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सहारनपुर हिंसा: अशांत इलाकों में धार्मिक-जातीय गोलबंदी एक सच्चाई है

बीते कुछ सालों में पश्चिम यूपी में हिंसा की खबरें हर कुछ समय के बाद आती रहती हैं

FP Staff Updated On: May 26, 2017 12:43 PM IST

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सहारनपुर हिंसा: अशांत इलाकों में धार्मिक-जातीय गोलबंदी एक सच्चाई है

पश्चिमी उत्तरप्रदेश का सांप्रदायिक तेवर बहुत बड़े मसलों में एक है और सहारनपुर की हालिया हिंसा से इलाके में मौजूद डावांडोल हालात को लेकर बहस शुरू हो गई है.

सहारनपुर में खूनी संघर्ष दलित और ठाकुर समुदाय के बीच चल रहा है और मुसलमान भी अब इसकी चपेट में आ गए हैं. दलित और ठाकुर समुदाय के नेताओं का कहना है कि सहारनपुर में चल रहा जातिगत संघर्ष अपने मिजाज में सियासी है और इसे योगी आदित्यनाथ सरकार के सामने मौजूद कानून-व्यवस्था की बहाली की पहली बड़ी चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा है.

हिंसा के दुष्चक्र की शुरुआत शब्बीरपुर गांव से हुई जहां दलितों की 600 और ठाकुरों की तकरीबन 900 आबादी है.

जातिगत हिंसा के शिकार हुए दलित समुदाय के लोगों का कहना है कि अगड़ी जाति के ठाकुरों ने उन्हें गांव के रविदास मंदिर के परिसर में बीआर आंबेडकर की मूर्ति लगाने से रोका. 5 मई के रोज ठाकुरों ने राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर जुलूस निकाला तो दलितों के एक समूह ने इस पर आपत्ति की. इससे हिंसा भड़क उठी जिसमें एक व्यक्ति की मौत हुई और 15 लोग घायल हुए.

'मायावती सत्ता में थीं तो नहीं तो नहीं होती थी हिम्मत'

Mayawati

गांव के जाटव (दलित) समुदाय के लोगों का कहना है कि ठाकुरों ने ‘बहनजी(मायावती) के सत्ता में रहने तक अपने जज्बातों पर काबू रखा था लेकिन अब स्थिति बदल गई है’. सहारनपुर के जिला अस्पताल में अपने घावों का उपचार करा रहे 62 वर्षीय दलसिंह ने पीटीआई को बताया 'सत्ता एक ठाकुर यानी योगी आदित्यनाथ के हाथों में है.

ऐसे में उनके समुदाय के लोग अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. बीएसपी के राज में ये लोग कहते थे कि दलितों को छूना भी मत क्योंकि वे बिजली के हाई-वोल्टेज तार हैं लेकिन अब इन लोगों ने मार-काट मचा रखी है. अभी तो इस सरकार के दो ही महीने गुजरे हैं, पांच साल का समय बहुत लंबा होता है.'

55 साल के श्याम सिंह का घर जातिगत संघर्ष में आग की भेंट चढ़ गया. उन्होंने पीटीआई को बताया, 'बीजेपी अपने ठाकुर वोटबैंक को हिंसा के सहारे गोलबंद करना चाहती है क्योंकि जल्दी ही स्थानीय निकाय के चुनाव होने वाले हैं.'

पीटीआई ने जातिगत संघर्ष के पीड़ित स्वप्निल भास्कर को यह कहते हुए दिखाया है, ' सड़कदुधली गांव में अप्रैल महीने में अंबेडकर जयंती के अवसर पर आयोजित एक रैली में बीजेपी ने दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने की कोशिश की. उन लोगों की नजर दलित वोट पर है.'

भीम सेना के कुछ सदस्यों ने 9 मई के रोज एक बस जला दी और कई दोपहिया वाहन फूंक दिए. इन लोगों ने 5 मई के जातिगत संघर्ष के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के लिए गांधी पार्क में महापंचायत करने की अर्जी दी थी लेकिन प्रशासन ने अनुमति नहीं दी.

राजनीतिक दलों के कारण हालात और भी खराब हुए हैं. सत्ताधारी दल और विपक्षी पार्टियां जातिगत संघर्ष के मुद्दे पर एक-दूसरे पर निशाना साधे हुए हैं.

मायावती कह रही हैं कि हिंसा के लिए सरकार जिम्मेदार है जबकि एक वरिष्ठ मंत्री का आरोप है कि ये लोग घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं.

सहारनपुर के अपने दौरे में मायावती ने सत्ताधारी दल पर आरोप लगाया कि बीजेपी के अपने दस्ते के लोग कमजोर तबकों को निशाना बना रहे हैं लेकिन सरकार उन्हें नहीं रोक पा रही.

पश्चिम यूपी में बीते कई सालों से गर्म है माहौल

मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सेना की पेट्रोलिंग की तस्वीर. (रायटर फोटो)

मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सेना की पेट्रोलिंग की तस्वीर. (रायटर फोटो)

बात चाहे सहारनपुर की हो या मेरठ, हाशिमपुरा और मजफ्फरनगर की—पश्चिम उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक संघर्ष कोई नई बात नहीं है. 2016 में नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा में एक आंकड़ा पेश किया.

इसके मुताबिक 2014 की तुलना में 2015 में सांप्रदायिक संघर्षों में 17 फीसद का इजाफा हुआ. बेशक 2015 में सांप्रदायिक संघर्षों की संख्या बढ़ी है लेकिन 2013 की तुलना में यह कम है. 2013 में सांप्रदायिक हिंसा की 823 घटनाएं हुईं. इसमें 133 लोगों की जान गई और 2269 लोग घायल हुए.

इस तादाद में बड़ा योगदान मुजफ्फरनगर में भड़के दंगे का रहा. यह दंगा कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए के राज में हुआ था.

उस वक्त उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और 155 दंगों के साथ यूपी 2013 में सांप्रदायिक संघर्ष के मामले में राज्यों के बीच शीर्ष पर रहा.

उत्तरप्रदेश 2013 में न सिर्फ सांप्रदायिक हिंसा ज्यादा हुई बल्कि वारदात की संख्या भी ज्यादा थी (2014 के 133 के मुकाबले 155). घायलों की संख्या भी 2013 में ज्यादा (2014 के 374 के मुकाबले 419) थी.

दरअसल 2014 में घायलों की संख्या 2013 से भी ज्यादा थी क्योंकि तब मुजफ्फरनगर में हुए दंगे के कारण घायलों की तादाद में 360 का इजाफा हो गया.

दंगों के मामले में यूपी 2015 के जनवरी में भी अव्वल साबित हुआ. 2015 की जनवरी में यूपी में सांप्रदायिक हिंसा की 12 घटनाएं हुईं. इसमें एक व्यक्ति की जान गई और 64 लोग घायल हुए.

जैसा कि क्विन्ट के इस लेख का तर्क है, पश्चिमी यूपी में जो कुछ दिखाई दे रहा है, बात उतने भर तक सीमित नहीं. इलाके पर दंगों की थकान भले हावी है लेकिन ‘नफरत का कथाएं’ इस इलाके का मिजाज हमेशा उबाल पर रखती हैं.

सहारनपुर, हाशिमपुरा और मुजफ्फरनगर(देखें मानचित्र) एकसाथ मिलकर यूपी की दंगा-पट्टी कहलाते हैं.

पश्चिमी उत्तरप्रदेश पर सांप्रदायिक समीकरण हमेशा हावी रहता है. हालांकि यह हिंदू बहुत इलाका है लेकिन खबरों के मुताबिक पश्चिमी यूपी में सूबे के अन्य हिस्सों की तुलना में मुस्लिम आबादी ज्यादा है.

इस वजह से इलाके में सामाजिक विविधता ज्यादा है. तीन किश्तों की अपनी एक खोजी रिपोर्टिंग में हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया है कि इलाके के जिस जिले में सामाजिक विविधता जितनी अधिक है वहां सांप्रदायिक हिंसा घटनाएं उतनी ही ज्यादा हुई हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी एक वजह यह हो सकती है कि आबादी में विविधता ज्यादा हो तो संघर्ष और सियासी तनाजे के मौके ज्यादा होते हैं. मिसाल के लिए जिन हिस्सों में हिंदू बड़ी तादाद में नहीं हैं वह जंग के जटिल मैदान में बदल(सियासी तौर पर) जाता है.

आर्थिक विकास या कह लें इसका अभाव भेदभाव की धारदार कथाओं को जिंदा रखता है. 'इलाके में जाट सबसे प्रभावशाली समूह है. आर्थिक और राजनीतिक हलके में इस समूह का दबदबा इसकी आबादी की तुलना में कहीं ज्यादा है. जमीन की मिल्कियत इस समूह के हाथ में होना और इलाके की हरित-क्रांति इस दबदबे की वजह है. पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के समय में मुस्लिम, जाटों के दबदबे की भीतर उनके विश्वस्त सहयोगी माने जाते थे लेकिन अब इन दोनों समुदाय के बीच रिश्ते ठीक नहीं हैं.'

मुस्लिम समुदाय का आर्थिक और सियासी तौर पर विकास हुआ है और इस बढ़ने के कारण जाटों के साथ उनके विश्वास के पुराने रिश्ते में खटास आई है. ऐसा खास तौर पर चौधरी चरण सिंह की मृत्यु(1987) के बाद के वक्त में हुआ. हाशिमपुरा की हिंसक घटना 1987 में हुई. विशेषज्ञों का कहना है कि चौधरी चरण की मृत्यु का असर जाट और मुस्लिम समुदाय के रिश्ते पर भी पड़ा.

'वही थे जिन्होंने इस रिश्ते की डोर को थाम रखा था. उनकी मौत के बाद यह रिश्ता कमजोर पड़ने लगा. मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह ने चौधरी चरणसिंह की विरासत की परस्पर विरोधी दावेदारी की और इसने भी रिश्ते में दरार पैदा करने में अपनी भूमिका निभाई.' सीएसडीएस के कई सर्वेक्षणों के सहयोगी और कानपुर क्राइस्ट चर्च कॉलेज के प्रोफेसर एके वर्मा ने बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में कहा.

क्विन्ट में प्रकाशित लेख में एक मुस्लिम नेता के हवाले से लिखा गया है कि  'इसमें कोई शक नहीं कि आर्थिक बदलाव से मुसलमानों को फायदा हुआ है. यह भी साफ है कि मुसलमानों का सियासी रुतबा बढ़ रहा है. जाट-बहुल जान पड़ते इलाकों में मुस्लिम विधायक और प्रधान के रूप में निर्वाचित हो रहे हैं.'

सच्चर कमेटी ने मुस्लिमों की सामाजिक स्थिति का आकलन किया था

Justice-Rajinder-Sachar

विशेषज्ञों ने बदलती आर्थिक हैसियत को मुसलमानों के विकास की वजह बताया है. सच्चर कमेटी ने 2006 में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति का आकलन किया था.

इस समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 'खेती-बाड़ी में मुसलमान कामगारों की हिस्सेदारी अन्य समूहों की तुलना में कम है लेकिन विनिर्माण और व्यापार(खासकर पुरुषों के लिहाज से) में मुस्लिमों की भागीदारी अन्य सामाजिक-धार्मिक समुदायों की तुलना में ज्यादा है. इसके अतिरिक्त निर्माण-कार्यों में भी उनकी भागीदारी ज्यादा है.'

यहां यह बात ध्यान रखने की है कि 2017 में बीजेपी चुनाव-प्रचार में अगड़ी जाति, गैर-यादव ओबीसी तथा गैर-जाटव दलित समूह के भरोसे थी. इन सभी समुदायों को आपस में मिलाकर देखें तो इनकी आबादी तकरीबन 60 प्रतिशत की बैठती है.

इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि तीन ताकतवर सामाजिक समूहों- मुस्लिम, यादव और जाटव ने बीजेपी के खिलाफ वोट डाला. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार शक्ति-संतुलन में बदलाव ( मुस्लिम, यादव तथा दलितों में जाटव ने यूपी पर 15 साल से ज्यादा वक्त तक राज किया है) तथा इन समूहों का सत्ता से बाहर होना जमीन पर अपना असर दिखाएगा.

गैर-बीजेपी पार्टियां भगवा पार्टी पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगा रही हैं जबकि बीजेपी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं. बात चाहे जो हो, यूपी के इस अशांत इलाके में धार्मिक जमीन पर गोलबंदी एक सच्चाई है.

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