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उत्तराखंड निभाएगा निजाम बदलने की परंपरा?

हर पांच साल बाद निजाम बदलने के लिए बेहद समझदार कहलाने वाला उत्तराखंड का मतदाता इस बार क्या फैसला करता है

Anant Mittal Updated On: Feb 14, 2017 07:44 AM IST

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उत्तराखंड निभाएगा निजाम बदलने की परंपरा?

सत्तर विधानसभा सीटों वाले सीमाई पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में चुनाव प्रचार थम गया. इस बार 70 सीटों की जगह 69 सीटों पर 628 उम्मीदवारों के लिए 15 फरवरी को मतदान होगा.

वजह है कि कर्णप्रयाग में एक उम्मीदवार की मृत्यु के कारण वहां चुनाव स्थगित हो गया है. राज्य में सबसे कम 67,496 मतदाता सुदूर पुरोला विधानसभा क्षेत्र में और सबसे अधिक 1,84,569 मतदाता देहरादून जिले की धर्मपुर सीट में हैं.

बहरहाल सत्ता के सभी दावेदार अब अपनी पैदल सेना यानी कार्यकर्ताओं की टीमों को घर-घर मतदान की चिट और अपने वादों और कामों का ब्यौरा पहुंचाने में झोंक रहे हैं.

दलबदलू बनाम दलबदलू की लड़ाई

सत्ता हथियाने के लिए दोनों प्रमुख दावेदार दलों, कांग्रेस और बीजेपी में से कोई भी आधुनिक राजनीति का फार्मूला अपनाने से बाज नहीं आया. बीजेपी ने कांग्रेस के आधा दर्जन पूर्व मंत्रियों सहित कुल तेरह दलबदलुओं और उनकी संतानों को टिकट से नवाजा है.

वहीं कांग्रेस ने भी आधा दर्जन सीटों पर बीजेपी के बागियों को पंजा थमाया हुआ है. आजीवन कांग्रेसी रहे पूर्व मंत्री यशपाल आर्य कमल थामे हुए हैं तो उनके खिलाफ बीजेपी की उपाध्यक्ष रहीं सुनीता बाजवा को कांग्रेस ने टिकट देकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है.

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इसी तरह यमकेश्वर में पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी की बेटी ऋतु के मुकाबले कांग्रेस ने बीजेपी के ही पूर्व विधायक शैलेंद्र रावत को पंजा थमाया है.

बागी बनाम बागी की जंग में दोनों ही पार्टियां एक दूसरे पर सत्ते पे सत्ता चल रही हैं. रुड़की में कांग्रेस ने बीजेपी के पूर्व विधायक फूलचंद जैन को अपने बागी विधायक प्रदीप बत्रा के खिलाफ खड़ा किया है. प्रदीप बत्रा बीजेपी से उम्मीदवार हैं.

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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के सहसपुर और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के इलाके रानीखेत सहित दोनों दलों के कम से दर्जन भर उम्मीदवार अपने ही दलों के बागी निर्दलीय उम्मीदवारों का दंश भी झेल रहे हैं.

इससे उनकी चुनौती कई गुना हो गई है, क्योंकि राज्य में कुल 76 लाख मतदाता हैं.  प्रत्येक विधानसभा में औसतन 70-80 हजार वोट ही हार-जीत का फैसला करने वाले हैं.

बीजेपी ने आखिरी पलों में दल बदलने वाले कांग्रेस के मंत्री यशपाल आर्य के साथ ही उनके बेटे संजीव, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ, पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूड़ी की बेटी ऋतु, पूर्व मंत्री मातबरसिंह कंडारी के भतीजे विनोद और पार्टी प्रवक्ता मुन्ना सिंह चैहान और उनकी पत्नी मधु को अपना उम्मीदवार घोषित कर वंशवाद की तुरही बजाई है.

यही एक वजह मानी जा सकती है कि बीजेपी इस बार भाई-भतीजावाद की बात नहीं कर रही है.

प्रचार में प्रचंड प्रहार

प्रधानमंत्री ने पहाड़ के निवासियों से विकास का वादा किया तो भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का भरोसा दिलाया. सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने और एक रैंक-एक पेंशन लागू करने में ढिलाई के आरोप दोहरा कर उत्तराखंड की सरकार को कठघरे में खड़ा किया.

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पलटवार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को आपदा राहत का खलनायक करार दिया. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी नोटबंदी के मुद्दे पर पीएम पर हर रैली और रोड शो में निशाना साधा.

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हरीश रावत ने केदारनाथ आपदा की त्रासदी से राज्य को उबार कर चार धाम यात्रा फिर सुचारू करने का सेहरा अपने सिर बांधा तो सरकार गिराने के मुद्दे पर सहानुभूति बटोरने में कसर नहीं छोड़ी.

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रायटर इमेज (प्रतीकात्मक)

हालांकि पीएम मोदी ने भी चार धाम यात्रा के लिए हर मौसम में चालू रहने वाली सड़क और कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन परियोजनाओं का शिलान्यास करके संतुलन बैठाने की पूरी कोशिश की है. कांग्रेस ने भी देहरादून-हरिद्वार-ऋषिकेश मेट्रो परियोजना की संभावना रिपोर्ट बनवाना शुरु करके जनता को सपने दिखाने में कसर नहीं छोड़ी.

इसी चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ कि सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय पहाड़ की सीटों को पीछे छोड़ कर पलायनवादी होने का तमगा पा गए.

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धारचूला से विधायक रहे रावत अब हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा यानी मैदानी और तराई की विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. किशोर भी देहरादून के पास सहसपुर से चुनाव लड़ रहे हैं.

कांग्रेस ने 8 महिलाओं को टिकट देकर देवभूमि की 36 लाख से ज्यादा महिला मतदाताओं को ठेंगा दिखाया वहीं बीजेपी 70 सीटों के लिये केवल 6 महिलाएं ही चिन्हित कर सकी.

खास बात ये है कि दोनों ही पार्टियां महिलाओं के लिये 33 फीसदी सीटें रिजर्व कराने का वादा बरसों से करती आ रहे हैं. इसके बावजूद पीएम मोदी की रैलियों में बड़ी तादाद में महिलाएं शामिल हुईं.

मतदान में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ा

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उत्तराखंड की महिलाएं मतदान में भी पुरूषों को कहीं पीछे छोड़ती आ रही हैं. राज्य की मुख्य चुनाव अधिकारी राधा रतूड़ी भी ये तस्दीक करती हैं. उनके मुताबिक छह हजार फुट और उससे भी दुर्गम उंचाई पर बसे सैकड़ों गांवों में भी मर्दों के मुकाबले मतदान प्रतिशत औरतों का ही ज्यादा रहता है.

राज्य के कुल 10,854 मतदान केंद्रों में से करीब 2000 केंद्र दुर्गम और संवेदनशील अंचल में हैं जिनमें से 479 केंद्र बर्फीले इलाके में हैं. इनके लिए मतदान पार्टियों को मीलों पहाड़ी रास्ता पैदल तय करना पड़ा है.

बर्फीले इलाकों के कम से कम तीन दर्जन गांव तो ऐसे हैं जिनमें उम्मीदवार भी अपना प्रचार करने नहीं पहुंच पाए. अलबत्ता उनके सिपहसालार जरूर उनकी प्रचार सामग्री उन गांवों में पहुंचा आए हैं. लेकिन मतदान पार्टियां सभी गांवों तक पंहुच रही हैं ताकि किसी को भी मतदान केंद्र पहुंचने के लिए दो किमी से अधिक दूरी तय नहीं करनी पड़े.

मतदान पार्टियों को दुर्गम केंद्रों तक तो आईटीबीपी अर्धसैनिक बल की मदद से पहुंचाया जा रहा है. वहां मतदानकर्मियों को स्नोबूट पहन कर और खच्चरों पर खुद और ईवीएम उठाकर पहुंचना पड़ रहा है.

बागी बने सिरदर्द

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अपने गठन के सोलहवें साल में उत्तराखंड के मतदाताओं के सामने तीसरे विधानसभा चुनाव में उहापोह की स्थिति है. कुमाउं मंडल की 29 सीटों में ज्यादातर पर जहां कांग्रेस शुरु से ही आगे दिख रही थीं वहां प्रधानमंत्री मोदी ने ताबड़तोड़ सभाएं कर संतुलन बनाने की कोशिश की है.

गढ़वाल की डेढ़ दर्जन सीटों में अधिकतर पर बीजेपी ने कांग्रेस के दलबदलुओं को कमल थमा कर अपनी जीत पक्की करने का दांव तो तगड़ा मारा था लेकिन अब उसके बागी सिरदर्द बने हुए हैं.

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बाकी सीट तराई और मैदानी क्षेत्र में हैं जिनमें से दो पर रावत चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन इन सीटों पर भी बीजेपी ने प्रचार में पैसे और नेताओं को झोंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

इन्हीं सीटों पर मुकाबले में कुछ निर्दलीय, बीएसपी और उक्रांद के नेता भी हैं. बहरहाल अब हर पांच साल बाद निजाम बदलने के लिए बेहद समझदार कहलाने वाला उत्तराखंड का मतदाता इस बार क्या फैसला करता है, ये मतगणना के बाद ही पता चलेगा.

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