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विधानसभा चुनाव 2017: कैसे हैं 5 राज्यों के सियासी गणित?

मोदी सरकार के लिए पांच राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव अग्नि-परीक्षा से कम नहीं होंगे

सुरेश बाफना Updated On: Jan 04, 2017 05:03 PM IST

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विधानसभा चुनाव 2017: कैसे हैं 5 राज्यों के सियासी गणित?

चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान किए जाने के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच पहले से जारी जोड़-तोड़ की प्रक्रिया भी तेज हो गई है.

मोदी सरकार के लिए पांच राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव अग्नि-परीक्षा से कम नहीं होंगे. इन चुनावों के नतीजों से यह स्पष्ट होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होनेवाला है?

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर से ध्वस्त हुए विपक्षी दलों की एकमात्र कोशिश यह होगी कि किस तरह एकजुट होकर या अलग-अलग रहकर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 2019 के सपने को 2017 में ही नेस्तनाबूत किया जाए? इस लिहाज से इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर न केवल देश में बल्कि विदेशों में काफी उत्सुकता के साथ देखा जाएगा.

जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां भारतीय जनता पार्टी प्रमुख दावेदार के तौर पर मौजूद है. 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 73 सीटें जीतने के बाद भाजपा ने यह मान लिया था कि वहां जब भी विधानसभा के चुनाव होंगे, उनकी जीत पक्की है. ढाई साल बीतने के बाद आज उत्तर प्रदेश के हालात इतने बदल चुके हैं कि किसी भी दल के संदर्भ में जीत का दावा नहीं किया जा सकता है.

बिहार की तरह यूपी में भी प्रधानमंत्री के नाम पर चुनाव लड़ेगी बीजेपी

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प्रधानमंत्री के लिए पांच राज्यों से ज्यादा महत्वपूर्ण यूपी है

गोवा, पंजाब, मणिपुर और उत्तराखंड की तुलना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पीएम वाराणसी से लोकसभा सांसद हैं. अपनी चुनावी रणनीति के अनुसार भाजपा ने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे को प्रोजेक्ट नहीं करने का निर्णय लिया है.

बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने तय किया है कि नरेंद्र मोदी के चेहरे के आधार पर ही चुनाव मैदान में उतरा जाए. 8 नवम्बर 2016 को नरेंद्र मोदी ने 500-1000 रूपए के नोट का विमुद्रीकरण करके राजनीतिक भूकम्प जैसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसका असर आज भी देश के हर कोने में दिखाई दे रहा है.

जाहिर है पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में नोटबंदी का मुद्दा हावी रहेगा. भाजपा और विपक्ष दोनों की कोशिश होगी कि नोटबंदी से पैदा हुई स्थिति के आधार पर एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा किया जाए.

उत्तर प्रदेश में सपा के भीतर जारी पिता-पुत्र कलह से भाजपा व बसपा दोनों उम्मीद लगाए बैठी हैं कि उनको इस कलह का राजनीतिक लाभ मिलेगा, लेकिन जमीनी रिपोर्ट यह इंगित कर रही है कि यह दावा सिद्ध करना आसान नहीं होगा. पिता-पुत्र के बीच संभावित विभाजन का नकारात्मक असर सपा के दोनों गुटों पर समान रूप से पड़ेगा.

उत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच होनेवाले राजनीतिक टकराव को देखना काफी दिलचस्प होगा. दोनों ही विकास को प्रमुख मुद्दा बनाकर जनता का समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों की सार्वजनिक छवि मिस्टर क्लीन के रूप में है.

समाजवादी पार्टी विभाजन से मायावती की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर होगी

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सपा में विभाजन से होगा बसपा को फायदा ?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा सुप्रीमो मायावती का चुनावी भविष्य बेहतर नहीं दिखाई दे रहा है. उनकी एकमात्र उम्मीद इसी बात पर टिकी हुई है कि सपा में होनेवाले विभाजन के चलते मुस्लिम समुदाय एकजुट होकर उनकी झोली में गिर जाए. सपा में यदि विभाजन भी हो जाए तो उसका मुस्लिम वोट किस स्तर पर विभाजित होंगे, यह फिलहाल कहना संभव नहीं है.

नरेंद्र मोदी ब्रांड के साथ भाजपा की उम्मीद इस बात पर टिकी हुई है कि असम की तरह उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम वोटों का तीन हिस्सों में विभाजन हो जाए.

मुख्यंमत्री पद के लिए किसी चेहरे का अभाव भाजपा के लिए बिहार की तरह नुकसानदेह सिद्ध हो सकता है, क्योंकि लोकप्रियता के लिहाज से इस पद पर अखिलेश यादव फिलहाल अपनी बढ़त बनाए हुए हैं.

पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन और गोवा में भाजपा सरकार के खिलाफ आप पार्टी एक नए दावेदार के तौर पर उभरी है, जो कांग्रेस पार्टी के लिए भी परेशानी की बात है.

तीन महीने पहले यह कहा जा रहा था कि पंजाब में आप पार्टी पहले नंबर पर दिखाई दे रही है, लेकिन अब त्रिकोणीय चुनावी संघर्ष देखते हुए कोई भी भविष्यवाणी करना खतरे से खाली नहीं है. पहले यह मानकर चला जा रहा था कि अकाली-भाजपा गठबंधन की हार तय है.

पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव के नतीजों से यह स्पष्ट होगा कि आप पार्टी का दिल्ली की सीमाअों के बाहर कोई भविष्य है या नहीं? आप पार्टी ने पहले हरियाणा में चुनाव लड़ा था, जहां उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा था. मणिपुर में भाजपा की कोशिश होगी कि कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया जाए. असम में सरकार बनने के बाद भाजपा उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में भी अपना विस्तार करना चाहेगी.

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