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अखिलेश की सियासी गुलाटी ने राहुल के प्लान को डिरेल कर दिया है

कांग्रेसी नेताओं को ये अहसास भी होगा कि मुलायम-अखिलेश की सियासी समझ राहुल के दरबारियों से कहीं ज्यादा है.

Sanjay Singh Updated On: Jan 21, 2017 05:44 PM IST

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अखिलेश की सियासी गुलाटी ने राहुल के प्लान को डिरेल कर दिया है

यूपी चुनावों के पहले तीन दौर के लिए अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में जिस सूबे की सियासी उथल पुथल काफी अहमियत रखती है. वहां इस सियासी घटनाक्रम का राजनीतिक प्रभाव भी अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है. खास कर, सत्ताधारी यादव कुनबे और उसके संभावित सहयोगी पार्टी कांग्रेस के लिए.

दिलचस्प बात यह है कि अखिलेश ने पहली सूची में ही अपने चाचा शिवपाल यादव को परिवार के पारंपरिक सीट जसवंतनगर सीट से टिकट दिया है. इतना ही नहीं अखिलेश की सूची में उनके कई करीबियों का भी नाम है. जाहिर है ये बातें इस ओर इशारा करती हैं कि समाजवादी पार्टी में अंदरखाने सब कुछ 'ऑल इज वेल' है .

अखिलेश समाजवादी पार्टी के नए सुल्तान हैं, तो वो सूबे के मुख्यमंत्री भी हैं. और कथित तौर पर समाजवादी पार्टी से अलग हुए धड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी. लेकिन पिता-पुत्र के बीच कथित जंग में जो शिवपाल सिंह खलनायक के तौर पर उभरे थे. वो अब बैकफुट पर नजर आ रहे हैं और भतीजे के नेतृत्व को स्वीकार करते भी दिख रहे हैं.

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दूसरी बात जो अहम है, वो ये कि अखिलेश यादव ने टिकट बंटवारे के जरिए अपने संभावित सहयोगी दल कांग्रेस को भी कड़ा संदेश दे दिया है. पैगाम साफ है कि कांग्रेस बतौर अखिलेश की साइकिल पर हल्के वजन की पीछे की सीट की सवारी तो बन सकती है. लेकिन वो भी साइकिल सवार यानी अखिलेश की दया पर.

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इतना ही नहीं साइकिल के सफर के दौरान बतौर सवारी कांग्रेस किसी खुशनुमा सफर की उम्मीद भी ना पाले. बस पार्टी खुद को खुशनसीब माने कि उसे अखिलेश के खेमे में एंट्री मिल गई है. क्योंकि अखिलेश यादव ने उम्मीदवारों की सूची उस वक्त जारी की है. जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सियासी गठबंधन के ऐलान किए जाने की अटकलें जोरों पर थी.

हद तो ये हो गई कि कांग्रेस जिन सीटों पर अपना हक छोड़ने को तैयार नहीं थी उन सीटों पर भी अखिलेश ने अपने उम्मीदवार का नाम तय कर दिया. इन सीटों में कम से कम 10 सीटें ऐसी हैं जहां विधायक कांग्रेस पार्टी के हैं. गौर करने की बात है कि वर्तमान विधानसभा में कांग्रेस के 26 विधायक हैं.

ऐसी 10 सीटें हैं, जहां वर्तमान में कांग्रेस के विधायक हैं और जिन सीटों से पार्टी के कई कद्दावर स्थानीय नेताओं का नाम जुड़ा है. उन सीटों पर भी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों के नाम का ऐलान करना कांग्रेस के लिए बड़ी सियासी नाकामयाबी जैसी है. लिहाजा ये देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में समाजवादी पार्टी से कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर कैसे निपटती है.

कांग्रेस विधायकों के खिलाफ उतारे उम्मीदवार

मसलन, बुलंदशहर में सयाना सीट से मौजूदा विधायक कांग्रेस के दिलनवाज खान हैं.बावजूद समाजवादी पार्टी ने इस सीट से राजकुमार लोधी को टिकट दिया है. खुर्जा सीट से कांग्रेस के मौजूदा विधायक बंशी सिंह हैं. लेकिन इस सीट से भी समाजवादी पार्टी ने नंदकिशोर बाल्मिकी को मैदान में उतारा है.

आरक्षित सीट हापुड़ से कांग्रेस के मौजूदा विधायक गजराज सिंह हैं. लेकिन यहां से भी समाजवादी पार्टी ने तेजपाल को टिकट दिया है. यही हाल मथुरा सीटा का है, जहां से मौजूदा विधायक कांग्रेस के प्रदीप माथुर हैं. लेकिन समाजवादी पार्टी ने इस सीट से अशोक अग्रवाल को टिकट दिया है.

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सहारनपुर के गनोह सीट से मौजूदा कांग्रेस विधायक प्रदीप कुमार के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने इंद्रसेन को चुनावी लड़ाई में उतारा है. जबकि रामपुर में स्वार सीट से समाजवादी पार्टी ने आजम खान के बेटे अब्दुल्लाह आजम को मौजूदा कांग्रेसी विधायक नवाब काजिम अली खान के खिलाफ मैदान में उतारा है .

जबकि रामपुर से आजम खान खुद समाजवादी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. बिलासपुर के मौजूदा कांग्रेस विधायक संजय कपूर के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने बीना भारद्वाज को टिकट दिया है. शामली में मौजूदा कांग्रेस विधायक पंकज मलिक के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने मनीष चौहान चुनावी को टिकट दिया है.

कानपुर के किदवईनगर सीट से मौजूदा विधायक कांग्रेस के अजय कुमार हैं. लेकिन यहां से भी समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार ओम प्रकाश मिश्रा को तय कर दिया है. इतना ही नहीं कानपुर कैंट सीट से भी समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है.

जाहिर है टिकट बंटवारे में अखिलेश ने ये साबित कर दिया है कि सियासी दंगल में उन्हें भी अपने पिता मुलायम की तरह ही धोबीपट दांव चलने में महारथ हासिल है. मुलायम सिंह यादव भी अपने सहयोगी दलों से खुद को मजबूत साबित करने के लिए आखिरी वक्त में अपनी रणनीति बदलने के लिए कुख्यात थे.

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अब ये बात मायने नहीं रखती कि अखिलेश ने ऐसा अपने पिता के कहने पर किया या फिर ये फैसला उन्होंने स्वतंत्र होकर लिया. लेकिन एक बात जो तय है वो ये कि इस फैसले से कांग्रेस भारी आहत है.

इसका मतलब बहुत साफ है कि अगर समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस चुनावों में गठबंधन करती है  तो ऐसा करने पर उसे समाजवादी पार्टी की शर्तों को मानने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. और अखिलेश-मुलायम की सियासी जोड़ी पर कांग्रेस अपनी शर्तों को किसी भी रूप में नहीं थोप सकेगी.

यूपी में कांग्रेस 'डी कैटेगरी' की पार्टी

हालांकि ऐसे झटकों के बाद कांग्रेस खेमे के लिए लखनऊ से आई एक खबर कुछ राहत लेकर पहुंची. जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने लखनऊ में ऐलान किया कि कांग्रेस को उनकी पार्टी 54 सीट देने को तैयार है.

इतना ही नहीं पार्टी कांग्रेस को और 25 सीटें दे सकती है अगर कांग्रेस बातचीत के लिए तैयार हो जाए. हालांकि कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के इस प्रस्ताव पर अभी प्रतिक्रिया नहीं दी है.

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समाजवादी पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की जिस सूची को जारी किया. और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने जो बयान दिया है. उससे साफ है कि सूबे की सत्ता की अहम लड़ाई में समाजवादी पार्टी की नजर में कांग्रेस सी या डी कटैगरी में रखने लायक है.

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चुनावों से पहले किसी भी सीट पर सियासी दल अपनी संभावित जीत को ए, बी, सी या फिर डी कटैगरी में बांटते हैं. डी कटैगरी में वो सीटें आती हैं जिस पर पार्टी कभी जीत नहीं हासिल कर सकी हो. जबकि सी कटैगरी के तहत उन सीटों को रखा जात है जिस पर पार्टी ने एक दशक पहले कब्जा किया था. और उसके बाद से वहां पार्टी लगातार तीसरे नंबर पर रही हो.

समाजवादी पार्टी ने अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ सियासी गठबंधन के लिए इंकार कर दिया है. हालांकि समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के लिए विकल्प खुला छोड़ रखा है. अगर पार्टी चाहे तो आरएलडी को महागठबंधन में बनाए रखने के लिए वो अपने कोटे की सीटों में से कुछ सीटें आरएलडी को दे सकती है.

अजीत सिंह को लेकर अखिलेश-मुलायम की चिंता की वजह दो है. अखिलेश मुलायम को लगता है कि अगर वो जाटों के समर्थन वाले नेता अजीत सिंह के साथ गठबंधन करते हैं. तो ऐसी हालत में पश्चिमी यूपी खास कर मुजफ्फरनगर-सहारनपुर इलाके में इसे लेकर मुस्लिम मतदाताओं में आक्रोश पैदा होगा.

जबकि कांग्रेस इस बात को लेकर वक्त जाया कर रही है कि क्या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बात का ऐलान करने राहुल गांधी को लखनऊ जाना चाहिए? या फिर राहुल गांधी को अखिलेश यादव को इस बात के लिए मनाना चाहिए कि वो दिल्ली आकर उनके साथ साझा प्रेस कांफ्रेंस में इसका ऐलान करें.

गठबंधन में कौन बड़ा

हालांकि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन के ऐलान की जगह चाहे लखनऊ हो या दिल्ली इसकी चुनावी अहमियत कोई खास नहीं है. सिवाए इसके कि अगर राहुल गांधी लखनऊ जाकर अखिलेश से मिलते हैं, तो इसका सांकेतिक मतलब ये निकाला जाएगा कि दोनों पार्टियों के गठबंधन में समाजवादी पार्टी बड़े भाई की भूमिका में रहेगी. शायद ही कांग्रेसी नेताओं को ये अहसास भी होगा कि मुलायम-अखिलेश की सियासी समझ राहुल के दरबारियों से कहीं ज्यादा है.

महत्वपूर्ण बात तो ये है कि एक चाल से अखिलेश ने ये तय कर दिया कि वही अब पार्टी के नए सुल्तान हैं. क्योंकि जिन्हें टिकट मिला और जिन्हें नहीं मिला. उनके लिए अखिलेश का फैसला आखिरी है.

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यूपी में सियासत की रपटीली जमीन पर अखिलेश ने खुद के दम पर अपना मुकाम हासिल किया है. और जहां तक अखिलेश की सूची में शिवपाल को टिकट दिए जाने की बात है तो इससे साफ है कि समाजवादी पार्टी में कोई घमासान नहीं मचा था. यादव कुनबे में महज ये वर्चस्व की लड़ाई थी.

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चुनाव आयोग ने अखिलेश को पार्टी नाम और चुनाव सिंबल रखने का फैसला सुनाया. लेकिन अपने 42 पेज के फैसले में आयोग ने ये भी विस्तार से बताया कि वो इस बात से क्यों इत्तेफाक रखती है कि समाजवादी पार्टी में वास्तव में दोफाड़ हो गया. राजनीति के छात्रों के लिए ये एक महत्वपूर्ण सबक सीखने के लिए हो सकता है.

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