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यूपी चुनाव 2017: आखिर अखिलेश क्यों कह रहे हैं कि ‘काम बोलता है’

ऐसे दावे के साथ चुनावी मुकाबले में उतरना हर नेता के वश की बात नहीं.

Akshaya Mishra Updated On: Feb 09, 2017 07:29 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: आखिर अखिलेश क्यों कह रहे हैं कि ‘काम बोलता है’

'काम बोलता है' यह अखिलेश यादव की अगुवाई वाले समाजवादी पार्टी की कैचलाइन है. ऐसे दावे के साथ चुनावी मुकाबले में उतरना हर नेता के वश की बात नहीं. वे अगर ऐसा करें तो उनकी बड़ी छानबीन होगी और नतीजा शायद ही उनकी तरफ जाए.

‘काम बोलता है’ सरीखे नारे के लिए अपने ऊपर बहुत भरोसा चाहिए और हाव-भाव से ऐसा नहीं जान पड़ता कि अखिलेश यादव के भीतर इस भरोसे की कोई कमी है. अखिलेश से तुरंत पहले इतने आत्मविश्वास से कोई उम्मीदवार अगर बोलता दिखा, तो वे हैं प्रधानमंत्री पद पर बैठने से पहले के नरेंद्र मोदी.

किसी के कामकाज का आकलन लोग अपनी-अपनी पसंद के हिसाब से करते हैं, इसमें अक्सर यह बात मायने रखती है कि आपका सियासी रुझान किस तरफ है. लोगों के मन में बनी धारणा ही तो राजनीति में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और इस मोर्चे पर अखिलेश बाकियों से कोसों आगे हैं.

सूबे के अलग-अलग हिस्सों में बात करो तो पता चलता है कि लोग अखिलेश के काम से निराश नहीं हैं. उन्हें बस इतना भर लगता है कि अखिलेश का कामकाज कुछ और बेहतर हो सकता था, खासकर कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर.

बीजेपी समर्थक भी मानते हैं अखिलेश को बेहतर सीएम

बिजनौर में एक चाय दुकानदार राजकुमार ने कहा, 'हां, उन्होंने अच्छा काम किया है.' और इसमें यह भी जोड़ा, 'वे एक भले आदमी हैं सो जब वे कहते हैं कि मैंने अच्छा काम कर दिखाया है तो हम विश्वास करते हैं.' राजकुमार बीजेपी के समर्थक हैं और यह भी साफ कर देते हैं कि उनका वोट अखिलेश को नहीं पड़ेगा. पूछने पर वजह बताते हैं कि हमलोग बीजेपी के समर्थक हैं.

'शिकायत करने को कुछ ज्यादा है नहीं. अखिलेश ने अपने बहुत से चुनावी वादों को पूरा किया है. लैपटॉप बांटे गए, महिलाओं के उत्पीड़न के मामलों पर नजर रखने के लिए हेल्पलाइन चालू हुई है, समाजवादी पेंशन योजना पर अमल किया गया है, ग्रामीण इलाकों में सड़कें बनी हैं और फिर आगरा-एक्सप्रेस वे भी बना है. लेकिन आपको यह भी ध्यान में रखना होगा कि सूबे में लोग नेताओं से कोई बहुत ऊंची उम्मीद लगाए नहीं बैठे. और इस लिहाज से देखें तो अखिलेश का काम ठीक ही कहा जाएगा. लेकिन मायावती ने इससे बेहतर काम किया था.' यही कहा एक भूतपूर्व नौकरशाह ने. वे अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते.

मोहम्मद असलम मेरठ में अपनी एक छोटी सी दुकान चलाते हैं. वे बातचीत में बिजली का जिक्र करना नहीं भूलते. 'पहले बिजली की हालत बड़ी खास्ता थी. दिन में तीन से चार घंटे तक बिजली रहती थी लेकिन अब चौबीसों घंटे रहती है.'

Akhilesh

अखिलेश यादव के पास विधायकों का समर्थन है जिससे उनकी दावेदारी मजबूत बनी हुई है

ग्रामीण इलाके में रहने वाले ज्यादातर लोग शायद असलम की इस बात से सहमत न हों. भले ही सरकार दावे करती हो कि गांव-गांव बिजली पहुंच रही है लेकिन गांवों में बिजली की दशा अब भी नहीं सुधरी. जो यूपी के बारे में विशेष नहीं जानते उन्हें यहां यह बताते चलें कि यूपी देश में बिजली की किल्लत वाले बड़े राज्यों में शुमार है.

बिजली चोरी को बढ़ावा देना बड़ी गलती

अखिलेश यादव ने 2012 के चुनावों मे वादा किया था कि गांवों में हर दिन 22 घंटे बिजली दी जायेगी. लेकिन इस वादे के पूरे होने में कुछ कसर रह गई है. बिजली की चोरी यूपी में एक आम बात है और अखिलेश ने बिजली चोरों पर नकेल कसने की जगह उन्हें और ज्यादा बढ़ावा दिया है. ऊर्जा-क्षेत्र का कर्जा 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है.

अपने को समाजवादी पार्टी के समर्थक बताने वाले शमसाद अहमद बताते हैं कि 'बिजनौर में तो हमें 22 घंटे बिजली मिलती है लेकिन देहात में 10 से 12 घंटे ही मिलती है. पहले हालत इससे भी ज्यादा खराब थी.'

समाजवादी पार्टी के शासन में कानून-व्यवस्था की हालत हमेशा से पतली रही है. और अखिलेश ने भी इस मोर्चे पर ढिलाई बरती है लेकिन टैक्सी ड्राईवर देवेंद्र यादव का सवाल है कि 'यूपी में कानून-व्यवस्था की समस्या कब नहीं रही. आखिर यूपी एक बड़ा राज्य है.'

देवेंद्र इटावा के निवासी है. उन्होंने अपनी बात में यह भी जोड़ा कि 'बतौर नेता अखिलेश आपकी पहुंच से बाहर नहीं जान पड़ते और फिर, समस्या के निबटाने की बात बड़ी ईमानदारी से कहते हैं. गुंडों पर नकेल कसने के मामले में मायावती बेहतर हैं लेकिन सब बातों को ध्यान में रखें तो अखिलेश ही बीस साबित होते हैं.'

यूपी चुनाव 2017

आगरा में रोड शो के दौरान समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने कुछ इस तरह किया शक्ति प्रदर्शन (पीटीआई)

अखिलेश के समर्थक उनकी उपलब्धियां गिनवाते नहीं थकते, पूरी फेहरिश्त पेश कर देते हैं, जैसे: लखनऊ-आगरा सरीखी बुनियादी ढांचे के विकास की परियोजनाएं, लखनऊ मेट्रो, ग्रामीण इलाकों में सड़क, अस्पताल और आईटी(सूचना-प्रौद्योगिकी) टाऊनशिप, समाजवादी पेंशन योजना के तहत 45 लाख परिवारों को सामाजिक सुरक्षा, लड़कियों की उच्च-शिक्षा के लिए कन्या विद्यादान योजना, महिलाओं के लिए चौबीसों घंटे की हैल्पलाइन आदि.

एसपी के समर्थकों का यह भी दावा है कि सूबे में कारोबार की सहूलियत बढ़ी है. इन बातों पर शक करने वाले लोग हैं लेकिन अखिलेश के शासन को लेकर आम तौर पर लोगों की राय सकारात्मक है.

अखिलेश को पता है कि उन्हें कामकाज के मामले में निठल्ला नहीं कहा जा सकता, ना ही यह कहा जा सकता है कि विकास की उन्होंने अनदेखी की है. बेशक वे इस बात को लोगों के सामने बार-बार दोहरा सकते हैं, इसे अपनी खासियत बताकर पेश कर सकते हैं.

अखिलेश की पहचान एक युवा नेता की है और ‘काम बोलता है’ का नारा युवाओं के मिजाज के हिसाब से एकदम फिट बैठता है. लेकिन इन बातों से परे भी एक बड़ी बात है. लोगों के सामने खड़े होकर यह कहना कि ‘मुझे वोट दो क्योंकि मैंने काम किया है’ बड़े साहस की मांग करता है और अखिलेश में यह साहस भरपूर है. मतलब, उत्तप्रदेश में नौजवानों ने बागडोर संभाल ली है !

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