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यूपी चुनाव नतीजे 2017: मोदी जनता और बीजेपी के बीच की कड़ी बन गए हैं

चुनाव में मोदी एक सांप्रदायिक चेहरे, एक डिलीवरी मैन और हितकारी नीतियां बनाने वाले शख्स के तौर पर उभरे

Tarushikha Sarvesh Updated On: Mar 14, 2017 03:14 PM IST

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यूपी चुनाव नतीजे 2017: मोदी जनता और बीजेपी के बीच की कड़ी बन गए हैं

2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मोदी पार्टी और वोटरों के बीच सबसे बड़ी कड़ी साबित हुए हैं. मोदी की हर चीज वोटरों को पसंद आई, चाहे उनके वादे हों, उनकी पोशाक हो या उनकी नीतियां हों.

बीजेपी ने इन चुनावों में मोदी के रूप में ‘प्रोग्रामेटिक लिंकेज’ और ‘क्लाइंटलिस्टिक लिंकेज’ दोनों को खंगाला है. लोगों की उम्मीदों को जमीनी कामों के मुकाबले मोदी के भाषण देने की कला से ज्यादा संतुष्ट किया गया.

क्षेत्रीय पार्टियों को अब तक ऐसी क्लाइंटलिस्टिक पार्टियों के तौर पर देखा जाता था, जो कि वोटरों और सेवाओं के बीच में मध्यस्थ के तौर पर काम करती थीं. लेकिन, जिन वोटरों को लगता था कि उनकी संबंधित पार्टियां सामानों और सेवाओं को उन्हें मुहैया कराने में नाकाम रही हैं, उन्होंने इसका विकल्प तलाशना शुरू कर दिया था. मोदी ऐसे वोटरों की उम्मीदों पर खरे उतरे.

कॉमन वोटर बीजेपी के हाथ गंवा बैठीं बाकी पार्टियां

मोदी तीन मोर्चों पर लोगों को लुभा रहे थे. वह एक सांप्रदायिक चेहरे, एक डिलीवरी मैन और लोगों के हित से जुड़ी हुई नीतियां बनाने वाले शख्स के तौर पर उभरे. ज्यादातर हिंदू वोटरों ने अपनी उम्मीदों को एक शख्स में पूरे होते देखा. क्या लोगों ने जाति, वर्ग और धार्मिक चिंताओं से ऊपर उठकर वोट दिया? कई वजहों से ऐसा नहीं हुआ. हकीकत में इससे संकेत मिल रहा है कि जाति और संप्रदाय की गहरी खाई ने मोदी (बीजेपी) के पक्ष में काम किया.

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अखिलेश यादव और राहुल गांधी गठबंधन बनाकर चुनाव लड़े लेकिन वो नाकामयाब रहे (फोटो: पीटीआई)

दलितों के लिए इस बात की चिंता थी कि बीएसपी ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों को खड़ा किया है जो कि पहले उनके इलाकों में बेकार साबित हुए थे. दलितों ने बीएसपी और कांग्रेस दोनों से दूरी बनाने का फैसला किया. इसी वजह से दोनों पार्टियां अपने कॉमन वोटर बीजेपी के हाथ गंवा बैठीं.

कुछ इलाकों में तो कोर बीएसपी वोटर भी बीजेपी की ओर मुड़ गया क्योंकि वे समाजवादी पार्टी के मौजूदा मुस्लिम उम्मीदवारों से नाखुश थे और इस बार बीएसपी ने भी मुस्लिम उम्मीदवारों को उनके यहां उतार दिया था. मुरादाबाद नगर और इलाहाबाद दक्षिण इनमें से कुछ विधानसभा सीटों में थीं. इन इलाकों में दलितों ने साफ तौर पर बीएसपी के मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारने को खारिज कर दिया.

एसपी के खिलाफ दिखे ओबीसी

कई जगहों पर ओबीसी समाजवादी पार्टी को वोट करना चाहते थे, लेकिन वे निवर्तमान उम्मीदवार से खुश नहीं थे. इन जगहों पर ओबीसी ने एसपी के खिलाफ और बीजेपी के पक्ष में वोट दिया. इस तरह की कई विधानसभा सीटों में बदायूं एक बड़ा उदाहरण है. यहां पर एसपी के आबिद रजा को एक विवादित चेहरे के तौर पर देखा जा रहा था और लोग उनसे नाराज थे.

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हालांकि, बदायूं धर्मेंद्र यादव का गढ़ है. गैर-यादव ओबीसी पूरे यूपी में अपना प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी एसपी का एक विकल्प तलाश रही थी. एसपी उनके हितों और नौकरियों के मौकों को पूरा करने में नाकाम साबित हुई थी.

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यूपी के नतीजों में कामयाबी का श्रेय मोदी और अमित शाह की जोड़ी को दिया जा रहा है (फोटो: पीटीआई)

गुजरे सालों में इन वर्गों में यह भावना मजबूत हुई थी कि एसपी शासन में उनके साथ भेदभाव हो रहा है. इन वर्गों को लगता था कि समाजवादी सरकार केवल यादवों और मुस्लिमों के लिए काम कर रही है. इलाहाबाद पश्चिम सीट के गैर-यादव ओबीसी और कुछ दलितों ने मजबूती से बीजेपी के उम्मीदवार सिद्धार्थ नाथ सिंह के पक्ष में प्रचार किया, जिससे उनकी बढ़िया जीत हुई. बीएसपी इस सीट को जीतती आई थी, लेकिन इस बार यह बीजेपी और एसपी के बाद तीसरे नंबर पर रही. जाति और संप्रदाय दोनों मोर्चों पर बीजेपी को सफलता हासिल हुई है.

दलितों में भी सबसे ज्यादा हाशिए पर मौजूद लोग नरेंद्र मोदी के तौर पर सबसे बड़ी सत्ता के साथ जुड़ाव और उन तक पहुंच को लेकर काफी उत्साहित थे. इन्हें लग रहा था कि मोदी को वोट देने से उन्हें मिलने वाले सरकारी फायदों के रास्ते में मौजूद बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाएगी. धानुक समुदाय के एक शख्स ने कहा, ‘राजा हमसे खुद मिलने आया तो कुछ तो सोचेगा.’

2014 में पूरी तरह बीजेपी के साथ रहे जाट बड़ी संख्या में अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल की और लौटे थे लेकिन इसका बड़ा असर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि गुर्जर आरएलडी के साथ नहीं आए. उन्हें लगा कि आरएलडी अपने दूसरे पारंपरिक वोटरों के बजाय सिर्फ जाटों के हित की पार्टी रह गई है.

बिचौलियों को रोकने के लिए बीजेपी को वोट

ये लोग मोदी की अलीगढ़ की रैली में आए थे, जिनका मानना था कि इन लोगों को अखिलेश के वादे के मुताबिक रिक्शा और मोदी की नीतियों के हिस्से के तौर पर गैस सिलेंडर नहीं मिला है. इन्होंने यह सोचकर बीजेपी को वोट दिया कि दलितों में संपन्न वर्गों, जिन्हें मायावती के शासन में फायदे हुए या मुसलमान जिन्हें समाजवादी पार्टी में फायदे मिले, उन्होंने इन फायदों को उन तक नहीं पहुंचने दिया. ऐसे में इन वर्गों ने बीएसपी और एसपी के रूप में बिचौलियों को रोकने के लिए बीजेपी को वोट दिया.

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यूपी चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने भी बीजेपी को बड़ी संख्या में वोट दिया है (फोटो: पीटीआई)

यह जातियों और समुदायों में पनपे भारी असंतोष का संकेत था. इनमें से ज्यादातर लोग अलीगढ़ और बदांयू के आसपास के गांवों से आए थे. 2017 के यूपी चुनाव ने यह साबित कर दिया कि जाति आधारित असंतोष की जड़ें काफी गहरी हो गई थीं. क्षेत्रीय पार्टियां इस चीज को समझने में नाकाम रहीं.

यहां तक कि मुसलमानों में भी जाति फैक्टर गहरा हुआ और इसने बीजेपी के पक्ष में काम किया. मुसलमानों में जाति और वर्ग फैक्टर और निराशा ने उलझन पैदा किया और इससे बीजेपी को यूपी में फायदा हुआ. बीजेपी ने राज्य में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा और इस तरह से साफ तौर पर एंटी-मुस्लिम संदेश दिया.

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कुछ पारंपरिक उच्च वर्ग के मुस्लिम तो यह तक कह गए कि यह एक हिंदू राष्ट्र है और इसमें एक हिंदू गंध होने का कोई नुकसान नहीं है. मुजफ्फरनगर के परवेज जैसे कुछ मुस्लिमों ने कहा कि वे केवल बीजेपी या मोदी के विरोध के आधार पर वोट नहीं करेंगे. इस संदेश के फैलने से बीजेपी को फायदा हुआ.

मुस्लिम वोट बंट गए?

बिलकुल शुरुआत से पूरे राज्य के उच्च जातियों के हिंदुओं ने कहना शुरू कर दिया था कि इस बार मुस्लिम वोटों की एकजुटता का फायदा नहीं होने वाला है और नतीजे हिंदू वोट कंसॉलिडेशन पर टिके होंगे. इनकी सोच थी कि मुस्लिम वोट कास्ट, क्लास और उम्मीदवार तक पहुंच के आधार पर बंट जाएंगे. इन्हें साफ तौर पर लग रहा था कि मुस्लिम वोटर विकल्प और लीडरशिप के भारी संकट का सामना कर रहे हैं जिसका बीजेपी को फायदा होगा.

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उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में एसपी और बीएसपी की बुरी हार हुई है

आखिर में यह कहा जा सकता है कि विकास का आइडिया सामाजिक वर्गों को भावनात्मक अपील के आधार पर एकजुट किए जाने की राजनीति पर टिका था. 2017 का यूपी चुनाव जाति और समुदाय के आधार से ऊपर उठा हुआ नहीं था, बल्कि यह कम नोटिस हो रहे या कम दिख रहे जाति और सांप्रदायिक चिंताओं से घिरा हुआ था. बीजेपी ने यूपी में अन्य पार्टियों पर एक सही अनुपात में आइडिया, पॉलिटिक्स, सोशल एनर्जी और इमोशंस का वार किया.

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