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नीतीश की गैरमौजूदगी में विपक्ष की बैठक के मायने क्या हैं ?

विपक्षी बैठक के एक दिन पहले ही नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अपनी अलग राह पकड़ ली

Amitesh Amitesh Updated On: Jun 22, 2017 11:59 AM IST

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नीतीश की गैरमौजूदगी में विपक्ष की बैठक के मायने क्या हैं ?

सोनिया गांधी की अगुआई में विपक्षी दलों का कुनबा राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार के चयन के लिए बैठ रहा है. दोपहर के बाद होने वाली इस बैठक में चर्चा इस बात पर होगी कि एनडीए के दलित कार्ड का तोड़ कैसे निकाला जाए.

लेकिन, इस बैठक में विपक्ष की तरफ से सबसे भरोसेमंद चेहरे माने जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गैरमौजूदगी ने विपक्षी एकता की हवा निकाल दी है. विपक्षी बैठक के एक दिन पहले ही नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अपनी अलग राह पकड़ ली. अब नीतीश बीजेपी के रामनाथ कोविंद के साथ खड़े हो गए हैं.

आखिर नीतीश के बगैर विपक्ष की बैठक का मतलब कितना प्रासंगिक रह जाता है. क्योंकि मोदी विरोधी दलों को एक करने की पहल तो सबसे पहले नीतीश कुमार ने ही शुरू की थी. कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से 20 अप्रैल को हुई बैठक में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चर्चा भी की थी. लेकिन, मोदी को घेरने की बारी आई तो वो खुद ही इस पहल से अलग हो गए.

sonia gadhi nitish kumar (1)

जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने इसके पहले भी विपक्ष की बैठक से दूरी बनाई थी, जिसको लेकर सियासी गलियारों में काफी चर्चा रही थी.  पिछले महीने की 26 तारीख को सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा के लिए सभी विपक्षी दल के प्रमुख नेताओं को भोज दिया था. लेकिन, नीतीश कुमार इस बैठक से नदारद रहे. उनकी जगह जेडीयू नेता शरद यादव और के सी त्यागी ने इस विपक्षी भोज में शिरकत की थी.

उस वक्त नीतीश कुमार के व्यस्त सरकारी कार्यक्रमों का हवाला देकर जेडीयू ने इस मामले में अपनी तरफ से सफाई देने की कोशिश की थी. लेकिन, इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से दिल्ली में ही दिए गए भोज में शामिल होकर नीतीश कुमार ने सबको चौंका दिया था. प्रधानमंत्री की तरफ से मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीन जगन्नाथ के सम्मान में भोज दिया गया था, जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शामिल हुए थे.

नीतीश ने किस विवाद से पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी?

सोनिया के भोज को ना और मोदी के भोज को हां कहने के बाद सियासी गलियारों में उनकी बीजेपी के साथ नजदीकी की चर्चा खूब हुई थी. उस वक्त आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने उनके ऊपर कटाक्ष भी किया था. लेकिन, उस वक्त मॉरीशस से बिहार कनेक्शन का हवाला देकर नीतीश ने इस विवाद से पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी.

लेकिन, इस बार विपक्ष की बैठक से वो खुद गायब हैं ही, शरद यादव और के सी त्यागी के भी बैठक में जाने पर रोक लगा दी है. जेडीयू इस विपक्षी बैठक से नदारद है. कम से कम राष्ट्रपति चुनाव को लेकर जेडीयू, बीजेपी के साथ खड़ी दिख रही है.

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उनके कदम से कांग्रेस हैरान है और परेशान भी. उसे लग ही नहीं रहा है कि आगे विपक्ष को कैसे एकजुट रखा जाए. क्योंकि, नीतीश के बाद अब मायावती की तरफ से भी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कोविंद को समर्थन दिए जाने के संकेत दिए गए हैं. हालांकि, किसी दलित उम्मीदवार के नाम को विपक्ष की तरफ से आगे किए जाने पर मायावती विपक्ष के साथ बनी रह सकती हैं.

ऐसी सूरत में विपक्ष की तरफ से भी किसी दलित उम्मीदवार के नाम पर ही मुहर लगाई जा सकती है. लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार की एक दिन पहले ही सोनिया गांधी से मुलाकात हुई, जिसके बाद उनके नाम के भी कयास लगाए जा रहे हैं. मीरा कुमार के नाम को आगे कर मायावती को भी साथ रखा जा सकता है.

maywati and ramnath kovind

जबकि, लेफ्ट और टीएमसी समेत बाकी दूसरे विपक्षी दलों के लिए भी किसी दलित नेता के नाम पर सहमति ली जा सकती है. हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, लेफ्ट की तरफ से बाबा साहब अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर का नाम भी सामने लाया जा सकता है.

लेकिन, अब विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति चुनाव को लेकर लड़ाई महज औपचारिकता मात्र ही रह गई है. इस सांकेतिक लड़ाई के लिए ही सही एनडीए के दलित कार्ड के खिलाफ अब विपक्ष भी दलित कार्ड की ही तैयारी में है. भले ही वो मीरा कुमार हों, सुशील कुमार शिंदे, प्रकाश अंबेडकर या फिर कोई और...

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