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यूपी में योगी राज: नरेंद्र मोदी की राह पर योगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों के लिए भी एक उदाहरण कायम किया है

S Murlidharan | Published On: Mar 20, 2017 04:08 PM IST | Updated On: Mar 20, 2017 04:08 PM IST

यूपी में योगी राज: नरेंद्र मोदी की राह पर योगी

शिक्षक पहले मनोवैज्ञानिक होते हैं. कक्षा के सबसे बदमाश बच्चे को जब वो मॉनिटर की जिम्मेदारी सौंप देते हैं तो इसका असर व्यापक होता है. पूरी कक्षा पूर्व में तमाम बदमाशियों के लिए जाने वाले नए नेतृत्व के सामने सिर झुकाने लगता है.

इतिहास में ऐसे मिसाल अटे पड़े हैं. यहां तक कि रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने जब डेमोक्रेट पार्टी के अपने कट्टर विरोधी कैनेडी को अमेरिका में बाजार का पहरेदार कहे जाने वाली संस्था सिक्योरिटीज और एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) का प्रमुख बनाया था.

उन्होंने ऐतिहासिक बयान दिया था कि बदमिजाजों पर लगाम लगाने के लिए वैसे ही किसी शख्स की जरूरत होती है. हालांकि ये दीगर बात है कि ये सिर्फ सियासी जुमलेबाजी की बानगी थी क्योंकि कैनेडी कहीं से बदमिजाज नहीं कहे जा सकते थे.

फायरब्रांड, भड़काऊ भाषण देने में माहिर

योगी आदित्यनाथ जिन्हें उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई है वो भले ही फायरब्रांड, भड़काऊ भाषण देने में माहिर और उग्र हिंदूत्ववादी छवि के नेता माने जाते रहे हों. लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य जहां की जातिगत और धार्मिक समीकरण काफी उलझी हुई है. उस सूबे का कमान संभालने पर आदित्यनाथ को भी अपनी जुबान पर नियंत्रण रखना होगा.

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योगी आदित्यनाथ के लिए रोल मॉडल होंगे. क्योंकि सबका साथ, सबका विकास का उनका चुनावी नारा कहीं से भी महज चुनावी जुमला भर नहीं हो सकता. सच्चाई तो ये है कि इस नारे के पीछे गुजरात में उनकी सरकार के कामकाज का इतिहास जुड़ा हुआ है.

विवादास्पद धार्मिक मुद्दों से बनाई दूरी

ये वो इतिहास है जिसमें गुजरात में उनकी सरकार के दौरान हुई तरक्की, जिसमें हिंदू और मुस्लिम इलाकों में बिजली मुहैया कराने की बात शामिल है. ये बात कम हैरान करने वाली नहीं है कि उनका चुनावी नारा जाति और धर्म की दीवारों को लांघ कर हरेक मतदाताओं को आकर्षित करता है.

आदित्यनाथ की तरह ही मोदी के आलोचक भी उन्हें उग्र हिंदूवादी नेता की छवि में गढ़ने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन किसी मझे हुए नेता की तरह बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उन्होंने सभी विवादास्पद धार्मिक मुद्दों से अपनी दूरी बना ली.

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यहां तक कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने काफी सतर्कता के साथ धार्मिक मुद्दों को नजर अंदाज किया. यूपी चुनाव के दौरान उन्होंने धार्मिक मुद्दों पर बयानबाजी की. लेकिन इसके पीछे मकसद इस बात को सामने लाना था कि सूबे में समाजवादी पार्टी दूसरे धर्मों के साथ भेदभाव कर रही है.

मोदी और अमित शाह की जोड़ी पार्टी की मजबूती

योगी को इतनी समझ है कि उन्हें प्रधानमंत्री के स्टैंड को ही अपने शासन का आधार बनाना है. और अगर वो ऐसा नहीं करते हैं, तो मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी उन्हें ऐसा करने से रोक देगी. क्योंकि इस बात को बीजेपी के आलोचक भी जानते हैं कि मोदी और शाह की जोड़ी पार्टी को लगातार नई मजबूती दी है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना सिर्फ राजनीतिक वर्ग के लिए बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों के लिए भी एक उदाहरण कायम किया है. उन्होंने रामजन्म भूमि मुद्दे पर किसी तरह का सैद्धान्तिक स्टैंड लेकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा नहीं दी है.

राम मंदिर का निर्माण भारतीय संविधान के तहत होगा

उन्होंने हमेशा से कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारतीय संविधान के तहत ही किया जाएगा. हो सकता है कि आज न कल सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अपना फैसला सुनाएगी. और पार्टी ने भी इस मुद्दे पर उग्र नहीं होने की बात को समझ लिया है.

योगी की बात करे तो वो भी ऐसा कुछ नहीं करने वाले हैं ताकि हाल में संपन्न हुए चुनावों में बीजेपी के साथ जो मुस्लिम मतदाता जुड़े हैं उनके भरोसे को चोट पहुंचे. और तो और पार्टी की छवि को धक्का लगे. जाहिर है जिम्मेदारी किसी की भी जुबान पर संयम लाती है.

hindu-muslim voters

किसी तानाशाह के लिए सत्ता और उससे पैदा होने वाली ताकत नशा हो सकती है. लेकिन लोकतंत्र में देश या किसी राज्य के जनतांत्रिक तरीके से चुने गए मुखिया को सत्ता विनम्र बनाती है. क्योंकि जनतंत्र में कोई नेता गैर जिम्मेदार नहीं हो सकता.

इसकी वजह ये है कि पहले तो उसे विरोधी दलों का सामना करना पड़ेगा. फिर भी वो अगर नहीं मानता है तो उसी की पार्टी के अंदर सत्ता के केंद्र उसे रोकने की कोशिश करेंगे. बावजूद इसके अगर वो नहीं मानता है तो अगले चुनाव में जनता ऐसे नेतृत्व को नकार देती है.

इंडिया शाइनिंग

2004 के लोक सभा चुनाव के बाद कम से कम इस बात को बीजेपी और उसके नेता तो कभी नहीं भूले होंगे. जब इंडिया शाइनिंग का दिया हुआ नारा काफी आकर्षक प्रतीत हुआ था. लेकिन इस नारे ने देश के गरीबों की नाराजगी इस हद तक बढ़ा दी कि चुनाव में बीजेपी औंधे मुंह गिर गई.

ऐसे सेक्युलर स्टेट जहां धर्म, जाति और आय में तमाम विषमताएं हैं वहां सभी को एक साथ लेकर आगे बढ़ना प्रजातांत्रिक मजबूरी है. इंदिरा गांधी गरीबों की बात कर करीब दो दशक तक सत्ता में बनी रहीं.

गरीबों को खैरात बांटने में यकीन नहीं

मोदी भी इंदिरा के ही नक्शे कदम पर हैं. लेकिन मोदी के तरीकों में खासा अंतर है. मोदी गरीबों को खैरात बांटने में यकीन नहीं करते. बल्कि मोदी गरीबों को आर्थिक रूप और अन्य तरीके से सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं. और उम्मीद की जानी चाहिए कि हमेशा सीखने को तत्पर रहने वाले योगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नक्शे कदम पर आगे बढ़ेंगे. वैसे भी मुख्यमंत्री दफ्तर की अंतहीन जिम्मेदारियां उन्हें विनम्र बनाने के लिए काफी होंगी.

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