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कभी अटल-आडवाणी के पोस्टर चिपकाया करते थे वेंकैया नायडू

वेंकैया नायडू ने राजनीति में लंबा सफर तय किया है. उनके काम करने का तरीका ऐसा है कि ढूंढने पर भी शायद ही कोई उनका राजनीतिक दुश्मन मिले

Vijai Trivedi Updated On: Aug 05, 2017 08:00 PM IST

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कभी अटल-आडवाणी के पोस्टर चिपकाया करते थे वेंकैया नायडू

सुपर स्टार शाहरुख खान की फिल्म का एक सुपर हिट डायलॉग है – किसी चीज को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने में लग जाती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह दोनों ही किसी भी काम को पूरी शिद्दत के साथ करते दिखते हैं. उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह सबसे पहला वोट डाला, उससे लगा कि वे किसी भी काम को नॉन सीरियसली तरीके से नहीं लेते हैं.

उपराष्ट्रपति चुनाव में वेंकैया नायडू की जिस तरह की मजबूत जीत हुई वो शिद्दत की वजह से ज्यादा लगती है. प्रधानमंत्री और अमित शाह की रणनीति और प्रबंधन की वजह से ही इस चुनाव में ज्यादातर वोट दोपहर से पहले ही डाल दिए गए.

Bhubaneswar: Prime Minister Narendra Modi with part president Amit Shah at BJP's National executive meet in Bhubaneswar on Saturday. PTI Photo (PTI4_15_2017_000149B)

उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे मुप्पावाराप्पू वेंकैया नायडू की जीत भी ऐसा ही एक सच है जिसको लेकर यूं तो कोई शक नहीं रहा होगा. लेकिन उनकी उम्मीदवारी के दिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने जिस तरह ऐलान किया कि वेकैंया नायडू जी 10 अगस्त को भारत के उपराष्ट्रपति बन जाएंगे,क्योंकि वे यूपीए उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव जीतने की स्थिति में हैं और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया- उप राष्ट्रपति पद के लिए एक उपयुक्त उम्मीदवार. इससे जीत पर भरोसे में ज्यादा मजबूती आ गई. वेंकैया पांच दिन पहले ही शानदार जीत के साथ उपराष्ट्रपति हो गए.

एनडीए सरकार में यूं तो अपने उम्मीदवार को जिताना कोई मुश्किल काम नहीं था,क्योंकि उनके पास बहुमत के लिए जरूरी से ज्यादा वोट थे,लेकिन प्रधानमंत्री और अमित शाह की जोड़ी जिस तरह हर चुनाव को पूरी शिद्दत से लड़ती है,उसी का नतीजा रहा कि वेकैंया एनडीए की ताकत से ज्यादा वोट और बड़े अंतर से जीते. क्रॉस वोटिंग भी हुई.

विपक्ष अपने उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को जिता पाने की हालत में तो पहले ही नहीं था, खुद के घर को भी नहीं बचा पाया. वोट डालने से पहले वेंकैया ने कहा कि मैं किसी पार्टी का नहीं हूं, सब पार्टियों से मेरे अच्छे रिश्ते हैं.

वेंकैया नायडू के प्रधानमंत्री मोदी से करीबी रिश्ते हैं. मोदी की तारीफ करते हुए वेंकैया ने उन्हें 'भारत के लिए ईश्वर का वरदान',और 'गरीबों का मसीहा' भी कहा. प्रधानमंत्री मोदी को ‘मोडी’ बोलने वाले वेंकैया नायडू ने कई बार कहा कि मोडी मतलब- मेकर ऑफ डेवलप्ड इंडिया.

वेंकैया पर नरेंद्र मोदी का भरोसा होने की एक बड़ी वजह मुझे याद आती है,अप्रैल 2002 में गोवा में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की वो बैठक,जिसमें तब के प्रधानमंत्री वाजपेयी के सामने वेंकैया ने मोदी का पक्ष बड़ी मजबूती से रखा था.

M. Venkaiah Naidu chosen as NDA's Vice-Presidential candidate

गुजरात दंगों के बाद मोदी के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश पर वाजपेयी ने कहा था कि देखते हैं, कल इस पर विचार करेंगे. तब वेंकैया ने कहा था कि क्या नरेंद्र भाई का इस्तीफा 24 घंटे तक यहीं पड़ा रहेगा.

वैसे कुछ लोग ही ये बात जानते होंगें कि 2014 के आम चुनाव से पहले जब नरेंद्र मोदी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध हो रहा था ,तो विरोध करने वाले उन तीन बड़े नेताओं में वेंकैया का नाम भी शामिल था. लेकिन इसी दौरान आरएसएस के मूड को समझते हुए वेंकैया नायडू ने नरेंद्र मोदी के प्रति बढ़ते समर्थन का एहसास कर लिया था और वे बहुत जल्द मोदी के साथ खड़े दिखाई दिए.

वेंकैया ने बीजेपी के दो प्रधानमंत्रियों और चार राष्ट्रीय अध्यक्षों के साथ काम किया है और वे सभी की उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरे हैं. नायडू के नेतृत्व में बीजेपी ने 2004 का आम चुनाव भी लड़ा था.

साल 2002 में जेना कृष्णमूर्ति के बाद जब बीजेपी के अध्यक्ष बनाने की बात आई तो उस वक्त देश में वाजपेयी सरकार थी और कोई बड़ा नेता सरकार छोड़ कर संगठन में नहीं जाना चाहता था. उस वक्त वेंकैया भी केंद्र में मंत्री थे,लेकिन उन्होंने तुरंत मंत्री पद छोड़ कर संगठन की जिम्मेदारी संभाल ली.

फिर उस आम चुनाव में पार्टी की हार के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था. वेकैंया के लिए माना जाता है कि वे किसी भी जिम्मेदारी को लेने से कभी इंकार नहीं करते और फिर उसमें जी जान से लग जाते हैं. इसलिए ज्यादातर लोगों को ये समझने में भूल हो जाती है कि नई जिम्मेदारी उनके लिए प्रमोशन है या फिर पनिशमेंट.

Venkaiah-Naidu

मुस्कुराना ना केवल उनकी आदत शुमार है बल्कि हंसते हुए काम करना और जीना उन्हें लोकप्रिय बनाता है. मुश्किल होगी यदि राजनीति में आप उनके दुश्मन ढूंढने निकलें. विपक्षी दलों के नेताओं के साथ उनका दोस्ताना व्यवहार राज्यसभा में सभापति के तौर पर बहुत काम आएगा, खासतौर पर इसलिए भी क्योंकि फिलहाल राज्यसभा में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत नहीं हैं.

साथ ही वेंकैया बीजेपी के दक्षिण भारत के जाने पहचाने चेहरों में से एक हैं जो अच्छी हिंदी बोलते हैं. और उत्तर भारत में भी पार्टी के जाने पहचाने चेहरे हैं, लेकिन साठ के दशक की शुरुआत में वेंकैया दक्षिण भारत में हिंदी के खिलाफ रहे थे.

उनके उपराष्ट्रपति बनने से बीजेपी को क्षेत्रीय संतुलन बनाने में मदद मिलेगी. अब राष्ट्रपति यूपी यानी उत्तरप्रदेश से और उपराष्ट्रपति दक्षिण से हो जाएगा.इसके अलावा उनका लंबा राजनीतिक और संसदीय अनुभव भी बहुत काम आएगा.

नायडू चार बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं. 1998 में वे पहली बार कर्नाटक से राज्यसभा आए थे .अब 19 साल बाद वे उसी सदन को सभापति के तौर पर चलाएंगे. उनके व्यवहार से मुझे बीजेपी के पहले उपराष्ट्रपति रहे भैरोसिंह शेखावत की याद आती है जो सदन में हंगामा होने पर दोनों पक्षों को अपने केबिन में बुलाकर मिनटों में मामले को निपटा देते थे. सेंट्रल हॉल की कैंटीन के गर्मागर्म गुलाबजामुन के साथ.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नायडू सक्रिय राजनीति छोड़कर फिलहाल उपराष्ट्रपति नहीं बनना चाहते थे. कुछ समय पहले नायडू ने कहा था कि मैं चाहता हूं कि 2019 में मोदी की सत्ता में वापसी हो और उसके बाद ही मैं सक्रिय राजनीति से इस्तीफा देना चाहता था. लेकिन नियति की मेरे लिए कुछ और योजना है.

वैसे नायडू कभी भी पार्टी के मॉस लीडर के तौर पर नहीं रहे  और तीन बार चुनाव मैदान में उतरने के बावजूद वे लोकसभा नहीं पहुंच पाए. लेकिन संगठन के कामकाज में महारत और रफ्तार हरेक को उनका मुरीद बना देती है.

सपने देखने वाले एक किसान परिवार के गरीब नौजवान वेंकैया का उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचने का सफर लंबा रहा है. एक जमाने में वे वाजपेयी और आडवाणी के पोस्टर चिपकाया करते थे. वेंकैया अक्सर इस बात को याद करते हैं कि पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेल्लोर आने की सूचना देने के लिए वो कैसे घोड़ा-गाड़ी पर निकल पड़े थे.

जब वेंकैया केवल डेढ़ साल के थे तब मां का निधन हो गया था. उपराष्ट्रपति के लिए नाम आने के बाद नायडू ने कहा कि आखिरकार पार्टी ही मेरी मां बन गई. 14 बरस के लड़के की कबड्डी के लिए मोहब्बत उसे साठ के दशक में आरएसएस की शाखा की तरफ खींच लाई.

वेंकैया ने अपना राजनीतिक सफर अपने गृह जिले नेल्लूर के कॉलेज यूनियन चुनावों से किया था. 1971 में वे नेल्लूर के वीआर कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए. और फिर जय प्रकाश के जनता आंदोलन ने उन्हें खींचा, आंध्र राज्य बनाने का समर्थन करते हुए 1972 में नायडू जय आंध्र आंदोलन में शामिल हुए. तब वेंकैया अंडरग्राउंड रह कर काम करते और अक्सर एक स्कूटर पर पीछे बैठ कर आपातकाल विरोधी पर्चे बांटा करते थे.

Rajnath and Naidu meeting with CPI(M) general secretary Sitaram Yechury

बीजेपी के सामाजिक चेहरे से उलट वेंकैया मांसाहार के शौकीन हैं लेकिन वजन घटाने के लिए हुई बेरिएट्रिक सर्जरी के बाद वे बहुत कम खाना खाते हैं, लेकिन अगर कभी आप उनके लंच पर मेहमान होंगे तो समझ आएगा कि वे दूसरों को ज्यादा खिलाने के किस कदर शौकीन हैं. वे चाय या कॉफी नहीं लेते,केवल छाछ लेते हैं. उन्हें आंध्र स्टाइल में बनाई गई मछली चपाला पल्लुसु, सूप, गरलु ,और मिठाई में बुथारेकु पसंद हैं.

वैसे जो लोग ये समझते हैं कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद वेंकैया नायडू का करियर खत्म हो जाएगा ,उन्हें इस बात की संभावनाओं का अंदाजा नहीं है कि अगर 2019 में मोदी सरकार की वापसी होती है तो प्रधानमंत्री को 2022 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए शायद नया चेहरा तलाशना ना पड़े.

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