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गूगल के पार: 1989 का वो मर्डर जिसने जाट-मुसलमान रिश्तों को गढ़ा

जाट-मुसलमानों के बीच बदलते संबंधों को समझना हो तो 1989 के एक मर्डर केस को समझना जरूरी है.

Ajay Singh Ajay Singh | Published On: Feb 08, 2017 12:12 PM IST | Updated On: Feb 08, 2017 01:02 PM IST

गूगल के पार: 1989 का वो मर्डर जिसने जाट-मुसलमान रिश्तों को गढ़ा

आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश मेरठ का नाम सुनते ही दिमाग में आते है गन्ना किसान और जाट-मुसलमानों की दुश्मनी. अगर मेरठ में, राजनीति में और जाट मुसलमानों के बीच संबंधों की बदलती कुण्डली को समझना हो तो 1989 के एक मर्डर केस को समझना जरूरी है.

मुजफ्फरनगर के एक मुस्लिम किसान की बेटी नईमा का 1989 में अपहरण कर लिया गया था. बलात्कार के बाद नईमा की हत्या कर दी गई थी. फिर जो हुआ उसने सालों के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदल दिया.

इस घटना के खिलाफ किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में जाटों और मुसलमानों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था.

जाट-मुसलमान गठजोड़

टिकैत खुद जाट थे. उनके नाम से ही दिल्ली और लखनऊ के हुक्मरान एकबारगी डर जाते थे. नईमा की हत्या के खिलाफ टिकैत ने नईमा के शव को लेकर हाईवे पर जाम लगा दिया और दिल्ली का पश्चिमी यूपी से संपर्क पूरी तरह से काट दिया. टिकैत के समर्थकों ने कई पुलिसवालों को बंधक बना लिया था. वे मामले की जांच और पीड़ित परिवार को मुआवजे की मांग कर रहे थे.

करीब एक हफ्ते के विरोध प्रदर्शनों और बातचीत के बाद आखिरकार टिकैत के समर्थक नईमा के शव को दफनाने को राजी हुए थे. इस घटना से पश्चिमी यूपी के किसान एकजुट हो गए थे. फिर वो चाहे हिंदू हों या मुसलमान, या फिर वो किसी भी जाति के हों.

जाटों और मुसलमानों ने दिया था वीपी सिंह को खुलकर समर्थन

इस घटना के बाद महेंद्र सिंह टिकैत किसानों के निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित हो गए थे. उस वक्त उनका कद चौधरी चरण सिंह से भी बड़ा माना जाने लगा था. राजीव गांधी की सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाले वीपी सिंह को पश्चिमी यूपी के जाटों और मुसलमानों दोनों ने खुलकर समर्थन दिया था.

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इलाके के लोग जनता दल के समर्थक थे. उनके समर्थन की वजह से जनता दल इलाके का सबसे बड़ा दल बनकर उभरा था.

समीकरण बदलना कैसे शुरू हुए

लेकिन आज की तारीख मे किसी को भी नईमा का नाम याद नहीं. इलाके के राजनेता भी उसे भुला चुके हैं. अब गिने चुने लोगों को ही 1989 की वो घटना याद है, जिसने इलाके की राजनीति को बदल दिया था.

नईमा की मौत से इलाके के किसान एकजुट होकर एक बड़ी ताकत बनकर उभरे थे. लेकिन अब ये सामाजिक एकता खत्म हो चुकी है. जब बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन छेड़ा था, तब से ही पश्चिमी यूपी के लोग सांप्रदायिक पहचान को लेकर सजग हो गए थे.

और आज क्या हालात है यहां?

मेरठ जिले की सरधना विधानसभा सीट में एक जाट बहुल गांव है. जब बीजेपी के प्रत्याशी संगीत सोम वहां प्रचार के लिए गए तो उन्हें गांव के लोगों ने समर्थन का वादा किया. मगर उसके पीछे जो वजह बताई वो चौंकाने वाली थी.

गांव के एक बुजुर्ग ने संगीत सोम को बब्बर शेर बताया, जिसने मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान जाटों के लिए लड़ाई लड़ी. बुजुर्ग ने कहा कि इस संघर्ष के लिए सोम को तीन महीने जेल में भी रहना पड़ा.

संगीत सोम कोई आम नेता नहीं हैं. वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई दिनों तक चली सांप्रदायिक हिंसा में अपने रोल से सुर्खियों में आए थे. सरधना में वो रॉबिन हुड के अवतार के तौर पर जाने जाते हैं, जिन्होंने हिंदुओं के हितों की लड़ाई लड़ी.

संगीत सोम के लिए राह आसान नहीं

संगीत सोम के लिए इस बार भी चुनावी राह आसान होती, अगर मतदाताओं का खुलकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ होता. मगर इस बार ऐसे हालात नहीं दिख रहे.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदातओं की अच्छी खासी तादाद है. इस बार जाट बीजेपी के बजाय राष्ट्रीय लोकदल के पाले में खड़े दिख रहे हैं. ये बीजेपी और संगीत सोम के लिए बेहद फिक्र की बात है. हालांकि गांव के बुजुर्ग अपने तजुर्बे से इस दुविधा को दूर करने का काम कर रहे हैं.

वो बुजुर्गवार कहते हैं, 'मुझे पता है कि राजनाथ सिंह और अजित सिंह ने गुपचुप समझौता कर लिया है. अगर चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी को बहुमत नहीं मिलता, तो अजित सिंह सरकार बनाने में बीजेपी की मदद करेंगे. तो चलो हम सब ठाकुर संगीत सोम को वोट करें, ताकि वो मंत्री बन सकें'.

गांव के तमाम लोग उन बुजुर्गवार की बात से सहमत दिखे. उनके जहन पर सांप्रदायिक हिंसा का असर साफ दिखता है.

जाटों-मुसलमानों के बीच की तल्खी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसी भी इलाके में चले जाएं, लोग सांप्रदायिक आधार पर साफ तौर पर बंटे नजर आते हैं. जाटों और मुसलमानों के बीच तल्खी इस चुनाव में साफ तौर पर दिखती है. ये ऐसी चीज है जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हमेशा से थी.

आज की तारीख में पश्चिमी यूपी इस्लामिक कट्टरपंथ का भी गढ़ माना जाता है. इलाके में एक के बाद एक हुए कई दंगों ने सामाजिक एकता को पूरी तरह से खत्म कर दिया है. फिलहाल कोई राजनीतिक दल इसे दुरुस्त करने का इरादा भी नहीं रखता.

नईमा की मौत एक ऐसा इंसानी हादसा थी जिसने इलाके के लोगों को एकजुट कर दिया था. मुजफ्फरनगर के दंगे ऐसी सामाजिक घटना थे, जिसके नतीजे बेहद भयानक रहे हैं. आज उस घटना का राजनीतिक फायदा उठाने की पुरजोर कोशिश हो रही है.

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