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भारत के वो दो वित्त मंत्री जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे

हो सकता है कि टीटी कृष्णमाचारी की तरह, चिदंबरम भी जांच के बाद बेदाग निकलें

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: May 17, 2017 01:53 PM IST

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भारत के वो दो वित्त मंत्री जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और देश के पांचवें वित्त मंत्री रहे टीटी कृष्णमाचारी में कई समानताएं हैं. दोनों ही नेताओं को ऐसे वित्त मंत्री के तौर पर याद किया जाएगा जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. कृष्णमाचारी और पी चिदंबरम, दोनों ही अच्छे वक्ता थे. कई मुद्दों पर दोनों ने अपने-अपने दौर में बेबाक बयानी की.

कृष्णमाचारी पर क्या है आरोप?

लेकिन कृष्णमाचारी और चिदंबरम के बीच समानता यहीं खत्म हो जाती है. बात 1957 की है. तब के वित्त मंत्री कृष्णमाचारी पर आरोप लगा था कि उन्होंने सरकारी बीमा कंपनी एलआईसी का दुरुपयोग करके कानपुर के कारोबारी हरिदास मूंदड़ा को गैरवाजिब तरीके से कर्ज दिलवाया था.

जब संसद में कृष्णमाचारी पर तीखे हमले हुए तो वो उनका ठीक से जवाब नहीं दे पाए. मूंदड़ा को जिस तरीके से कर्ज दिया गया, उस पर सवाल उठे. संसद में कृष्णमाचारी पर हमले की अगुवाई उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दामाद फिरोज गांधी कर रहे थे.

सरकार ने मामले की न्यायिक जांच कराई, जिसमें साफ हुआ कि किस तरह छल, प्रपंच, फर्जीवाड़ा और धोखाधड़ी करके मूंदड़ा को फायदा पहुंचाया गया. मामले में चौतरफा घिरे कृष्णमाचारी को पंडित नेहरू ने कैबिनेट से हटा दिया.

आजादी के बाद पहला घोटाला?

तब आजादी हासिल हुए ज्यादा दिन नहीं बीते थे. नेहरू भी गांधी के सार्वजनिक जीवन में शुचिता के सिद्धांतों को मानते थे. इसीलिए वो कृष्णमाचारी को बर्खास्त करने को मजबूर हुए. उनके सचिव को भी हटा दिया गया. ये बात और है कि छह साल बाद 1963 में नेहरू ने कृष्णमाचारी को फिर से मंत्री बना दिया.

Chidambaram

नेहरू के बरक्स, मनमोहन सिंह को दागी नेताओं को अपने मंत्रिमंडल में जगह देने से कोई ऐतराज नहीं था. जब चिदंबरम मनमोहन सरकार में मंत्री थे, तो उनके बेटे कार्ती चिदंबरम का सिक्का सरकारी अमले पर खूब चलता था.

अब घेरे में चिदंबरम

ये बात जगजाहिर थी. कार्ती के बहुत से सौदों की प्रवर्तन निदेशालय, इनकम टैक्स विभाग और सीबीआई जांच कर रहे थे. सीबीआई के अफसरों ने शारदा चिट फंड घोटाले में चिदंबरम की पत्नी नलिनी से लंबी पूछताछ की थी.

मनमोहन सिंह के लिए सिर्फ यही नहीं, चिदबंरम को कैबिनेट से हटाने की और भी कई वजहें थीं. मगर खुद मनमोहन को अपनी कुर्सी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की कृपा से मिली हुई थी.

इसीलिए मनमोहन सिंह, गांधी परिवार के सामने नतमस्तक थे. वहीं चिदंबरम को सोनिया गांधी का बेहद करीबी माना जाता था.. इसीलिए चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई की मनमोहन सिंह और भी हिम्मत नहीं जुटा सके.

किसको है 'अक्ल का गुरूर'?

आपको याद होगा कि किस तरह कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को चिदंबरम को अक्ल के गुरूर वाला शख्स कहना भारी पड़ा था. इसी तरह उस वक्त कद्दावर मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी को भी चिदंबरम से समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा था, जब उन्होंने गृह मंत्री के तौर पर चिदंबरम के काम-काज पर तल्ख टिप्पणी की थी.

चिदंबरम और उस वक्त वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी के बीच उस वक्त तनातनी हो गई थी, जब पता चला था कि प्रणब मुखर्जी के दफ्तर की जासूसी करने की कोशिश की गई थी.

निशाने पर थे नरेंद्र मोदी

मंत्री रहते हुए चिदंबरम अपनी सियासी औकात से ज्यादा अकड़कर चलते थे. इसकी बड़ी वजह ये थी कि चिदंबरम उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के कामकाज पर अक्सर निशाना साधते थे.

narendramodi

उन्होंने गुजरात की अफसरशाही को मोदी के खिलाफ बगावत के लिए भी उकसाने की कोशिश की थी. इशरत जहां एनकाउंटर केस में गृह सचिव जी के पिल्लई के विरोध के बावजूद उन्होंने केंद्र सरकार का हलफनामा बदल दिया था.

इसी तरह गुजरात सरकार के ऐतराज के बावजूद उन्होंने गुजरात काडर के आईपीएस कुलदीप शर्मा को गृह मंत्रालय में अहम जिम्मेदारी दे दी थी. इसका सीधा मकसद मोदी की अगुवाई वाली गुजरात सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करना था. चिदंबरम काफी हद तक अपनी कोशिशों में कामयाब भी हुए. मगर आखिरकार जीत नरेंद्र मोदी के हाथ लगी.

कार्ती पर है घोटाले का आरोप

चिदंबरम और उनके परिवार के ठिकानों पर सीबीआई के छापे, उनके परिवार के खिलाफ चल रही जांच का नतीजा हैं. सीबीआई चिदंबरम के बेटे कार्ती के कारोबार में वित्तीय गड़बड़ियों की जांच कर रही है.

हालांकि ये कहना जल्दबाजी होगी कि सीबीआई के छापे चिदंबरम या उनके किसी परिजन का जुर्म साबित करते हैं. जांच एजेंसियों का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है. अक्सर वो अदालतों में आरोप सिद्ध नहीं कर पातीं.

मुमकिन हो चिदंबरम बेदाग निकलें

हो सकता है कि टीटी कृष्णमाचारी की तरह, चिदंबरम भी जांच के बाद बेदाग निकलें. फिलहाल ऐसा कुछ नहीं जो चिदंबरम को दोबारा मंत्री बनने से रोक सके. लेकिन मसला वो नहीं है. चिदंबरम आने वाले वक्त में ऐसे वित्त मंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जिनके यहां सीबीआई के छापे पड़े.

हार्वर्ड में पढ़े-लिखे चिदंबरम के लिए अपनी इस विरासत के साथ जीना बड़ी चुनौती होगी.

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