विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

ये है मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले की पूरी कुंडली

2013 में उजागर हुए व्यापमं घोटाले को शिक्षा जगत का सबसे बड़ा घोटाला माना जाता है

Dinesh Gupta Updated On: Feb 14, 2017 06:10 PM IST

0
ये है मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले की पूरी कुंडली

यदि एक गुमनाम खत पर इंदौर पुलिस ने गौर नहीं किया होता तो मध्य प्रदेश व्यवसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) में फर्जी तरीके से डॉक्टर बनाने का खेल न जाने कितने साल और चलता. पुलिस ने गुमनाम शिकायत पर जांच शुरू की थी.

साल 2013 में मंडल द्वारा आयोजित की गई प्री-मेडिकल टेस्ट परीक्षा के एक दिन पहले पुलिस सक्रिय हुई. इंदौर के पुलिस महानिरीक्षक विपिन माहेश्वरी ने इसकी कमान संभाली. पत्र में दी गई जानकारी के आधार पर होटलों की तलाशी शुरू हुई.

क्राइम ब्रांच इंदौर की टीम को देखकर एक युवक ने अपना बैग खिड़की से बाहर फेंक दिया. पुलिस ने बैग को जब्त कर उसे चेक किया तो उसमें पीएमटी की परीक्षा का एक प्रवेश पत्र मिला. वो प्रवेश पत्र पकड़े गए युवक का नहीं था. पूछताछ में युवक ने वे सभी बातें बताईं जिनका जिक्र गुमनाम पत्र में था.

इंदौर पुलिस ने 7 जुलाई 2013 को राजेंद्र नगर थाने में एफआईआर दर्ज कर अपनी जांच तेज कर दी. जांच में पुलिस को पता चला कि कुल चार गिरोह पूरे प्रदेश में सक्रिय हैं.

vyapam

व्यापमं के जरिए बड़े पैमाने पर राज्य के इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में फर्जी एडमिशन कराए गए

व्यापमं है क्या?  

व्यापमं का घोटाला देश के शिक्षा जगत के सबसे बड़े घोटाले के तौर पर सामने आया है. मध्य प्रदेश व्यवसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) राज्य का एक सरकारी ऑटोनॉमस संस्था है. इसका गठन सत्तर के दशक में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए परीक्षाएं आयोजित करने के लिए किया गया था.

वर्ष 2013 से पहले तक इस संस्था की विश्वसनीयता पर कोई सवाल खड़ा नहीं हुआ.

कैसे शुरु हुआ ये घोटाला ?

पुलिस की तफ्तीश में यह सामने आया कि मनी और पॉलीटिकल पावर वाले लोगों के बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए संस्था में गडबड़ियां शुरू हो गईं. एक संगठित गिरोह इस कार्य में सक्रिय हो गया.

गिरोह का संचालन जगदीश सागर और संजीव गुप्ता कर रहे थे. यह गिरोह परीक्षा में स्कोरर को बैठाने का काम करता था. स्कोरर उसे कहा जाता है जो आवेदक छात्र के बदले में जाकर परीक्षा देता है. ज्यादतर स्कोरर अलग-अलग राज्यों के मेडिकल कॉलेज के छात्र ही थे.

मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने के इच्छुक छात्र के स्थान पर किसी अन्य छात्र को बैठाकर परीक्षा पास कराई जाने लगी. आवेदक छात्र की जगह पर दूसरे छात्र के परीक्षा देने वाले को स्कोरर कहा जाता है.

एक दूसरा तरीका सामूहिक नकल का भी था. इसमें स्कोरर के आसपास ही छात्रों के रोल नबंर रखे जाते थे. स्कोरर परीक्षा हॉल में छात्रों को सही उत्तर का इशारा कर देता था.

व्यापमं में मेडिकल कॉलेज में प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए दूसरा तरीका उत्तर पुस्तिका जिसे ओएमआर शीट कहा जाता है, में नबंर बढ़ा कर किया गया. नबंर बढ़ाने के लिए आरटीआई का उपयोग किया गया. छात्र आरटीआई में अपनी कॉपी मांगता. अधिकारी उसके नबंर बढ़ा कर मेरिट लिस्ट संशोधित कर देते.

Shivraj_vyapam

व्यापमं घोटाले ने बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि को काफी धक्का पहुंचाया

यह फेरबदल परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद किया जाता था. परीक्षा हॉल में स्कोरर पकड़ में न आ सके, इसके लिए प्रवेश पत्र में फोटो ऐसा लगाया जाता था कि परीक्षा कक्ष में मौजूद परीक्षक चेहरा मिला ही नहीं पाते थे. स्कोरर के जरिए जिन छात्रों ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था, सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन 634 छात्रों के बारे में ही है.

सामूहिक नकल करने वाले छात्रों की पहचान व्यापमं के तत्कालीन अध्यक्ष आईएएस अधिकारी एपी श्रीवास्तव ने की थी. इन छात्रों को बोगी का नाम दिया और स्कोरर को इंजन कहा गया. बाद में सरकार ने एपी श्रीवास्तव को व्यापमं के अध्यक्ष पद से हटा दिया.

व्यापमं घोटाले का सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा

वर्ष 2013 में जिस वक्त घोटाला उजागर हुआ, उन दिनों मध्य प्रदेश में विधानसभा के आम चुनाव चल रहे थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आनन-फानन में मामले की जांच स्पेशल टास्क फोर्स को सौंप दी.

विधानसभा का चुनाव लड़ रहे राज्य के एक मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की घोटाले में भूमिका प्रारंभिक जांच में ही सामने आ गई थी. नतीजा ये हुआ कि शर्मा सिरोंज से विधानसभा का चुनाव हार गए. एसटीएफ ने उनकी गिरफ्तारी नई सरकार के गठन के बाद की.

लक्ष्मीकांत शर्मा लगभग एक साल जेल में बंद रहे.

क्या केवल फर्जी डॉक्टर ही बनाए गए?

एसटीएफ चीफ सुधीर कुमार शाही की जांच में यह तथ्य भी उजागर हुआ कि घोटाला केवल डॉक्टर बनाने के लिए ही नहीं किया गया बल्कि सरकारी नौकरियां देने के लिए भी किया गया.

बीजेपी सरकार ने वर्ष 2006 में व्यापमं का दायर मेडिकल, इंजीनियरिंग से बढ़ाकर सरकारी नौकरी की परीक्षाओं तक कर दिया था. एसटीएफ की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुश्किलें भी बढ़ती गईं.

वे मामले की जांच सीबीआई को देने से बचते रहे. कई प्रभावशाली नेताओं के नाम उम्मीदवारों के चयन की सिफारिश करने वालों में था. पूर्व संघ प्रमुख के जी सुदर्शन और सुरेश सोनी का नाम भी सिफारिश करने वालों के तौर पर सामने आया. संघ के प्रभावशाली लोगों का नाम सामने आने के कारण ही बीजेपी नेतृत्व ने इस पूरे मामले में चुप्पी साध ली.

जिन पर आरोप लगे उनका क्या हुआ?   

सरकारी दावे के अनुसार व्यापमं घोटाले से जुड़े 34 लोगों की मौत हुई है. जबकि कांग्रेस का आरोप है कि 40 से अधिक आरोपियों और गवाहों की मौत हुई. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब मामले की जांच सीबीआई कर रही है.

Vyapam Congress Viroh

बीजेपी को घेरने के लिए कांग्रेस ने राज्य में व्यापमं घोटाले को बड़ा मुद्दा बनाया (फोटो: रॉयटर्स)

सीबीआई लगभग दर्जन भर मौतों की जांच ही कर रही है. सीबीआई की जांच में वेटनरी कॉलेज इंदौर के छात्र विकास सिंह (दलाल), वेटनरी कॉलेज जबलपुर के छात्र ब्रिजेश राजपूत (दलाल), रामेन्द्र सिंह भदौरिया (दलाल), दीपक जैन (दलाल), नम्रता डामोर (मेडिकल छात्र), विजय पटेल (दलाल), अक्षय सिंह (पत्रकार, आज तक), दीपक वर्मा (दलाल), नरेंद्र पाल सिंह (दलाल)

प्रमोद शर्मा (दलाल), शैलेश यादव पुत्र पूर्व राज्यपाल रामनरेश यादव (रैकेटियर) पर सीबीआई द्वारा कुल 89 मामले प्राथमिकी जांच एवं प्रारंभिक जांच के लिए दर्ज की गई हैं.

एफआईआर मेडिकल परीक्षा के अलावा टीचर, कॉन्स्टेबल, फूड इंस्पेक्टर, फॉरेस्ट गार्ड आदि परीक्षाओं में गड़बड़ी से संबधित हैं. एक ही घोटाले में इतनी बड़ी संख्या में एफआईआर सीबीआई ने इससे पहले बिहार के चारा घोटाले में ही दर्ज की थीं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi