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यूपी चुनाव नतीजे 2017: साहित्य का ब्रह्मराक्षस या 'साहित्त' का वर्दीवाला गुंडा!

समय कुछ राजनीतिक दलों के लिए ‘अरण्य रोदन’ और जनता के लिए ‘साहित्त’ पढ़ने का है.

Madhukar Upadhyay Updated On: Mar 14, 2017 12:47 PM IST

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यूपी चुनाव नतीजे 2017: साहित्य का ब्रह्मराक्षस या 'साहित्त' का वर्दीवाला गुंडा!

5 राज्यों में चुनाव की गहमागहमी खत्म हो गई... नतीजे आ गए हैं. जिसे जहां सरकार बनानी है, कवायद शुरू कर चुका है. इसमें जनता जनार्दन की कोई भूमिका नहीं होती. उससे पूछा भी नहीं जाता. ये समय कुछ राजनीतिक दलों के लिए ‘अरण्य  रोदन’ और जनता के लिए घर बैठकर ‘साहित्त’ पढ़ने का होता है.

जनता अभी तय नहीं कर पाई है कि वह साहित्त पढ़ेगी या साहित्य. लोगों की जबान में रची गई कृतियों को तवज्जो देगी या गूढ़ार्थ रचनाओं को, जिनकी परतें खुलने में समय लगता है. बल्कि कई बार वे पलट-पलट कर पढ़ने के बावजूद पूरी तरह नहीं खुलतीं. कुछ का अर्थ सालों बाद समझ में आता है. तब तक कई पांच-साला चुनाव गुजर चुके होते हैं. उनका अपना समाज उलट-पुलट चुका होता है.

पराजित पार्टियों के लिए केवल अरण्य रोदन होता है- उन्हें लगता है कि वे रोएंगी और पेड़ उनका रोना सुनेंगे. पेड़ों को अच्छी तरह मालूम है कि वे यहां रोने क्यों आई हैं?  ताकि कोई देखे न, जगहंसाई न हो. गुस्सा पेड़ों पर ही निकल जाए. पेड़ ये भी जानते हैं कि पार्टियों को दरअसल सोचना, मनन करना या बदलना नहीं है. 5 साल में, मामूली कतरब्योंत के बाद वे फिर चुनावी जंग में उतर जाएंगी. इस उम्मीद में कि नए चुनाव के अरण्य रोदक दूसरे होंगे.

Akhilesh

ईवीएम पर ठीकरा फोड़ना भी अपने बियाबान में रोना ही है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. जो हारता है, रोता है. पहले भाजपा अक्सर रोया करती थी. उसने तो यहां तक कहा कि वापस कागज के मतपत्रों के युग में लौटना बेहतर होगा. अब दूसरे रो रहे हैं.

मशीनों और इंसानों के दिमाग से छेड़छाड़ हो सकती है, इसमे कोई संदेह नहीं है. ये दुधारी तलवार का खेल है. अगर आज रोनेवाले जीत गए होते तो दूसरा पक्ष रुदाली की भूमिका में होता. या उसके अन्य अर्थ निकाले जाते. ये क्यों नहीं देखा जाता कि जो रो रहे हैं, असलियत में उनका मत प्रतिशत बढ़ गया है जैसे यूपी में बहुजन समाज पार्टी. पंजाब, गोवा और मणिपुर में कांग्रेस को शिकायत क्यों हो?

बात यूपी की करें तो तर्क ये नहीं है कि वहां सब कालिदास, तुलसी, निराला और अज्ञेय हैं. बिल्कुल नहीं हैं. वहां रानू, राजवंश, गुलशन नंदा, वेद प्रकाश काम्बोज, सुरेंद्र मोहन पाठक भी हैं. जाहिर है उनके प्रतिनिधि इन्हीं में से होंगे. वे समाज के बाहर से आएंगे, इसकी कल्पना उतनी ही हास्यास्पद है जितनी यह अवधारणा कि जनता जैसी भी हो, नेतृत्व ईमानदार, पाक-साफ और दूध का धुला होना चाहिए.

narendra modi in varanasi

शिकायत की वजह सिर्फ ये है कि सबके लिए असल महत्व का और दूरगामी नतीजों वाला चुनाव उत्तर प्रदेश का था. बीजेपी ने यकीनन साबित कर दिया कि आम लोगों तक जितनी और जैसी पहुंच उसकी है, किसी की नहीं है. साहित्य के शब्दों में कहें तो लुग्दी साहित्य का ‘वर्दीवाला गुंडा’ कामयाब है और ‘ब्रह्मराक्षस’ विफल.

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वह आधुनिक हिंदी कविता हो गई लगती है. न रस, न अर्थ, न स्वीकार्यता. यह समूची आधुनिक कविता की आलोचना नहीं है पर तथ्य ये है कि जहां कविता की तीन से पांच सौ प्रतियां छपती हैं और उतने ही लोगों तक पहुंचती हैं, ‘सनम हरजाई’, ‘खून भरी मांग’ या ‘बेवफा बेहया’ की पहुंच लाखों तक होती है.

कांग्रेस की दूसरी समस्या भी है. उनके पास रचना और नेतृत्व दोनों में उबाऊ एकरसता है. नयापन है ही नहीं.

समाजवादी पार्टी के साहित्य की पहुंच तो है, लेकिन उसने खुद अपनी सीमा तय कर ली है. चाहती है कि केवल एक वर्ग के पाठक उसकी रचनाएं पढ़ें. इस लिहाज से उसकी स्थिति ‘लेखक भी वही पाठक भी वही’ वाली है जिसका नतीजा सामने है. बाकी पाठकों ने मौका मिलते ही उसे खारिज कर दिया.

बहुजन समाज पार्टी के रचनाकारों में कोई धूमिल या मुक्तिबोध नहीं है लेकिन उनकी हालत ‘ब्रह्मराक्षस’ की हो गई है. इसीलिए ‘जमाना सांप का काटा’ तो हुआ नहीं, भूल-गलती जिरहबख्तर पहन कर सामने आ गई. उसने ‘अरण्य रोदन’ के खिलाफ फैसला किया और सरेआम अपनी भड़ास निकाली. सारा दोष कविता की जगह मशीनों के माथे मढ़ दिया.

साहित्य में दुविधा हो सकती है लेकिन सुविधा ये है कि वह अपना पाठक वर्ग कभी भी तैयार कर सकता है. उसमें कोई इतना पीछे नहीं छूटता कि बस छूट जाए. लेकिन उसके लिए न भड़ास निकालना सही है, न अरण्य रोदन क्योंकि जनता साहित्य पढ़ती है और साहित्त भी.

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