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यूपी की इस सीट को जीतने पर बनती है सरकार

उत्तर प्रदेश के चुनावी महाभारत की चाल हस्तिनापुर ही तय करेगी

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: Feb 09, 2017 09:06 AM IST

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यूपी की इस सीट को जीतने पर बनती है सरकार

एक बार फिर उत्तर प्रदेश के चुनावी महाभारत की चाल हस्तिनापुर ही तय करेगी. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 11 फरवरी को 77 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है.

इनमें पौराणिक महत्व की हस्तिनापुर सीट भी शामिल है, जिसका राज्य की सत्ता से अनोखा रोचक संबंध है. प्रधानमंत्री मोदी और उनके सबसे बड़े सिपहसालार अमित शाह, बीजेपी का भाग्य चमकाने के लिए जिला दर जिला सभाएं और रैलियां कर रहे हैं.

पर चुनावी जमीन से जो खबरें आ रही हैं, उनसे बीजेपी की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं और उनके जाट धुरंधर केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, सांसद हुकुम सिंह, विधायक संगीत सोम और सुरेश राणा को अपनी साख बचाने के लाले पड़ गए हैं.

ये धुरंधर ही बीजेपी के मुजफ्फरनगर-कैराना मॉडल राजनीति के सूत्रधार माने जाते हैं और इनके आसरे ही इस चरण की 77 में से 45-50 सीटों पर जीतने का सपना अमित शाह-मोदी ने संजोया है. इन सीटों में से कम से कम 50 सीटों पर जाटों का दबदबा है. यहां बनिये, ठाकुर और पिछड़े वर्ग के सैनी भी बड़ी संख्या में हैं. इनमें बनियों और सैनी अरसे से बीजेपी के परंपरागत वोटर और समर्थक हैं.

बीजेपी की प्रयोगशाला

2014 के लोकसभा चुनावों के पहले से ही बीजेपी जाटों के बीच अपना जनाधार बढ़ाने के लिए जी-जान से लगी हुई है. 2013 में मुजफ्फरनगर  में जाट-मुस्लिम दंगा हुआ, जिसमें 80 लोग मारे गए, सैकड़ों जख्मी हुए और भारी तादाद में लोग बेघर हो गए.

उन्हें लंबे समय तक राहत शिविरों में रहना पड़ा. इससे जाट-मुस्लिम गठजोड़ एकाएक टूट गया जो लोकदल का मुख्य वोट बैंक था. पर इस सांप्रदायिक तनाव का भारी लाभ बीजेपी को लोकसभा चुनावों में मिला और तकरीबन 45% वोट पा कर उसने यहां से सपा,बसपा, राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस का सिरे से सफाया कर दिया.

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2014 में जाट बाहुल क्षेत्र कैराना और कांधला से सैकड़ों हिंदू परिवारों के पलायन की खबरें आईं. यहां के बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने पलायन करने वाले सैकड़ों हिंदू परिवारों की कई सूची जारी कीं और मामले को गरमा दिया.

यह मसला अरसे तक सुर्खियों में बना रहा. बीजेपी ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है और अपने चुनाव घोषणापत्र में इसे प्रमुखता से शामिल किया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन दुखद घटनाओं ने जाटों को बीजेपी के पीछे लामबंद कर दिया.

2015 में दादरी में अखलाक की हत्या और मांस विवाद ने भी बीजेपी के मंसूबों का भारी विस्तार किया और सांप्रदायिकता को गरमाए रखने के लिए उसने कोई कसर नहीं छोड़ी.

इन 77 सीटों पर औसतन 17% जाट हैं और 26% मुसलमान. इन दोनों दलों की यहां के सबसे बडे़ नेता चौधरी चरण सिंह की राजनीति ताकत थी. दलितों के जबरिया वोट लेने के तमाम किस्से यहां गांव-गांव में आज भी सुनने को मिलते हैं.

जाटों के बीच बने बीजेपी के प्रबल जनाधार में इस क्षेत्र के जीत के परपंरागत राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया, जिसकी बानगी लोकसभा चुनावों में देखने को मिली.

बीजेपी को भी उम्मीद थी कि इस शानदार सफलता को विधानसभा चुनाव में अपने मुजफ्फरनगर-कैराना के राजनीतिक मॉडल और रणनीति के बूते दोहरा पायेगी और अरसे बाद उत्तर प्रदेश की बागडोर उसके हाथ में आ जायेगी. पर अब उसके 300 सीटों पर जीतने का हसीन ख्वाब बिखरता नजर आ रहा है.

केवल जाट ही नहीं बिफरे हैं

चुनावों से ऐन पहले तक बीजेपी को सपने में भी गुमान नहीं था कि जाट बीजेपी से मुंह फेर लेंगे. और इसी गुमान के चलते बीजेपी ने राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया जिनकी परपंरागत रूप से इस क्षेत्र में जाटों और मुसलमानों में गहरी पैठ रही है.

चुनावों पर नजदीकी नजर रखने वाले रिपोर्टर इसकी कई वजह गिनाते हैं. इनमें सबसे बड़ी वजह बनी चौधरी चरण सिंह की अवहेलना. जाट आज भी चौधरी चरण सिंह को भगवान तुल्य मानते हैं. किसानों को, पिछड़ों को लामबंद करने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका है. केंद्र सरकार ने दिल्ली में उस बंगले को उनके पुत्र और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह से खाली करवा लिया, जिसमें चौधरी चरण सिंह अरसे तक रहे थे.

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जाटों को मोदी सरकार की यह जबरिया कार्रवाई नागवार गुजरी. तमाम लोगों को यह वजह हास्यास्पद लग सकती है पर जाट समुदाय लाभ-हानि से ज्यादा भावनाओं से वशीभूत रहता है.

2013 के दंगे में कई जाट मुकदमों में फंस गये थे. पर उन्हें अपने बचाव में बीजेपी के जाट धुरंधरों से कोई कारगर मदद नहीं मिली और उन्हें उनके मुकद्दर पर जूझने के लिए अकेला छोड़ दिया गया.

बाकी कसर नोटबंदी ने पूरी कर दी. सबको मालूम है कि जाट मूलत: किसान है और इनमें बड़े किसानों संख्या भी कम नहीं है. इस क्षेत्र में गन्ना प्रमुख फसल है और गन्ना भुगतान की समस्या जमाने से किसानों को परेशान करती है.

मोदी सरकार ने गन्ना भुगतान कराने के लिए कोशिशें भी कीं, लेकिन किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ और अब मोदी सरकार से उनका मोहभंग हो गया. नोटबंदी के फैसले से किसानों को भारी नुकसान हुआ. उन्हें खरीफ की भरपूर फसल का लाभ नहीं मिल पाया और औने-पौने दामों में उन्हें अपनी फसल बेचनी पड़ी.

नोटों की किल्लत के चलते साग-सब्जी की पैदावार में किसानों को 15-20 हजार रुपए प्रति एकड़ नुकसान हुआ है. इन सब कारणों से अधिसंख्या जाट बीजेपी से बिदक गए हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में कारोबार भी काफी है. खासकर मेरठ, सहारनपुर में नक्काशी कारोबारी हैं, जिनमें बनियों का वर्चस्व है, लेकिन नोटबंदी से यहां के व्यापारी भी भरे बैठे हैं.

मेरठ में व्यापारियों ने अमित शाह की सभा-रैली का बहिष्कार ही कर दिया, सीटें खाली रह गईं. नतीजतन अमित शाह को अपना रोड शो रद्द करना पड़ा. यह वर्ग अरसे से बीजेपी का प्रबल समर्थक रहा है. केंद्रीय मंत्री वीके सिंह के दलित विरोधी वक्तव्यों से दलितों में भी नाराजगी है.

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2014 के लोकसभा चुनाव में दलितों का एक बड़ा हिस्सा बीएसपी को छोड़ बीजेपी से जुड़ा था. बाद में भी बीजेपी ने इन्हें अपने साथ रखने की भारी मशक्कत की हो पर मायावती की रैलियों में आ रही भारी भीड़ देख कर यह माना जा रहा है कि दोबारा से दलित बड़े पैमाने पर मायावती के पीछे एकजुट हो रहे हैं. 2014 के चुनावों में मायावती के वोट घट कर 18% रह गये थे, जो कई चुनावों में 24-25% बने हुए थे.

सवर्णों के नाराज होने का एक बड़ा कारण और भी है. बीजेपी की राजनीति में सवर्णों का दबदबा रहा है. बीजेपी की जिला इकाइयों में 80-90% मुखिया सवर्ण होते थे. अमित शाह की नई रणनीति के चलते अब इन पर पिछड़ों का कब्जा है.

इनमें ठाकुरों, बनियों की संख्या में भारी कमी आई है. अब बीजेपी की उम्मीद मतों के बंटवारे पर आकर सीमित हो गयी है. यदि बीजेपी विरोधी वोट बड़े पैमाने पर बंट जाते हैं, तब कम वोट पा कर भी बीजेपी की चांदी हो सकती है.

हस्तिनापुर से तय होती है चाल

पौराणिक स्थल हस्तिनापुर से जो दल जीतता है, उस दल की ही राज्य में सरकार बनती है. शुरू से इसका सत्ता से बड़ा रोचक और अटूट संबंध है. 2007 में बीएसपी जीती, तो मायावती मुख्यमंत्री बनीं. 2002और 2012 में सपा जीती, तो उनकी सरकार बनी.

1996 में इस सीट से निर्दलीय जीता तो राज्य में किसी को भी बहुमत नहीं मिला और काफी समय तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा. 1967 में यहां पहली बार गैर-कांग्रेसी जीता, तो सूबे में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी. पर 1989 के बाद से यहां कोई कांग्रेसी नहीं जीत पाया है, तब से कांग्रेस राज्य में सत्ता सुख से वंचित है.

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