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जब दिग्विजय शासन में किसानों पर चलीं थीं गोलियां, बीजेपी ने कहा था 'जलियांवालाबाग कांड'

1998 में दिग्विजय सिंह की कांग्रेसी सरकार में सोयाबीन की खेती के लिए सही मुआवजे की मांग कर रहे किसानों पर चली थीं गोलियां

Ravishankar Singh Ravishankar Singh | Published On: Jun 10, 2017 11:44 PM IST | Updated On: Jun 11, 2017 12:18 AM IST

जब दिग्विजय शासन में किसानों पर चलीं थीं गोलियां, बीजेपी ने कहा था 'जलियांवालाबाग कांड'

मध्यप्रदेश में 6 किसानों की पुलिस गोलीबारी में मौत ने अब देशभर में आंदोलन का रूप ले लिया है. देशभर के विभिन्न किसान संगठनों के नेता 11 जून को रतलाम में जुट रहे हैं. देशभर के किसान मंदसौर गोलीकांड में पुलिस गोलीबारी में मारे गए किसानों को श्रद्धांजलि देंगे और भविष्य की रणनीति का खुलासा करेंगे.

11 जून को मंदसौर की घटना को राष्ट्रीय फलक पर आवाज देने के लिए देशभर के किसान नेता एकजुट हो रहे हैं. समाजवादी समागम के संयोजक और किसान संघर्ष समिति एवं भूमि अधिकार आंदोलन के पूर्व विधायक डॉ सुनीलम, समाजसेवी स्वामी अग्निवेश, मेधा पाटेकर, स्वराज इंडिया पार्टी के संयोजक योगेंद्र यादव सहित कई किसान नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और छात्र नेता इस बैठक में शामिल हो रहे हैं.

लेकिन, 19 साल पहले मध्यप्रदेश के ही बैतूल जिले में मुलताई तहसील में एक और गोलीकांड हुआ था. 12 जनवरी 1998 को हुए इस गोलीकांड में 24 किसान मारे गए थे. इस किसान आंदोलन की गुवाई कर रहे थे डॉ सुनीलम.

तत्कालीन विधायक डॉ. सुनीलम को करवाया था गिरफ्तार

dr sunilam

डॉ सुनीलम को मध्यप्रदेश की तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के मुखिया दिग्विजय सिंह ने गिरफ्तार करवाया था. दिग्विजय सिंह सरकार ने लगभग 250 किसानों पर 67 मुकदमे दर्ज किए थे. मुलताई में हुए किसान आंदोलन उस समय देश की मीडिया में चर्चा का केंद्र बन गया था.

राजनीति के जानकार मानते हैं कि मुलताई गोलीकांड के बाद ही कांग्रेस की दिग्विजय सिंह की सरकार को प्रदेश की सत्ता से बाहर होना पड़ा था. जो आज तक बाहर है.

अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या मंदसौर में किसानों पर ताजा गोलीबारी के बाद मध्यप्रदेश में बीजेपी भी सत्ता से दूर होने वाली है. इन सारे बिदुंओं पर फर्स्टपोस्ट हिंदी ने उस समय के किसान आंदोलन के प्रमुख और समाजवादी नेता डॉ सुनीलम से बात की. डॉ सुनीलम ने उस समय के घटनाक्रमों को सिलसिलेवार तरीके से फर्स्ट पोस्ट हिंदी से शेयर किया.

फर्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए समाजवादी समागम के संयोजक डॉ सुनीलम कहते हैं, ‘मंदसौर में जो अभी पुलिस गोलीकांड हुआ है, इसमें 6 किसानों की मौत हुई है. पहले सरकार ने इंकार किया कि हमने गोली नहीं चलवाई. बाद में राज्य के गृह मंत्री ने गोली चलने की बात स्वीकार की. मंदसौर गोलीकांड को दूसरा मुलताई गोलीकांड कहा जा रहा है.’

डॉ सुनीलम कहते हैं, ‘हम आपको 1997 में शुरू हुई मुलताई घटना के बारे में बताना चाह रहे हैं, ‘मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में सोयाबीन की फसलें लगातार तीन साल से खराब हो रही थीं. बैतूल जिले की मुलताई तहसील में 12 जनवरी 1998 को किसान लगातार फसलें खराब होने के कारण मुआवजे की मांग को लेकर एक सभा कर रहे थे. उस सभा में बीएसपी के संस्थापक कांशीराम भी मौजूद थे. किसानों के आंदोलन को कुचलने के लिए दिग्विजय सिंह की सरकार ने पुलिस को उपयोग किया.

mandsaur

प्रतीकात्मक तस्वीर

डॉ सुनीलम आगे कहते हैं, ‘पुलिस के द्वारा किसानों की सभा को चारों तरफ से घेर लिया गया. बैतूल के एसपी की मौजूदगी में पुलिस ने किसानों पर गोली चलाई. जिसमें 24 किसान शहीद हुए, 150 किसानों को गोली लगी. सरकार ने 250 किसानों पर 67 फर्जी मुकदमे दर्ज किए. हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, आगजनी, सरकारी काम मे बाधा सहित तमाम अपराधों को लेकर दर्ज फर्जी मुकदमे 12 जनवरी 1998 से आज तक चल रहे हैं. किसान संघर्ष समिति द्वारा हर वर्ष की तरह 12 जनवरी को शहीद किसान स्मृति सम्मेलन का आयोजन मुलताई में किया जा रहा है.’

सुनीलम कहते हैं, ‘मध्यप्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए कर्ज माफी, बिजली बिल माफी, किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चत करने, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने, पैदावार एवं फसल बीमा तय करने की इकाई बनाने, मंदसौर में गोली चलाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से मंदसौर गोलीकांड की जांच कराने की मांग करेंगे.

मुलताई कांड से शिवराज सरकार ने नहीं लिया सबक

Shivraj Singh

सुनीलम का मानना है कि मुलताई कांड से शिवराज सरकार ने कोई सबक नहीं लिया. उस समय सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन किया था, जिसमें यह निष्कर्ष निकला था कि गोलीकांड प्रशासनिक, पुलिस अधिकारियों और किसान आंदोलन के नेताओं के बीच संवादहीनता का परिणाम था.

उनका ये भी आरोप है कि राज्य सरकार इस बार भी मुलताई कांड की तरह ही व्यवहार कर रही है. इस बार भी मंदसौर, रतलाम, उज्जैन, धार सहित किसान आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में सैकड़ों किसानों पर मुकदमे दर्ज किए गए हैं.

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई में किसानों पर हुई गोलीबारी कांड में घटना के 14 वर्ष बाद 2012 में फैसला आया. मुलताई जिला न्यायालय ने मुलताई गोलीकांड में हत्या के दोषी पाए जाने पर पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम सहित तीन लोगों को आजीवन कारावास एवं हत्या के प्रयास में सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई.

मुलताई गोलीकांड में पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत अलग-अलग 67 मामले दर्ज किए थे, जिनमें से तीन मामलों में मुलताई के अपर सत्र न्यायाधीश ने अपना फैसला सुनाया था. मुलताई गोलीकांड मामले में कई मामले में डॉ सुनीलम को अब तक बरी भी किया जा चुका है.

डॉ सुनीलम कहते हैं, ‘किसानों पर गोली चलाने के कारण कांग्रेस पार्टी की सरकार मध्यप्रदेश से दूर हो गई. पिछले 14 सालों में बीजेपी की सरकार ने प्रदेश में ढाई लाख मुकदमें वापस लिए हैं. लेकिन, मुलताई के किसानों के मुकदमें अब तक वापस नहीं लिए गए हैं. मुलताई में न तो अब तक शहीद स्तंभ के निर्माण के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं.’

सुनीलम ने 1998 की घटना को लेकर शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र लिखा था. पत्र के जरिए उन्होंने बीजेपी सरकार को ये याद दिलाने की कोशिश की थी उस समय बीजेपी ने मुलताई कांड को जलियावालाबाग कांड कहा था. उस समय उमा भारती ने सरकार आने पर सारे मुकदमे लेने की बात कही थी. उनकी अपील थी कि अब केस वापस लिए जाने चाहिए.

लेकिन, मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार ने आज तक मुलताई किसान आंदोलन से जुड़े 67 में से एक भी केस वापस नहीं लिया है. पिछले 19 सालों अनेक बार पेशी चूक जाने के चलते सैकडों किसान कई बार गिरफ्तार किए जा चुके हैं. इस घटना से जुड़े 20 किसानों की अब तक मौत भी हो चुकी है.

किसानों की असली समस्याओं पर बात होनी चाहिए 

FARMER WALKS DURING A CLOUDY EVENING NEAR BHOPAL.

मंदसौर की घटना पर जब वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी से बात की तो उनका जवाब था, ‘ देखिए मेरा जो अनुभव है उससे यही लगता है कि किसान आंदोलन बहुत ज्यादा राजनीतिक रंग नहीं लेता है. 80-90 के दौर में महेंद्र सिंह टिकैत का भी किसान आंदोलन हुआ था. केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी. महेंद्र सिंह टिकैत ने 4 लाख किसानों के साथ दिल्ली को घेर लिया था. नतीजा क्या निकला?

अरुण त्रिपाठी आगे कहते हैं, ‘किसान आंदोलन की ऊर्जा का रूपांतरण बड़ी मुश्किल से हो पाता है. कौन पार्टी जीतेगी, कौन चुनाव हारेगा. इन संदर्भों में चर्चा करने के बजाए हमें यह चर्चा करनी चाहिए कि किसान कितना संकट में है और खेती कितने संकट में है? क्या खेती की भविष्य है या नहीं है. इस औद्योगिक व्यवस्था में खेती का क्या रूप रहेगा इस पर हमें चर्चा करनी चाहिए?

अरुण त्रिपाठी आगे कहते हैं, कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश में कोई चेहरा नहीं है. कांग्रेस अगर कोई चेहरा दे दे तो कांग्रेस की सत्ता में वापसी भी हो सकती है. मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह से लोगों में काफी नराजगी है. भ्रष्टाचार भी है मनमनापन भी है और उन्होंने अभी दमन करना भी शुरू कर दिया है. राज्य में बदलाव हो सकता है. पर, देश में कोई बड़ा आंदोलन खड़ा होगा इसमें मुझे संदेह है.

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