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क्या यूपी की सियासत में मंडल-कमंडल का दौर खत्म हो गया?

यूपी की सियासी कहानी पर 1990 के दशक के शुरुआती सालों से मंडल-कमंडल का जोर रहा है

Akshaya Mishra Updated On: Jan 21, 2017 10:14 PM IST

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क्या यूपी की सियासत में मंडल-कमंडल का दौर खत्म हो गया?

जाति के बंधन उतने ही ठोस और ठहरे हुए रहते, जितना उन्हें समझा जाता है तो यूपी का चुनावी नतीजा बताना बड़ा आसान होता. जो पार्टी बड़े-बड़े जाति समूहों को अपने पाले में कर लेती, जीत हर बार उसी की होती. लेकिन सूबे का चुनावी इतिहास बताता है- मामला ऐसा बिल्कुल भी नहीं.

यूपी में नेताओं की जाति कमोबेश एक सी रही है लेकिन जातियों का जमीनी जोड़-जमा बदलता रहा है.

इस बदलाव का अलग-अलग चुनाव में नतीजों पर अलग-अलग असर रहा है. पार्टी को भले ही किसी एक जाति-समुदाय की पहचान से जोड़कर देखा जाए,

जैसे समाजवादी पार्टी को यादवों से जोड़ा जाता है, बीएसपी जाटव जाति की पार्टी मानी जाती है और आरएलडी जाटों की, लेकिन वोटिंग का मामला जातियों के इस सीधे-सरल गणित के चौखटे में समाने से इनकार करता है. इसी कारण यूपी के चुनाव जटिल जान पड़ते हैं.

यूपी की सियासी कहानी पर 1990 के दशक के शुरुआती सालों से मंडल-कमंडल का जोर रहा है.

कांग्रेस सियासत की बिसात किनारे हो गई है

मंडल-कमंडल की कबड्डी और इसके आजू-बाजू चलती दलितों की गोलबंदी ने तकरीबन दो दशक तक चुनावी नतीजे तय किये. फिर सियासत की इस कहानी में नया मोड़ आया. कांग्रेस सियासत की बिसात पर एकदम ही किनारे हो गई, एसपी और बीएसपी सरीखे सत्ता के इलाकाई खिलाड़ियों ने मैदान संभाल लिया.

कांग्रेस सियासत की बिसात पर एकदम ही किनारे हो गई

कांग्रेस सियासत की बिसात पर एकदम ही किनारे हो गई

सूबे में जैसे-जैसे चुनावी लहर जोर पकड़ रही है, यूपी की सियासत एक नयी राह पकड़ती जान पड़ती है. मंडल-कमंडल की कहानी अब वोटर के दिमाग पर पहले की तरह हावी नहीं रही. अब केवल इन्हीं के सहारे वोटर को अपने पाले में एकजुट करना मुश्किल है. यही बात दलित-गोलबंदी के नुस्खे पर लागू होती है.

एक वजह यह भी है कि हर चुनाव में वोटिंग का पैटर्न बदला नजर आता है. दलित, ओबीसी और अगड़ी जातियों के वोटर अपनी पसंद बदलते रहते हैं.

साल 2002 में त्रिशंकु विधानसभा नजर आयी और समाजवादी पार्टी इसमें सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, 2007 में चुनावी जीत का भड़कदार सेहरा बीएसपी के माथे पर बंधा तो 2012 में समाजवादी पार्टी चुनावी दंगल का विजेता पहलवान साबित हुई.

2014 के लोकसभा चुनावों में बयार बीजेपी की बह निकली. बीजेपी सूबे के 403 विधानसभा सीटों में 320 सीटों पर सबसे आगे निकल गई.

इन बदलावो के पेशेनजर यह समझ खोखली साबित होती है कि किसी जाति या समुदाय के वोट उसी पार्टी को मिलेंगे जिसे पहले से मिलते आ रहे हैं.

मिसाल के लिए समाजवादी पार्टी को ही लीजिए. मान लिया जाता है कि पार्टी का मिजाज मंडलवादी है सो उसकी तरफ ओबीसी के वोटर खींचे चले आयेंगे. लेकिन बीते कुछ चुनावों से ऐसा होता नजर नहीं आता.

केवल यादव जाति के वोटर ही एसपी की तरफ झुके जान पड़ते हैं, गैर-यादव ओबीसी वोटरों ने बेहतर विकल्प की सूरत में एसपी से अलग वोट डालना ठीक समझा है. 2014 में कुर्मी और जाट समेत अन्य जातियों के इस समूह ने बड़ी तादाद में बीजेपी को वोट डाला.

2014 में एसपी का यादव वोट और भी कम हुआ है.

2014 में एसपी का यादव वोट और भी कम हुआ है.

यादव जाति के सारे वोटर समाजवादी पार्टी को वोट नहीं करते

अचरज नहीं कि एसपी को छोड़ बाकी पार्टियां, खासकर बीजेपी चाहती है कि इन जातियों के वोटर उसके पाले में चले आयें ताकि वे यादव जाति की वोटिंग की काट कर सकें.

फिर यह भी देखें कि यादव जाति के सारे वोटर सिर्फ समाजवादी पार्टी को ही वोट नहीं करते जबकि आम ख्याल यही है. एक सर्वे के मुताबिक 2007 में समाजवादी पार्टी को यादव जाति के 72 फीसद मतदाताओं ने वोट डाला जबकि 2012 में  पार्टी को यादव वोटरों के 66 फीसद वोट हासिल हुए.

इस बड़ी कमी के बावजूद एसपी को 2012 के विधान सभा चुनावों में भारी बहुमत हासिल हुआ. 2014 में एसपी का यादव-वोट और कम हुआ. इन चुनावों में बीजेपी को यादव जाति के 27 फीसद वोट मिले.

अगर यह मान भी लें कि यादव जाति के सारे मतदाता एसपी को वोट डालेंगे तो भी कोई तरीका नहीं जो सिर्फ इसी वोट के बूते समाजवादी पार्टी यूपी का चुनाव जीत जाये.

यूपी जीतने के लिए सपा को बाकी जातियों को भी अपने पाले मेें करना होगा

राज्य की आबादी में यादवों की तादाद 9 फीसद है, सूबे की ओबीसी की कुल आबादी में यादव 20 प्रतिशत हैं. यूपी के चुनाव जीतने के लिए समाजवादी पार्टी को बाकी जाति-समूहों को अपने पाले में करना होगा जिसमें गैर-यादव ओबीसी, अगड़ी जातियां और दलित शामिल हैं. यही बात बाकी पार्टियों पर लागू होती है.

Akhilesh Yadav

मंडल-कमंडल के बाद के वक्त की सियासत को देखते हुए सूबे की पार्टियों के लिए जाति और समुदाय की पहचान को पीछे छोड़ मुद्दों की वह छतरी तानना जरूरी हो गया है जिसके नीचे हर समूह के लोग आ सकें.

अचरज नहीं कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी छवि विकास के मसीहा की बनाना चाहते हैं और बीजेपी अपने कुछ पसंदीदा मुद्दों को पीछे कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विकास-पुरुष की छवि को आगे कर रही है. कांग्रेस के नोटबंदी के मुद्दे के पीछे भी यही वजह है.

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