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यूपी चुनाव: संघ के 'हिंदू राष्ट्र' की सबसे बड़ी अड़चन है ओबीसी आरक्षण

जब तक जातीय आरक्षण रहेगा, तब तक संघ के 'हिन्दू राष्ट्र' के एजेंडे के रास्ते में दीवारें खड़ी रहेंगी.

Qamar Waheed Naqvi Qamar Waheed Naqvi Updated On: Jan 21, 2017 01:22 PM IST

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यूपी चुनाव: संघ के 'हिंदू राष्ट्र' की सबसे बड़ी अड़चन है ओबीसी आरक्षण

लीजिए, संघ ने दोबारा आरक्षण का 'सेल्फ गोल' कर दिया! समझ में नहीं आता कि जिन चुनावों में बीजेपी की जान सांसत में हो, ठीक उन्हीं के पहले संघ के लोग आरक्षण को लेकर ऐसा बखेड़ा क्यों खड़ा करते हैं?

आपको याद होगा कि जब मोदी-शाह की जोड़ी 2015 में बिहार में नीतीश-लालू के महागठबंधन से जूझ रही थी. तभी चुनाव के ठीक पहले आरक्षण पर संघ प्रमुख के बयान ने बीजेपी की जड़ों में मट्ठा डाल दिया था.

और अब जब नोटबंदी के बाद पांच विधानसभाओं और उसमें भी खास कर उत्तर प्रदेश जैसे महत्त्वपूर्ण राज्य के चुनाव सिर पर हैं. संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आरक्षण का पलीता फिर से सुलगा दिया.

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हालांकि वैद्य के भाषण के तुरन्त बाद संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने यह कह कर आग पर पानी डालने की कोशिश की कि आरक्षण को हमेशा जारी रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाने चाहिए.

होसबले ने संघ के 1981 के एक प्रस्ताव का हवाला भी दिया, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी आरक्षण को पूरी तरह लागू करने और बनाये रखने की बात कही गयी थी.

वैद्य ने गलत नहीं बोला

क्या मनमोहन वैद्य गलती से ऐसा बोल गये? वह संघ के दिग्गजों में से हैं. क्या उन्हें संघ के उस प्रस्ताव की जानकारी नहीं रही होगी. जिसकी चर्चा होसबले कर रहे थे. और मोहन भागवत जब खुद आरक्षण की समीक्षा की बात कर रहे थे, तो क्या उन्हें भी संघ का 1981 का प्रस्ताव याद नहीं रहा.

ऐसा विस्मृति-भ्रम संघ के दो-दो दिग्गजों को कैसे हो सकता है?

और खास बात यह कि न 2015 में मोहन भागवत के बयान में कोई अस्पष्टता थी और न अब मनमोहन वैद्य के बयान में ऐसी कोई अस्पष्टता है कि आप कह दें कि मीडिया ने इन बयानों की गलत व्याख्या की है.

मोहन भागवत ने 'पांचजन्य' और 'आर्गनाइजर' को दिये अपने इंटरव्यू में साफ-साफ कहा था कि आरक्षण पर पुनर्विचार की जरूरत है. आरक्षण का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया है. एक 'अराजनीतिक' समिति बने जो यह देखे कि किसे और कितने समय तक आरक्षण की जरूरत है.

और अब मनमोहन वैद्य के बयान को देखिए, जिसका आशय यह है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण तो चलिए कुछ दिन चल भी सकता है. हालांकि इसकी जरूरत जल्द से जल्द खत्म हो, हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए, लेकिन ओबीसी आरक्षण तो तुरन्त ही खत्म होना चाहिए.

अगर आपको शंका हो तो वैद्य का पूरा बयान यहां देख लीजिए.

'आरक्षण का विषय भारत में एक अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लिए अलग सन्दर्भ में आया है. हमारे समाज के बांधवों को हमने सैंकड़ों साल तक सम्मान से, सुविधाओं से, शिक्षा से वंचित रखा है. यह बहुत अन्याय हुआ है. एकदम गलत हुआ है. उसका परिमार्जन करने की जिम्मेदारी हमारी है.'

muslim reservation

वैद्य ने आगे कहा, 'एक विशेष जाति में पैदा होने के कारण उनको सबसे दूर रखा गया, यह ठीक नहीं है. इसलिए उनको साथ लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में आरम्भ से किया गया है. यह भी कहा है, डॉ. अंबेडकर जी ने कहा है कि किसी भी राष्ट्र में हमेशा के लिए ऐसा आरक्षण का प्रावधान रहना अच्छा नहीं है.'

समान अवसर देने की वकालत करते हुए वैद्य ने कहा, 'जल्द से जल्द इसकी आवश्यकता निरस्त हो कर सबको समान अवसर देने का समय आना चाहिए. यह भी उन्होंने कहा है. इसलिए वह आरक्षण की सीमा है. बाकी अन्य आरक्षण के बदले में सबको अवसर अधिक दिये जायें. शिक्षा अधिक दी जाय. इस प्रकार का प्रयत्न करना चाहिए.'

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वैद्य ने आगे कहा, 'इसके आगे आरक्षण देना थोड़ा अलगाववाद बढ़ानेवाली बात है, ऐसा लगता है. सो अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के पिछड़े रहने के पीछे एक वर्षों से किया हुआ अन्याय उसके कारण बोलते हैं. ऐसा अन्य स्थान पर नहीं है. इसलिए उसका उपाय अन्य तरह से ढूंढना अधिक अच्छा रहेगा, ऐसा लगता है.'

अब जरा बयान को फिर से पढ़िए.

'उनको (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को) साथ लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में आरम्भ से किया गया है.....(लेकिन) बाकी अन्य आरक्षण के बदले में सबको समान अवसर अधिक दिये जायें क्योंकि इसके (यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के) आगे आरक्षण समाज में अलगाववाद बढ़ाता है.'

यह 'बाकी अन्य आरक्षण' का अर्थ क्या है? जाहिर है कि वह आरक्षण जो अनुसूचित जाति, जनजाति के अलावा दिया जाता है. क्या है वह 'अन्य आरक्षण?' जाहिर है कि वह ओबीसी आरक्षण है. और मनमोहन वैद्य यही बात अपने बयान में आगे फिर कहते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ तो वर्षों से अन्याय हुआ. लेकिन ऐसा 'अन्य स्थान' पर नहीं हुआ, इसलिए उसका उपाय अन्य तरह से (यानी आरक्षण के अलावा अधिक अवसर, अधिक शिक्षा दे कर) ढूँढना अच्छा रहेगा.

यह 'अन्य स्थान' क्या है? यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा जो 'अन्य स्थान' पर (यानी ओबीसी) आरक्षण दिया जा रहा है. उसके बजाय उन्हें अधिक शिक्षा और अधिक अवसर दिये जाना चाहिए.

देश में ओबीसी जातियों की आबादी 40 फीसदी से ज्यादा है. ओबीसी आरक्षण पर संघ का विरोध नया नहीं है. अगस्त 1990 में जब वीपी सिंह ने मंडल सिफारिशों को लागू करने का एलान किया तो संघ के मुखपत्र 'आर्गनाइजर' ने लिखा था कि आरक्षण की राजनीति हमारे सामाजिक ताने-बाने को जिस तरह तबाह कर रही है, वह अकल्पनीय है. यह  'मीडियाक्रिटी' को  'प्रीमियम' देना हुआ (यानी औसत दर्जे को बढ़ावा देना हुआ). यह प्रतिभा-पलायन को बढ़ायेगा और जातीय विभाजन को गहरा करेगा.

तो मोहन भागवत, मनमोहन वैद्य के बयानों और 'आर्गनाइजर' की इस टिप्पणी में घुमा-फिरा कर एक ही बात क्या अलग-अलग तरीके से नहीं कही गयी? क्या इन तीनों बयानों में एकरूपता नहीं है? क्या अब भी आरक्षण पर संघ के रुख को लेकर कुछ संदेह बचता है?

सोचने की बात है कि संघ आरक्षण के खिलाफ क्यों है? अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण तो चलिए, वह कुछ सालों तक मजबूरी में और बर्दाश्त करता रहे, लेकिन ओबीसी आरक्षण से संघ को बड़ी दिक्कत क्यों है?

ओबीसी आरक्षण से हिंदुओं में अलगाव

इसका एक ही कारण है. और वह यह कि जब तक जातीय आरक्षण रहेगा, तब तक संघ के 'हिन्दू राष्ट्र' के एजेंडे के रास्ते में दीवारें खड़ी रहेंगी. जातीय आरक्षण ही जातीय राजनीति की प्राणशक्ति है. जिसने जातियों को अपने-अपने पहचान-समूहों में बांधे रखा है, जातीय क्षत्रपों और जातीय आधार पर राजनीति करनेवाले तमाम छोटे-बड़े दलों को पैदा कर दिया है.

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जब तक ऐसे दल बने रहेंगे, जब तक उनके अलग-अलग नेता रहेंगे. तब तक जातियां अपने आपको 'विराट हिन्दू पहचान' में समाहित नहीं करेंगी. और इसी कारण तब तक 'हिन्दू राष्ट्र' का सपना नहीं पूरा हो सकता.

इसीलिए संघ की तरफ से आरक्षण के खिलाफ ऐसी बातें समय-समय पर आती रहती हैं. लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि ऐसे बयान बिहार और उत्तर प्रदेश चुनाव के ठीक पहले ही क्यों आते हैं? खास कर तब, जबकि यह दोनों राज्य देश में जातीय राजनीति के दो सबसे बड़े गढ़ हैं.

यह माना नहीं जा सकता कि यह महज एक संयोग है कि भागवत बिहार चुनाव के पहले यों ही बोल पड़े और वैद्य की जबान उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले फिसल पड़ी. यह भी नहीं माना जा सकता कि संघ के इन नेताओं को ऐसे बयानों के राजनीतिक परिणामों का एहसास न हो.

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खास कर तब, जबकि यह मालूम है कि भागवत के बयान के बाद सफाई देते-देते कैसे बीजेपी नेताओं के पसीने छूट गये थे!

जो लोग संघ को जानते हैं, वह जानते हैं कि संघ की तरफ से जो कुछ बोला जाता है, वह एक लम्बी प्रक्रिया में कूटने-छानने के बाद ही बोला जाता है और उसके निहितार्थ बहुत गहरे होते हैं. बहुत बार ऐसी बातों के अर्थ तुरंत समझ में नहीं आते.

क्या नोटबंदी के बाद अपने समर्थक सवर्ण और व्यापारी तबके को यह कुछ सहलाने की कोशिश है, या कुछ और? कह नहीं सकते. फिलहाल तो संघ ने वैद्य के बयान का खंडन कर दिया. लेकिन एक मुद्दे पर दो-तीन तरह की विरोधी बातों को फैलाये रख कर भ्रम बनाये रखने में संघ माहिर है. तो संघ की महिमा संघ ही जाने!

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