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यूपी चुनाव 2017: इस दौड़ में हर नेता परेशान सा क्यों है?

पीएम मोदी हो या उनके विरोधी, आखिरी चरण में सब हताश नजर आए.

Akshaya Mishra Updated On: Mar 08, 2017 07:37 AM IST

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यूपी चुनाव 2017: इस दौड़ में हर नेता परेशान सा क्यों है?

क्या उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में कहीं कुछ ऐसा है, जो नजर में नहीं आ रहा? आखिरी चरण के दौरान माहौल में ‘करो या मरो’ वाले संकेत साफ नजर आए.

बड़े रोड शो हुए, पार्टियों के बड़े सितारे जमकर हमलावर रहे, हजारों पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और चारों तरफ इन सभी का शोर रहा - चुनावों के आखिरी दौर से पहले यहां की तेजी हर बार जैसी नहीं थी. क्या आपने पहले कभी किसी प्रधानमंत्री को किसी विधानसभा चुनाव के लिए इस तरह एक के बाद एक रोड शो करते देखा?... क्या आपने पहले कभी किसी प्रधानमंत्री को किसी विधानसभा चुनाव के लिए कहीं इस तरह दिन रात डेरा डाले हुए देखा था?

इसका जवाब इस बात में देखा जा सकता है किसी भी पार्टी को कोई साफ रुझान नजर नहीं आया सिवाए इसके कि ये अंतिम चरण है और इसमें सभी पार्टियों को अपनी सबसे बेहतरीन कोशिश कर डालनी है.

Gorakhpur Voting

चुनाव के पहले छह चरणों में सभी पार्टियों ने अपनी सारी कोशिशें कर लीं. सही-गलत हर तरह की रणनीतियां आजमाई गईं. बीजेपी ने ध्रुवीकरण के लिए कड़ी मेहनत की है, सपा-कांग्रेस गठबंधन ने अपने विकास कार्ड को चमकाया है और बसपा ने झूठे दावों का आरोप लगा कर दोनों पार्टियों का मुकाबला किया है. इन सबके बाद भी जमीनी खबर किसी खास पसंद की तरफ इशारा नहीं कर रही.

भले ही दिल्ली में मीडिया के एक धड़े ने भाजपा के पक्ष में 'लहर' खोज कर उसको पहले से ही विजेता घोषित कर दिया हो लेकिन खुद बीजेपी को इस बात का भरोसा नहीं है.

सपा-कांग्रेस गठबंधन भले ही अखिलेश और राहुल गांधी की युवा अपील पर यकीन कर रहे हों, भले ही ऐसा लग रहा हो कि मुस्लिम वोट एकजुट हो कर इनके पीछे खड़े हैं और 'काम बोलता है' का नारा लोगों को वोट देने की प्रेरणा दे रहा हो, पर वास्तव में ये बिलकुल साफ नहीं है कि इन सबसे किसी को कोई फायदा होने वाला है.

बसपा ने बड़ी बातें करने की बजाए बूथ स्तर पर ध्यान लगाने पर ज्यादा विश्वास जताया है. उसे उम्मीद है कि अपने मूल दलित आधार के साथ मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा उनकी पूरी मदद करेगा. वैसे उनके इस अनुमान में बहुत से 'अगर' भी शामिल हैं.

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बढ़ रही हताशा खुद अपनी जबानी यहां अपनी कहानी कह रही है. हमें समझ आ रहा है कि तीन दिन चुनावी काम में मसरूफ रहने के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूर्व प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री के रिश्तेदारों से मिलने जाने या मंदिरों के दौरे की वजह क्या है? या वे गड़वा घाट क्यों गए जो यादव समुदाय की आस्था का केंद्र है?

मोदी उत्तरप्रदेश में अपनी पार्टी के अभियान के कमांडर-इन-चीफ हैं, जो दरअसल अकेले ही पूरी सेना के बराबर हैं. जबकि बाकी सभी नेतागण अप्रासंगिकता के अंधेरे में खो से गए हैं. अगर पार्टी जीत नहीं पाई तो दोष सीधे-सीधे उन पर ही मढ़ा जाएगा.

लेकिन यहां उनकी भागीदारी की वजह कुछ और भी हो सकती है. वाराणसी में उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. वे लोकसभा में इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. यहां की आठ विधानसभा क्षेत्रों में से दो-तीन में भी हार उनकी प्रतिष्ठा के लिए झटका साबित हो सकती है और 2019 के उनके चुनावी समीकरण पर वो अलग से असर भी डाल सकती है.

अगर मोदी यहां से मुंह की खा कर वापस गए तो फिर वे उस नेता के तौर पर नहीं देखे जाएंगे जिसे 2014 में यहां लोगों ने बड़े ही जोशो-खरोश से वोट दिया था. उनके नाम के साथ जुड़ा हुआ आभामंडल यहां घायल हो सकता है.

Varanasi: Prime Minister Narendra Modi waves to people during his road show in Varanasi on Sunday. PTI Photo (PTI3_5_2017_000190B)

अगर ये परेशानी भी काफी नहीं है तो उनकी पार्टी के लिए दूसरी कई बड़ी समस्याएं खड़ी हैं जो कई सीटों पर असंतोष के रूप में उनको तकलीफ देने वाली हैं. और अब इस हालत में उनके पास तीन साल पहले अपने निर्वाचन क्षेत्र से किये गए विकास के वादों को लेकर बताने को अधिक कुछ है नहीं.

यदि उनकी गतिविधियां इस हताशा को मिटाने में नाकाम रहती हैं, तो इसमें वे कुछ कर भी नहीं सकते. ये एक ऐसा इम्तिहान है जिसमें उनको कुछ ज़्यादा ही नंबर लाने होंगे, सिर्फ पास होने से काम नहीं चलने वाला.

उत्तरप्रदेश में बिहार को दोहराना उनके लिए राजनीतिक रूप से विनाशकारी सिद्ध हो सकता है. इसीलिए वे अपनी हर संभव कोशिश कर रहे हैं. अगर प्रधानमंत्री का इस तरह से मेहनत करना लोगों को अजीब सा लगता है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

चलिए, असली बात पर वापस आते हैं कि क्या इस बार कुछ निगाहों से ओझल हो रहा है?- तो इसका जवाब है - हां, वाकई ऐसा है.

पिछले कुछ चुनावों में हमने देखा है कि जीतने वाला बड़े पैमाने पर जनादेश प्राप्त करता है और बाकी लोग बुरी तरह से मुंह के बल गिरते हैं. यदि कोई लहर होती है तो वो चुनाव परिणाम में साफ दिख जाती है. लेकिन उसके पहले नहीं - इस बार काफी बड़े सैंपलिंग वाले ओपिनियन पोल या एक्जिट पोल भी जमीनी हकीकत की दिशा भांप नहीं पा रहे हैं. इस रुझान से तो कोई भी अपनी जीत पुख्ता नहीं मान सकता है.

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