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दक्षिण भारत के वेंकैया नायडू आखिर क्यों पड़े सब पर भारी?

दक्षिण भारत में अमित शाह को वेंकैया नायडू के नाम के सहारे काफी हद तक सफलता मिल सकती है

Amitesh Amitesh | Published On: Jul 18, 2017 08:38 AM IST | Updated On: Jul 18, 2017 08:38 AM IST

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दक्षिण भारत के वेंकैया नायडू आखिर क्यों पड़े सब पर भारी?

राष्ट्रपति पद के लिए उत्तर भारतीय रामनाथ कोविंद को आगे कर बीजेपी आलाकमान ने अब उपराष्ट्रपति पद के लिए दक्षिण भारत के वेंकैया नायडू का नाम आगे बढ़ा दिया है. बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने वेंकैया नायडू के नाम का ऐलान कर दिया .

संख्या बल के हिसाब से अब साफ है कि एनडीए के उम्मीदवार वेंकैया नायडू का अगला उपराष्ट्रपति बनना महज औपचारिकता मात्र रह गया है.

वेंकैया नायडू के सहारे बीजेपी ने दक्षिण भारत में एक संदेश देने की कोशिश भी की है. दक्षिण में कर्नाटक को छोड़कर बाकी राज्यों में बीजेपी का जनाधार कमजोर रहा है. आंध्रप्रदेश से आनेवाले वेंकैया नायडू के नाम को उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे कर बीजेपी आंध्र के अलावा तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में भी पार्टी की ताकत को बढ़ा सकती है.

अबतक बीजेपी को उत्तर भारत की पार्टी या फिर हिंदी हार्ट लैंड की पार्टी माना जाता रहा है. लेकिन, केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद मोदी-शाह की जोड़ी लगातार दक्षिण भारत में अपना पैर पसारने की कोशिश में है. उत्तर भारतीय पार्टी के तमगे से बीजेपी को बाहर निकालने की कोशिश में लगे अमित शाह को वेंकैया नायडू के नाम के सहारे काफी हद तक सफलता मिल सकती है.

वेंकैया नायडू एक अनुभवी नेता

Venkaiah-Naidu

वेंकैया नायडू 1998 से 2016 तक लगातार तीन बार कर्नाटक से ही राज्यसभा सांसद रहे हैं जबकि चौथी बार 2016 में राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुनकर आए थे. दक्षिण भारत के होते हुए भी वेंकैया की हिंदी भाषा पर पकड़, उनकी हिंदी बोलने की शैली का कोई सानी नहीं है.

यहां तक कि उनके जुमले भी लोगों को लगातार हंसाते रहे हैं. वेंकैया नायडू अब अलग-अलग मंच से हिंदी की तरफदारी भी करते रहते हैं. लेकिन, वेंकैया नायडू का खुद का उभार एक एंटी हिंदी आंदोलन से हुआ था. उस वक्त हिंदी के खिलाफ चल रहे आंदोलन के नायक बनकर उभरे वेंकैया नायडू बाद में आरएसएस से जुड़ गए.

छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले वेंकैया नायडू बाद में एबीवीपी से जुड़ गए. लेकिन, छात्र राजनीति में आगे बढ़कर काम करने वाले वेंकैया नायडू जे पी आंदोलन के दौरान भी काफी सक्रिय रहे. आन्ध्र प्रदेश के नालौर जिले की उदयगिरी सीट से वेंकैया नायडू 1978 में पहली बार एमएलए चुने गए, फिर 1983 में भी दोबारा एमएलए बनने का मौका उन्हें मिला.

पार्टी के भीतर अलग-अलग पदों पर काम करते हुए पार्टी संगठन का उनका अनुभव इतना बड़ा था कि वो 1988 में आन्ध्र प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष बन गए.

लेकिन, वेंकैया नायडू का असली उभार 1993 से हुआ जब वो बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में दिल्ली की सियासत में सक्रिय हुए. वेंकैया नायडू 1993 से 2000 तक लगातार बीजेपी के महासचिव रहे. फिर वो पहले वाजपेयी सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर शामिल किए गए और फिर 2002 में बतौर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उन्होंने काम संभाला.

संघ-बीजेपी के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले नेता

New Delhi: Union Minister and senior BJP leader M Venkaiah Naidu meets LJP President Ramvilas Paswan and his son MP Chirag Paswan in New Delhi on Sunday. BJP leaders are meeting leaders of various political parties to reach a consensus on presidential nominee. PTI Photo (PTI6_18_2017_000155B)

वेंकैया नायडू का अध्यक्ष पद का कार्यकाल अच्छा माना जाता है. केंद्र की राजनीति में सक्रिय वेंकैया नायडू की खासियत है कि वो हमेशा संघ और पार्टी के एजेंडे को लेकर ही आगे बढ़ते रहते हैं. अटल सरकार के वक्त जब बीजेपी के भीतर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के तौर पर जानी जाती थी, उस वक्त भी वेंकैया नायडू दोनों के नजदीकी बने रहे.

लेकिन, एक बार बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष उनके बयान ने पार्टी के भीतर के अंदरूनी समीकरण को हिला कर रख दिया था. वेंकैया नायडू ने जून 2003 में अपने बयान में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को विकास पुरूष और लालकृष्ण आडवाणी को लौह पुरूष बताया था.

उनके बयान के बाद उस वक्त सियासी बवाल हो गया था जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने आवास 7आरसीआर में एक कार्यक्रम के दौरान ये कहकर सबको चौंका दिया था कि ना टायर्ड, ना रिटायर्ड, अगले चुनाव में आडवाणी जी के नेतृत्व में विजय की ओर प्रस्थान. अटल जी के इस बयान को वेंकैया नायडू के उस बयान के खिलाफ नाराजगी के तौर पर देखा गया था, जिसमें वेंकैया ने उन्हें विकास पुरूष और आडवाणी को लौह पुरूष बता दिया था.

हालांकि, बाद में साफ कर दिया गया कि अटल बिहारी वाजपेयी के ही नेतृत्व में 2004 का चुनाव लड़ा जाएगा.

हमेशा पार्टी आलाकमान के नजदीक रहे वेंकैया

venkaiah naidu-modi

वेंकैया नायडू बाद में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर भी काम किया. लेकिन, पार्टी के भीतर चल रहे जेनेरशन शिफ्ट से भी वो अपने-आप को ठीक तरीके से सामंजस्य स्थापित करने में सफल रहे. एक समय आडवाणी के बेहद करीबी माने जाने वाले वेंकैया नायडू बीजेपी में मोदी के उभार के बाद उनके करीबी लोगों में से शुमार किए जाने लगे.

संघ परिवार के एजेंडे और बीजेपी आलाकमान की रणनीति पर चलने वाले वेंकैया नायडू ने कभी भी व्यक्ति के बजाए पार्टी और उस वक्त के पार्टी नेतृत्व को लेकर अपनी आस्था जताई जिसका प्रतिफल भी उन्हें  मिलता रहा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उभार के वक्त से ही वेंकैया नायडू ने उनके नेतृत्व और उनकी कार्यशैली को जिस अंदाज में जोर-शोर से प्रचारित किया और हर मंच पर जिस आक्रामकता से सरकार और पार्टी का बचाव किया, वो उनके काम करने के अंदाज को दिखाता है.

वेंकैया ने बीजेपी की कार्यसमिति की बैठक में  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें गिफ्ट ऑफ गॉड तक कह दिया था. ये उनकी कार्यशैली की विशेषता थी जिसके दम पर वेंकैया नायडू प्रधानमंत्री मोदी के बेहद करीब हो गए थे.

अब उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार बनने से पहले सरकार में सूचना-प्रसारण मंत्रालय के अलावा शहरी विकास मंत्रालय के पद पर काबिज थे. इसके पहले बतौर संसदीय कार्यमंत्री भी वेंकैया नायडू की अपनी अलग छाप रही है.

हालाकि, राज्यसभा के भीतर एनडीए के पास अभी बहुमत नहीं है. लेकिन, वेंकैया नायडू का राज्यसभा का अनुभव बतौर राज्यसभा चेयरमैन उनके काम में मददगार साबित होगा.

यह भी पढ़ें: उपराष्ट्रपति चुनाव 2017: छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं वेंकैया नायडू

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