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यूपी में बस मोदी नाम चला, धरे रह गए सभी समीकरण

यूपी की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विश्वास किया और अपार समर्थन दिया

Ram Bahadur Rai Updated On: Mar 20, 2017 12:23 PM IST

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यूपी में बस मोदी नाम चला, धरे रह गए सभी समीकरण

यह वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय जी से बातचीत पर आधारित लेखों की दूसरी कड़ी है. पहला लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के बेमेल गठबंधन पर पीएम नरेंद्र मोदी ने जो बात उठाई उसमें क्या गलत था. मोदी ने यह बात उठाई कि जो कल तक '27 साल यूपी बेहाल' की बात करते थे. वह आज बेमेल समझौते कर सेक्युलर वोटों को पोलराइजेशन करना चाह रहे हैं.

एसपी का मानना था कि 24 फीसदी खुद का और कांग्रेस 10-11 फीसदी वोट बैंक एक साथ आ जाएगा. दोनों मिलाकर 34-35 प्रतिशत वोट प्रतिशत हो जाएगा और 5-6 प्रतिशत अन्य वोट मिला कर हमलोग सरकार बना लेंगे.

इसको मीडिया ने खूब प्रोजेक्ट किया. चुनाव के दौरान मीडिया में एक भी रिपोर्ट नहीं आई जिसमें यह दिखाया गया हो या कहा गया हो कि दोनों पार्टियों के बीच ग्रांउड पर कोई मेल नहीं है.

मैं बिल्कुल जिम्मेवारी के साथ कहना चाह रहा हूं कि जिस बात का श्रेय प्रियंका गांधी को दिया गया, वह काम प्रियंका ने नहीं किया. एसपी और कांग्रेस के बीच गठबंधन का काम अहमद पटेल ने करवाया. उस अहमद पटेल को जब कोई पूछ नहीं हुई तो वे गुजरात के दौरे करते रहे. वातावरण यह बनाया गया कि प्रियंका और डिंपल साथ में चुनाव प्रचार करने वाली हैं.

मेरा यह मानना है कि इस बार यूपी में एक नया राजनीतिक प्रयोग था. जिसमें बसपा ने अपने लिए दलित और मुस्लिम एलायंस की कोशिश की. दलित-मुस्लिम एलायंस की कोशिश हमारे देश में 1931-32 से हो रहा है. आजादी से पहले भी यह कोशिश हो रही थी और आजादी के बाद भी यह कोशिश चल रही है.

यूपी में दलित-मुस्लिम एलायंस कभी काम नहीं किया

बुद्ध प्रिय मौर्य जिनको बीपी मौर्य भी कहते हैं. बीपी मौर्य ने उत्तर प्रदेश में रिपब्लिकन पार्टी बनाई थी. बीपी मौर्य उत्तर प्रदेश में बहुत आक्रामक नेता हुआ करते थे. रिपब्लिकन पार्टी का आधार भी वही था जो मायावती ने इस बार अपनाया था. यूपी में दलित-मुस्लिम एलायंस कभी काम नहीं किया है.

इस बार का उत्तर प्रदेश का चुनाव पिछले चुनावों से बिल्कुल भिन्न था. उत्तर प्रदेश में साल 1974 में विधानसभा का चुनाव हुआ. मुख्यमंत्री पद के दावेदार चौधरी चरण सिंह थे. भाक्रांत उनकी पार्टी का नाम था. कांग्रेस के हेमवती नंदन बहुणुणा थे और जनसंघ के पास तो कोई नेता हीं नहीं था.

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चौधरी चरण सिंह

जनसंघ के नेता नानाजी देशमुख बड़े दूरदर्शी नेता थे. नानाजी को राजनीति की बड़ी गहरी समझ थी. उन्होंने 1974 में जनसंघ का चेहरा अटल बिहारी वाजपेयी को बनाया.

1974 के विधानसभा चुनाव को नजदीक से देखने वाले कई लोग आज भी हैं. वे लोग भी इस चुनाव में कह रहे थे कि बीजेपी तो पिट जाएगी क्योंकि बीजेपी के पास कोई चेहरा ही नहीं है. शायद वे लोग साल 1974 वाली सामाजिक स्थिति को देख रहे थे.

1974 में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का सिक्का नहीं चला. उस समय बीजेपी को 60 सीटें मिली थी. 100 के आस-पास सीट चौधरी चरण सिंह को मिली थी और कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला था.

अटल बिहारी वाजपयी ने जो नहीं किया वह मोदी ने कर दिया

लोकसभा में नरेंद्र मोदी को लोगों ने चुना ये बात सही है. लेकिन आखिर प्रधानमंत्री को लोग वोट क्यों देंगे वोट तो विधानसभा के लिए होने हैं. लोगों का यह आकलन भी साल 2017 में फेल कर गया.

इस चुनाव में कांग्रेस और सपा का मुख्यमंत्री कैंडिडेट था. बीजेपी के पास कैंडिडेट नहीं होना बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती थी.

जब चुनाव परिणाम आया तो मालूम पड़ा कि चुनाव में तो यह फैक्टर ही नहीं था. बीजेपी चुनाव अभियान को संचालित करने वाले लोग भी अब कह रहे हैं कि उम्मीदवारों को किसी ने तो देखा ही नहीं है. यह मोदी के नाम पर जीत मिली है.

लोगों ने वोट किया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात पर और उनके विश्वास पर. बीजेपी की मिले वोट में कई फैक्टर काम किया है. लेकिन, अब यह कहने की कोशिश की जा रही है कि पोलराइजेशन हो गया. यह बताने की कोशिश हो रही है कि हिंदु-मुस्लिमों का पोलराइजेशन से बीजेपी की जीत हुई है.

pm modi jaunpur rally

मोदी फैक्टर ने बीजेपी को पहुंचाया है जीत की कगार पर

मेरा यह कहना है कि यह हिंदु-मुस्लिम में कोई पोलराइजेशन नहीं हुआ है. आप देखिए जो लोग कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने शमशान और कब्रिस्तान की बात की, वे लोग ये भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कब्रिस्तान और शमशान की बात चौथे चरण के चुनाव प्रचार के दौरान कही.

तीन फेज तो निकल गया था. तीन फेज के चुनाव में प्रधानमंत्री ने कभी पोलराइजेशन की बात नहीं की थी?

पोलराइजेशन की जरूरत थी

पहले फेज में पोलराइजेशन की जरूरत थी दूसरे फेज में, तीसरे और चौथे फेज के बाद पोलराइजेशन की कोई जरूरत ही नहीं थी.

उत्तर प्रदेश में कुल 100 सीटें ऐसी हैं जहां पर मुसलमान वोट 10 फीसदी से लेकर 40 फीसदी तक है. रामपुर की एक सीट ऐसी है जहां पर शायद 42 प्रतिशत या उससे ज्यादा मुस्लिम वोट प्रतिशत है. इन सारे फेजों में तो प्रधानमंत्री ने विकास की बात की थी.

अखिलेश की हार की बड़ी वजह पक्षपातपूर्ण रवैया

चौथे फेज में प्रधानमंत्री ने जो कहा उसको सही परिपेक्ष्य में कहें तो पीएम ने ये कहने की कोशिश कि मुख्यमंत्री जो भी होता है या बनता है उसे न्यायप्रिय होना चाहिए और निष्पक्ष होना चाहिए. किसी भी जात या मजहब के साथ पक्षपात नहीं करना चाहिए.

अखिलेश यादव पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं

अखिलेश यादव पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं

मेरा मानना है कि अखिलेश यादव की भारी पराजय हुई इसका कारण यही है. उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में काम नहीं किया. राज्य में हुए भर्तियों में अखिलेश यादव ने एक जाति विशेष पर कृपा की.

जितने तरह की भर्तियां हुई उसमें अखिलेश यादव ने पक्षपात किया. अखिलेश यादव को इसके लिए सजा हो या नहीं हो यह अलग विषय है पर उन्होंने सारी मर्यादाओं का ताक पर रख दिया.

अमित शाह को बीजेपी में मिली कमान से समीकरण बदल गए

इस चुनाव में दो तीन बातें बहुत खास हुए हैं, जो पिछले चुनावों से इसको अलग करती है. बीजेपी ने 2014 में एक प्रयोग किया वह अमित शाह ने ही प्रयोग किया. अमित शाह ने टिकट बंटवारे में किसी दबाव की परवाह नहीं की.

2014 में नरेंद्र मोदी ने जब अमित शाह को बीजेपी का महासचिव बनवाया तो बीजेपी के बहुत लोग मुझसे मिले और कहा कि ये उत्तर प्रदेश में क्या करेंगे. चुनाव बीत जाएगा तब तक उत्तर प्रदेश को समझ ही नहीं पाएंगे.

परंतु, अमित शाह ने अपने मेहनत और सूझबूझ से उम्मीदवारों का चयन किया वह काबिलेतारीफ है. अमित शाह में एक भारी विशेषता यह है कि वह किसी आदमी से 10 मिनट 5 मिनट बात कर लें तो उसका करीब-करीब 100 प्रतिशत आंकलन कर लेते हैं. अमित शाह की एक और खासियत है कि वह किसी दबाव में काम नहीं करते.

मुरली मनोहर जोशी की भी नहीं सुनते अमित शाह

2014 में डॉ मुरली मनोहर जोशी एक उम्मीदवार की सिफारिश करना चाह रहे थे. अमित शाह ने मुरली मनोहर जोशी से साफ कहा कि इनको हम टिकट नहीं देंगे.

डॉ जोशी ने नरेंद्र मोदी को फोन किया और मोदी से कहा कि अमित शाह मेरी सुन नहीं रहे हैं. इस पर नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह मेरी भी नहीं सुनेगा. अमित शाह ने जो फैसला कर लिया वह कर लिया.

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पार्टी में कठिन फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं अमित शाह

2014 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने जो प्रयोग किया वही प्रयोग 2017 के विधानसभा चुनाव में किया. मेरा मानना है कि 2014 में अमित शाह ने 100 फीसदी अपने विवेक का इस्तेमाल किया. पर इस चुनाव में अमित शाह ने 15 प्रतिशत उत्तर प्रदेश के नेताओं की भी सुनी है.

इस बार जहां-जहां बीजेपी ने उत्तर प्रदेश के नेताओं की सुना है वहां बीजेपी हारी है. जैसे, मान लीजिए लक्ष्मीकांत बाजपेयी की सीट. अमित शाह जानते थे कि लक्ष्मीकांत हार रहे हैं. लोगों के कहने पर अमित शाह ने उन्हें टिकट दिया. हुकूम सिंह की बेटी को भी टिकट बीजेपी के एक बड़े नेता की सिफारिश पर दिया गया है. धौलाना की सीट भी बीजेपी के एक बड़े नेता की सिफारिश पर दिया गया है.

तो मेरा मानना है कि इस बार के चयन में अमित शाह ने 15 प्रतिशत बात लोगों की भी सुनी है. अगर वह 100 प्रतिशत अपने हिसाब से चलते तो जीत का जो यह आंकड़ा है वह और बड़ा होता.

पिछले चुनावों में और इस चुनाव में फर्क यह है कि उत्तर प्रदेश में पहले बीजेपी के नेता इलाके और उम्मीदवार बांट लेते थे. यह बात सब लोग जानते हैं.

सामाजिक संरचना समझ कर बीजेपी उतरी थी चुनाव मैदान में

पहली बार बीजेपी नेताओं का इलाका और उम्मीदवार बांटने की परंपरा खत्म हो गई थी. एक-दो नेताओं की थोड़ी बहुत चली थी जिसका परिणाम आप देख ही रहे हैं.

BJP

उत्तर प्रदेश की जो सामाजिक संरचना है. उस सामाजिक संरचना को पहली बार बीजेपी ने समझने की कोशिश की है. इसी सामाजिक संरचना से उत्तर प्रदेश विधानसभा में राजनीतिक प्रतिनिधित्व हो सके इसकी एक कोशिश की गई है.

इसमें पोलराइजेशन वाला मामला नहीं है. बल्कि जो हमारे पास सूचना है मैं यह कहूंगा कि मुसलमानों के वोट का बड़ा हिस्सा और महिला, नौजवानों का वोट बीजेपी के लिए गया है.

हमलोग जब पिछड़े सवर्ण और अति पिछड़े के संदर्भ में बात करते हैं, तो सामाजिक संरचना वाली बात भूल जाते हैं. हम लोग ये मान कर चलते हैं कि हमारा जो समाज है वह सामंती समाज है और उस पर लोकतंत्र थोप दिया गया है.

ये कभी शायद सच रहा होगा लेकिन आज जो राजनीतिक चेतना का फर्क आया है. उसमें सबने ये देखा कि प्रधानमंत्री की दिलचस्पी गरीबों में है. और अगर प्रधानमंत्री पर भरोसा करें तो शायद ऐसा व्यक्ति आ सकता है जो केंद्र की योजनाओं को लागू करवा सकता है. जिससे प्रदेश की जनता को सीधा फायदा होगा.

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