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यूपी चुनाव 2017: सीएम चेहरा न होने से बीजेपी को हो सकता है नुकसान

यूपी के चुनावी नतीजों के बारे में सिर्फ एक बात पक्की है कि यहां कुछ भी पक्का नहीं.

Sreemoy Talukdar Updated On: Jan 06, 2017 11:24 AM IST

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यूपी चुनाव 2017: सीएम चेहरा न होने से बीजेपी को हो सकता है नुकसान

ओपिनियन पोल लोगों की राय होते हैं. भारत में ओपिनियन पोल अक्सर गलत साबित हुए हैं. ऐसे में उनकी उपयोगिता सिर्फ सोशल मीडिया और टीवी चैनल्स पर बहस के मुद्दे के तौर पर होती है. इसका यह मतलब नहीं कि हम रायशुमारी करने वालों की मेहनत को कम करके आंके या उनके राय जुटाने के तरीकों पर सवाल उठाएं.

कहने का मतलब है कि भारतीय वोटर की मानसिकता इतनी पेचीदा है कि किसी ओपिनियन पोल की बुनियाद पर उसके बारे में भविष्यवाणी करना खतरे से खाली नहीं. ऐसे में ओपिनियन पोल के आंकड़ों की तमाम तरह से व्याख्या की जा सकती है.

आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य यूपी के बारे में तो ये बात खास तौर से कही जा सकती है. चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव कराने का ऐलान किया है.

चुनाव के ऐलान के साथ ही परंपरा के मुताबिक यूपी को लेकर कई ओपिनियन पोल के नतीजे सामने आए हैं जो एक-दूसरे से काफी अलग हैं. एबीपी न्यूज के किए ओपिनियन पोल में समाजवादी पार्टी के जीतने के संकेत मिलते हैं. जबकि वो पांच साल से सत्ता में है और फिलहाल परिवार की लड़ाई से जूझ रही है. मगर एबीपी न्यूज का ओपिनियन पोल कहता है कि समाजवादी पार्टी इन चुनौतियों से उबरकर चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है.

इंडिया टुडे टीवी चैनल के ओपिनियन पोल में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने की भविष्यवाणी की गई है. दोनों ओपिनियन पोल में सिर्फ एक बात समान दिखती है और वो ये कि कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी बनकर उभरेगी.

भविष्यवाणी मुमकिन नहीं

ओपिनियन पोल के सैंपल से लेकर इसके करने के तरीकों तक कई ऐसी वजहें हैं जिनकी वजह से दोनों पोल में इतना फर्क दिखता है. इसकी एक और वजह है कि यूपी की राजनीति में इतने पेंच-ओ-खम हैं कि उन्हें असल नतीजों से पहले पढ़ना और सही भविष्यवाणी करना मुमकिन नहीं. इसकी इतनी आबादी है. वोटर इतने संप्रदाय, समुदाय और जाति-वर्ग में बंटे हैं कि वो एक जैसे नजरिए से वोट करेंगे, ये नामुमकिन है.

यूपी के मतदाता के बारे में राय बनाना आसान नहीं है

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हम यूपी को अक्सर देश का सबसे बड़ा राज्य कहते हैं. मगर सबसे बड़ा राज्य आखिर कितना बड़ा है? मशहूर अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट के मुताबिक अगर आज यूपी खुद को आजाद मुल्क घोषित कर दे तो आबादी के लिहाज से ये दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश होगा. मगर प्रति व्यक्ति आमदनी के लिहाज से ये बेहद गरीब राज्य है. इसकी अर्थव्यवस्था एक छोटे से देश कतर के बराबर की है.

इस राज्य में 403 विधायक और 80 सांसद चुने जाते हैं. ऐसे में, इतने बड़े राज्य में चुनावी समीकरण भी कई तरह के होते हैं. इसकी बुनियाद आमदनी का फर्क भी हो सकती है और सामाजिक आर्थिक स्थितियां, अलग समुदायों की आबादी, धर्म, संस्कृति और परंपरा हो सकती है. इसी वजह से यूपी इस बात के लिए बदनाम है कि महज ओपिनियन पोल के बूते इसके चुनावी नतीजों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती.

इन बातों की रोशनी में हम एबीपी-सीएसडीएस के ओपिनियन पोल को देखें तो ये कहता है कि समाजवादी पार्टी 30 प्रतिशत वोट के साथ 141 से 151 सीटें जीत सकती है. इस सर्वे में नोटबंदी का असर वोटर पर नहीं दिखता. इसके मुताबिक बीजेपी को 27 फीसद और मायावती को 22 प्रतिशत वोट मिलने की उम्मीद है.

समाजवादी पार्टी का विवाद

ये ओपिनियन पोल और इसके नतीजे इस उम्मीद पर टिके हैं कि समाजवादी पार्टी में टूट नहीं होगी. लेकिन अब तो इसकी उम्मीद बेहद कम है. चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी के दोनों गुटों को 9 जनवरी तक अपनी ताकत साबित करने को कहा है. इसके आधार पर ही आयोग तय करेगा कि पार्टी का चुनाव चिन्ह पिता मुलायम या बेटे अखिलेश को मिलेगा.

जिस तरह से दोनों पक्ष अपना रुख कड़ा किए हुए हैं, ऐसे में पार्टी के एक रहने की उम्मीद बेहद कम है. ऐसी सूरत में समाजवादी पार्टी के वोट बैंक यादवों और मुसलमानों में टूट के पूरे आसार हैं. इनके टैक्टिकल वोटिंग करने की उम्मीद है.

यानी मुसलमान उस उम्मीदवार को वोट देंगे जो स्थानीय बीजेपी प्रत्याशी को हरा सके. दूसरा मसला मायावती के ताकतवर होकर उभरने का है. ओपिनियन पोल में मायावती को हमेशा ही कम करके आंका गया है. लेकिन पब्लिक के बीच वो बेहतर कानून व्यवस्था और प्रशासन के लिए याद की जाती हैं. इन मोर्चों पर वो बाकी दलों से काफी आगे निकल जाती हैं.

समाजवादी पार्टी के अंदरुनी विवाद ने मतदाताओं को असमंजस में डाला है

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मायावती इस बार टिकट बंटवारे में भी नई रणनीति अमल में ला रही हैं. उनका निशाना इस बार ज्यादा से ज्यादा मुसलमानों को अपने पाले में लाने पर है. राज्य में मुस्लिम वोटर की तादाद 17 फीसद है. मायावती ने इस बार सौ से ज्यादा मुसलमानों को टिकट दिया है.

बीजेपी को पूर्ण बहुमत

वहीं इंडिया टुडे का बुधवार को जारी हुआ सर्वे बीजेपी को पूर्ण बहुमत की भविष्यवाणी करता है. इंडिया टुडे के मुताबिक नोटबंदी की वजह से बीजेपी को जबरदस्त चुनावी फायदा होगा. 35 लोगों की टीम ने ये सर्वे 12 से 24 दिसंबर के बीच किया था. इसमें आठ हजार चार सौ अस्सी लोगों की राय ली गई थी.

इंडिया टुडे के सर्वे में बीजेपी को 206 से 216 सीटें मिलने की उम्मीद जताई गई है. ये आंकड़ा अक्टूबर में हुए ऐसे ही सर्वे से 30 सीटें ज्यादा है. इस बार बीजेपी को जो ज्यादा सीटें मिल रही हैं वो नोटबंदी का नतीजा बताई जा रही हैं. इंडिया टुडे के सर्वे का दावा है कि इसमें शामिल 78 फीसदी लोग नोटबंदी के समर्थन में हैं. जबकि 58 प्रतिशत ने ये माना कि नोटबंदी की वजह से उन्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ी. सर्वे पर यकीन करें कि नोटबंदी का राजनैतिक असर इतना तगड़ा होगा कि इससे लोगों की शिकायतें ज्यादा मायने नहीं रखेंगी.

इंडिया टूडे की ओपिनियन पोल ने बीजेपी को बढ़त दी है

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हालांकि ये दावा कुछ ज्यादा ही दूर की कौड़ी लगता है. खास तौर से तब..जब अभी नोटबंदी की प्रक्रिया पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है और हम अभी भी 8 नवंबर के हालात तक पहुंचने से काफी दूर हैं.

अब जबकि चुनावों का ऐलान हो गया है और वोटिंग 11 फरवरी से शुरू होकर 8 मार्च तक चलेगी. इस दौरान वोटर का मिजाज और उसकी राय बदलने की पूरी उम्मीद है. ये नोटबंदी के समर्थन में भी हो सकती है और इसके खिलाफ भी. ऐसे में ओपिनियन पोल में नोटबंदी को लेकर जो राय जाहिर की गई है वो पूरी तरह बदल भी सकती है.

ओपिनियन पोल के नतीजे आने के बाद से ही बीजेपी के तमाम प्रवक्ता, वक्त से पहले ही जीत के दावे करने लगे हैं. मगर सच्चाई इस दावे से दूर और बेहद तल्ख भी हो सकती है. अगर बीजेपी को लगता है कि वो 2014 में मिले समर्थन को दोहरा सकती है तो ये तय कि उन्हें जबरदस्त झटका लगने वाला है. इसकी कई वजहें हैं.

पीएम का करिश्माई व्यक्तित्व

लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व पर जनादेश था, जिन्होंने शानदार जीत हासिल की थी. लोकसभा चुनाव में जाति और दूसरी पहचानों का फर्क मिट गया था. बीजेपी के कद्दावर नेता मोदी की निजी लोकप्रियता अभी भी कायम है. लेकिन वोटर को मालूम है कि वो देश के प्रधानमंत्री हो सकते हैं पर यूपी के मुख्यमंत्री नहीं बन सकते हैं.

जैसा कि हमने 2015 के बिहार चुनावों में देखा था जहां पीएम मोदी ने जमकर प्रचार किया था लेकिन वोटर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव के उम्मीदवारों में बहुत एहतियात से फर्क करता है.

इंडिया टुडे के सर्वे में एक बात और सामने आई थी. वो ये कि मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर अखिलेश यादव लोगों की पहली पसंद हैं. उन्हें 33 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन हासिल है.

Mayawati at a press conference

मायावती को प्रशासन और कानून व्यवस्था के मामले में बेहतर माना जाता है

सर्वे में मायावती को 25 फीसदी वोट मिले. बीजेपी की तरफ से राजनाथ सिंह को अगर मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया जाता है तो उन्हें 20 फीसदी लोगों का समर्थन मिल सकता है. मगर राजनाथ सिंह ने साफ किया है कि उन्हें यूपी के सीएम की रेस में शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है. कम से कम फिलहाल तो नहीं.

सर्वे के नतीजों से एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार न होने का बीजेपी को नुकसान हो सकता है.

असम में शानदार जीत

पिछले साल सर्वानंद सोनोवाल को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने असम के चुनावों में शानदार जीत हासिल की थी. अगर नोटबंदी को लेकर बीजेपी को समर्थन मिलता भी है तो उसे जीत में बदलने के लिए एक मजबूत राजनैतिक चेहरे की जरूरत होगी जो फिलहाल बीजेपी के पास यूपी में नहीं है. पार्टी के पास यूपी में ऐसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं दिख रहा. बीजेपी राज्य इकाई में आपसी झगड़े की वजह से ही पार्टी किसी नेता को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर नहीं पेश कर सकी है. ऐसे में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के सामने बड़ी चुनौती है.

फोटो. NarendraModi.in से साभार

असम में बीजेपी ने सीएम कैंडिडेट का नाम जाहिर कर अच्छा प्रदर्शन किया था

अभी चुनाव एक महीने दूर हैं. चुनाव के एजेंडे भी पूरी तरह से तय नहीं हैं. बीजेपी इस मोर्चे पर भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है. प्रधानमंत्री ने बीजेपी का एजेंडा विकास और भ्रष्टाचार से लड़ाई को बताया है. पिछले दिनों लखनऊ में हुई रैली में उन्होंने इसी बात पर जोर दिया था.

मगर यूपी के राजनैतिक मैदान में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से वोटों का बड़ा फायदा होता है. चाहे वो बीजेपी हो या उसके विरोधी, दोनों पक्षों को ध्रुवीकरण का फायदा मिलता है. ऐसे में ये देखना होगा कि क्या बीजेपी सिर्फ विकास के मुद्दे के बूते जीत की पटकथा लिखने को तैयार है.

फिलहाल तो यूपी के चुनावी नतीजों के बारे में सिर्फ एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है वो ये कि यहां कुछ भी पक्का नहीं  है.

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