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सियासी गठजोड़ का मर्म ही है जीने की दवा, मरने की दुआ

गठबंधन का गुण-धर्म चाहे जो हो, यह जनहित नाम के गमले में ही फूलता-फलता है

Shivaji Rai | Published On: May 20, 2017 07:39 AM IST | Updated On: May 20, 2017 07:39 AM IST

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सियासी गठजोड़ का मर्म ही है जीने की दवा, मरने की दुआ

बेनामी संपत्ति मामले में आयकर विभाग की छापेमारी के बाद लालू यादव ने ट्वीट क्‍या किया, देशभर में आरजेडी-जेडीयू गठबंधन पर मगजमारी होने लगी. कुछ प्रबुद्धजन गठबंधन में दरार की आशंका जताने लगे तो कुछ एक तीर से दो निशाना की बात कहने लगे.

साथ ही सीएम नीतीश की चुप्‍पी को तो ऐसा बताने लगे जैसे किसी बहू ने चने की भाजी में हल्‍दी बुरक दी हो. चारों तरफ जुमला उछलने लगा कि सियासत में कोई स्‍थाई दोस्‍त या दुश्‍मन नहीं होता. ऐसा लगने लगा जैसे सियासत में अचानक स्‍थाई भाव का अभाव हो गया हो.

लीलाधर तो इसमें कुछ भी असहज नहीं मानते. उनका मानना है कि ताने, उलाहना, रुठना-मनाना, खीझना-खिसियाना तो सियासी गठबंधन के आयाम भर हैं. जो गठबंधन के दौरान स्‍वाभाविक रूप से आते-जाते रहते हैं.

दिल ना मिले तो भी गठबंधन जारी रहे

मुख्‍य स्‍थाई भाव तो 'सियासी और व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ' होता है. जो तमाम अंतरविरोधों के बावजूद भी गठबंधन को स्‍थाईत्‍व प्रदान करता रहता है. जो तमाम खींचतान के बीच भी घटक दलों को फेविकोल के पक्‍के जोड़ से जोड़े रहता है.

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गठबंधन का गुण-धर्म चाहे जो हो. यह जनहित नाम के गमले में ही फूलता-फलता है. यही वजह है कि एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले धुरविरोधी दल भी जनहित का हवाला देकर गठबंधन कर लेते हैं. वो तो जनता की नासमझी है जो इसे अटूट समझ लेती है. इसे सात फेरों या सात जन्‍मों का बंधन समझ लेना भूल ही कही जाएगी.

यह तो लिव-इन-रिलेशन की तरह है. जिसमें एक दूसरे से अलग होने का विकल्‍प हमेशा मौजूद रहता है. साथ रहने का वादा तो होता है, पर गठबंधन में समय सीमा का कोई नैतिक दबाव नहीं होता. खुले दिल से बांह फैलाकर मिला जाता है. पर कोई एकदूसरे के गले नहीं पड़ता. सिर्फ एकदूसरे के प्रति पूर्ण निष्‍ठा का हवाला दिया जाता है. जिससे दिल ना मिले तो भी गठबंधन जारी रहे.

लालू प्रसाद यादव (फोटो: पीटीआई)

लालू प्रसाद यादव (फोटो: पीटीआई)

गठबंधन में सभी स्‍वतंत्र होते हैं. घोड़े और घास को बराबर की आजादी होती है. घोड़ा चरने पर आमादा होता है और घास बढ़ने पर. सभी निर्भय होते हैं, न चोर पुलिस से डरता है, न अपराधी कानून से. सभी आपसी एडजेस्‍टमेंट की राह पर चलते रहते हैं. आपसी एडजेस्‍टमेंट में कोई मजबूरी का हवाला देता है तो कोई मजबूती का, पर सभी मस्‍त सभी रहते हैं.

पुलिस खुद को मजबूर बताती है क्‍योंकि अपराधियों का गठबंधन मजबूत है, अफसर खुद को मजबूर बताते हैं क्‍योंकि व्‍यापारियों का गठबंधन मजबूत है. ,सड़क कमजोर होती हैं क्‍योंकि ठेकेदारों की सियासी पकड़ मजबूत है.

सत्‍ताधारी भ्रष्‍टाचार पर आंख मूंदने को मजबूर हैं क्‍योंकि गठबंधन को मजबूती देनी होती है. राजनीति हो या घर-परिवार गठबंधन की मजबूती के लिए मजबूर होना शाश्‍वत सत्‍य है. घर में पति मजबूर होता है क्‍योंकि पत्‍नी की मायके जाने की धमकी मजबूत होती है.

दो अर्थी बयानबाजी और ट्वीट से बचना चाहिए

बात अगर सियासी गठबंधन की हो तो मजबूरी और मजबूती साथ निभाई जाती है. 'दुआ करते हैं जीने की, दवा करते हैं मरने की' की परंपरा का निर्वहन सदियों से चलता आ रहा है.

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कभी मजबूरी में तो कभी मजबूती के लिए गठबंधन चलते रहे हैं. यह समझना जरूरी है कि गठबंधन सिर्फ रजामंदी का खेल नहीं मजबूरी का सौदा भी होता है. लिहाजा साझेदारी को लेकर तनाव पैदा होना मायने नहीं रखता.

अवधू गुरु का तो कहना है कि लालू यादव को भी परिपक्‍वता दिखाना चाहिए. वक्त की जरूरत को देखते हुए दोअर्थी बयानबाजी और ट्वीट से बचना चाहिए. वैसे भी गठबंधन की किस्‍मत ही खट-पिट वाले पेन से लिखी जाती है. लिहाजा बेमेल, पंचमेल, घालमेल जैसा भी गठबंधन हो, पूरा ध्‍यान आपसी एडजेस्‍टमेंट पर लगाना चाहिए. कवि रहीम ने भी कहा है.

‘रहिमन खोजै ऊख में, जहां रसन की खानि. जहां गांठ तहं रस नहीं, यही प्रीति में हानि.'

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