करते हैं. हमारे युग में इस मनोवृत्ति का मेल मुझे दिखाई नहीं देता. स्वतंत्रता से पहले भी हमने इस तरह नहीं सोचा. हिंदी और हिंदी पत्रकारिता को गैर हिंदी लोगों का तन मन से समर्थन मिलता रहा.

Ram Manohar Lohia

डॉ. लोहिया ने कहा कि ‘पंडित जी, आप ठीक कहते हैं. किंतु अब केवल भावना से नहीं कुछ ठोस करने से ही काम चलेगा. भावना अपनी जगह है. चतुर्वेदी जी ने कहा कि मैं तो भावना का आदमी हूं. भावना से अधिक ठोस मेरे पास कुछ नहीं. संपूर्ण संग्राम ही भावना से लड़ा गया है. जो हिंदी, अंग्रेजी अखबारों को जला कर जिएगी वह कितने दिन जिएगी ?

मुगल काल में हमारा संत हर चुनौती को चुनौती देता रहा. ऐसी चुनौतियां अब क्यों नहीं हैं? अच्छा यह बताइए कि लोग अंग्रेजी अखबार क्यों पढ़ते हैं? मैं खुद अंग्रेजी अखबार पढ़ता हूं. मुझे अमृत बाजार पत्रिका, फ्री प्रेस और हितवाद न मिलें तो मेरा काम नहीं चलता. डॉ.लोहिया ने कहा कि अंग्रेजी अखबारों के पास सुविधाएं हैं. शासन का समर्थन है. आर्थिक सपन्नता है.

इस पर दादा ने कहा कि लेकिन उनके पास श्रम का भी महत्व है. कम साधनों से भी गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ने सफलता पाई. उनमें श्रम, सूझ और दृष्टि थी. मध्य प्रदेश में भी ‘कर्मवीर’ को वैसी ही सफलता मिली. अंत में डॉ. लोहिया ने दादा से कहा कि आपसे बातचीत कर बहुत संतोष हुआ. मैं फिर भी चाहूंगा कि आप मेरे अनुरोध पर और गहन विचार करें.

बहुत सी बातें हैं, पर आपकी बातें भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. बाद के वर्षों में डॉ. लोहिया के लोगों ने अंग्रेजी साइन बोर्ड पर कालिख पोतने का काम तो किए पर अंग्रेजी अखबारों की भी होली जलाई, ऐसा सुना या देखा नहीं गया. शायद दादा की बातों का असर था.

इस मुलाकात से एक बात और सामने आई. पहले के राजनेता चतुर्वेदी जी जैसे महान गैर राजनीतिक हस्तियों से मुलाकात के लिए दूर चलकर भी उनके घर जाते थे. और आज के नेता गण ?

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