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बीजेपी मुसलमानों की दुश्मन नहीं है: राष्ट्रीय उलामा काउंसिल अध्यक्ष

आरयूसी अध्यक्ष मौलाना रशादी का मानना है, बीजेपी से हमारी दुश्मनी नहीं है न ही सेक्युलर कही जाने वाली पार्टियों से कोई दोस्ती

Tufail Ahmad Updated On: Mar 07, 2017 09:13 AM IST

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बीजेपी मुसलमानों की दुश्मन नहीं है: राष्ट्रीय उलामा काउंसिल अध्यक्ष

साल 2008 में चर्चित बाटला हाउस एनकाउंटर मामला हुआ था. इस घटना के बाद राजनीतिक दल राष्ट्रीय उलामा काउंसिल अस्तित्व में आया.

तब इस दल में यूपी के आजमगढ़ जिले से ताल्लुक रखने वाले कई मुस्लिम युवाओं का नाम शामिल था. हालांकि ये पहचान अब भले पुरानी पड़ चुकी हो, लेकिन इस सियासी संगठन को लेकर प्रसंग अब नया है. क्योंकि यूपी के मौजूदा विधानसभा चुनाव में यह पार्टी बहुजन समाज पार्टी को समर्थन दे रही है.

इस बात के कई संकेत भी मिल रहे हैं कि दीदारगंज, निजामाबाद और गोपालपुर विधानसभा सीटों से राष्ट्रीय उलामा काउंसिल समर्थित बीएसपी उम्मीदवारों की चुनाव में जीत हो सकती है. हालांकि ये तीनों सीटों कभी समाजवादी पार्टी का गढ़ हुआ करती थी.

समाजवादी पार्टी खेमे में राष्ट्रीय उलामा काउंसिल का खौफ किस कदर हावी है यह इसी बात से समझा जा सकता है कि, आजमगढ़ में 3 मार्च यानी मतदान से ठीक एक दिन पहले ऊर्दू अखबार 'रोज़नामा इंकलाब' न्यूजस्टैंड से गायब हो गए.

आरयूसी अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि 'हो सकता है कि समाजवादी पार्टी ने ही अखबार को यहां पहुंचने देने से रोका हो. क्योंकि हमलोगों ने इसमें एक विज्ञापन दिया था'.

क्या है आरयूसी के नेता की राय

इससे पहले आरयूसी यूपी, दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में हिस्सा लेकर अपनी सियासी जमीन तलाशने का काम कर चुकी है. हालांकि इस बार पार्टी ने अपने उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारा है.

बल्कि पार्टी बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन कर रही है. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में आरयूसी (राष्ट्रीय उलामा काउंसिल) का राजनीतिक जमीन तलाशना जितना महत्वपूर्ण नहीं है, उससे कहीं ज्यादा अहम है इसके नेता मौलाना आमिर रशदी की सोच और राय.

आजमगढ़ के जामएतुर रशद मदरसा में आरयूसी अध्यक्ष ने ऐलान किया कि ’हमारी राजनीति में बीजेपी न ही हमारी दुश्मन है. और न ही जिन पार्टियों को सेक्युलर कहा जाता है वो हमारी दोस्त हैं.'

उन्होंने कहा कि 'जो सियासी दल हमें हमारा हक दिलवाने में मदद करेगा वही हमारे दोस्त हैं. आगे उन्होंने कहा कि, 'सिर्फ एक दंगे की वजह से मोदी हमारे दुश्मन क्यों हैं? जबकि अखिलेश के राज में सैकड़ों दंगे हुए, बावजूद वो हमारे दुश्मन नहीं हैं'.

रशादी का मानना है कि समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन यूपी में मुसलमानों के साथ एक साजिश है.

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

राष्ट्रीय उलामा काउंसिल पहले एक एनजीओ हुआ करती थी. शुरुआत में स्थानीय हिंसा के मामलों में आजमगढ़ के युवाओं का नाम आने पर यह संगठन उन्हें न्याय दिलवाया करती थी.

बाद में जैसे जैसे आजमगढ़ के युवाओं का नाम आतंकी मामलों में भी पनपने लगा तो आरयूसी ने भी अपना दायरा बढ़ाना शुरू किया. यह संगठन हर वर्ष बाटला हाउस एनकाउंटर की सालगिरह दिल्ली में आयोजित करता है.

रशादी का मानना है कि आतंकी मामलों में सरकार के इशारे पर आजमगढ़ के युवाओं का नाम घसीटा जाता है. ऐसा कर सियासी दल अपना उल्लू सीधा करते हैं.

सीरिया से भारतीय मूल के जिहादियों के हाल के वीडियो मैसेज का हवाला देने के बावजूद रशादी इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि, आतंकी मामलों में किसी भी मुस्लिम युवा का हाथ हो सकता है. रशादी का तर्क है कि, 'सरकार पहले मुस्लिम युवाओं को फर्जी आतंकी मामलों में फंसाती है. फिर हिंदुओं के ऊपर फर्जी मुकदमा चलवाती है.

रशादी का कहना है कि 'इस देश में ना तो हिंदू और न ही मुसलमान आतंकी हैं. यहां सिर्फ सरकारें आतंकवादी हैं. जो अपने सियासी फायदे के लिए हिंदू और मुसलमानों को गलत तरीके से फंसाती है.

'रशादी की राय से कई लोगों की राय मिलती है. खास कर तब जबकि हाल ही में पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम पर मुस्लिम समुदाय की भावना को इस्तेमाल करने के लिए इशरत जहां मामले से संबंधित एफिडेविट से छेड़छाड़ करने का आरोप लगा था.

सेक्युलरिज्म के बारे में रशीद की राय

आरयूसी अध्यक्ष : मौलाना रशादी

आरयूसी अध्यक्ष : मौलाना रशादी

हालांकि आरयूसी एक मुस्लिम पार्टी है. लेकिन रशादी के तर्क भारतीय मुसलमानों की पारंपरिक सोच को चुनौती देते हैं. रशादी उन मुस्लिम धर्मगुरुओं की आलोचना करते हैं जो ताकत और पैसे के लिए राजनीतिक पार्टियों का समर्थन करते हैं.

रशादी भारतीय सियासत में कथित तौर पर 'क्षद्म सेक्युलरिज्म' की भी भरपूर आलोचना करते हैं. 'सच्चर कमेटी' की रिपोर्ट को भी रशादी फर्जी बताते हैं. उनकी सोच और उनका तर्क उन्हें दूसरे मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं से कहीं अलग करती है.

इस बात पर जोर देते हुए कि ऐसे सियासी दल 'क्षद्म सेक्युलरिज्म' को बढ़ावा देती हैं वो कहते हैं कि “सच्चर कमेटी रिपोर्ट में कोई सच्चाई नहीं है.' इसे मुसलमानों की सोच पर पहरेदारी बिठाने के मकसद से तैयार किया गया है. उनमें खौफ की भावना भर जाए इस लिए तैयार किया गया है.

सेक्युलर पार्टियां हमें बीजेपी का दुश्मन बना कर इससे सियासी रोटियां सेक रही हैं. हमें इसे तोड़ना होगा. वो ये बात मानने से भी इंकार करते हैं कि मुसलमानों में कोई बुद्धिजीवी है.

रशादी कहते हैं कि “मैं उन्हें खोज रहा हूं. वो कहां हैं? कथित रूप से जो बुद्धिजीवी हैं उन्होंने इस बात का कॉन्ट्रैक्ट ले रखा है कि वो अहसास-ए-कमतरी (कमजोर होने की मानसिकता) पैदा कर सकें.

रशादी का कहना है कि मुस्लिमों को जितना पिछड़ा माना जाता है वो उतने पिछड़े नहीं हैं. उनका तर्क है कि मुसलमान 100 फीसदी साक्षर हैं. क्योंकि हर मुसलमान गरीब या अमीर, इस बात को जरूर सुनिश्चित करता है कि उनके बच्चे कुरान पढ़ें और कुरान पढ़ना पूरी तरह साक्षर होने की गारंटी है.

रशादी के दृष्टिकोण में सच्चा मुस्लिम नेतृत्व इस बात में निहित है कि एक हिंदू, मुख्यमंत्री या फिर नेता बने. उनके विचार काफी क्रांतिकारी माने जा सकते हैं. खास कर तब जबकि मुसलमान किसी गैर मुसलमान के साथ सत्ता बांटने में यकीन नहीं रखते.

यही वजह है कि पाकिस्तान ने संवैधानिक रूप से वहां की सत्ता पर किसी गैर मुस्लिम नागरिक के काबिज होने की व्यवस्था को ही खत्म कर दिया है.

रशादी तर्क देते हैं कि बिहार में कई मुस्लिम नेता हैं जो मुख्यमंत्री बन सकते हैं. लेकिन नीतीश कुमार ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने नहीं दिया. आरयूसी अब अगला विधानसभा चुनाव बिहार में लड़ेगी. रशादी ये सवाल पूछते हैं कि 'नीतीश सेक्युलर कैसे हैं? क्या वो पूजा नहीं करते?'

रशादी असल में एक मुस्लिम धर्मगुरु हैं. जो आजमगढ़ में जमाएतुल रशाद नाम का मदरसा चलाते हैं. और मस्जिद में की जाने वाले प्रार्थना का नेतृत्व करते हैं. जबकि मदरसा के बिल्डिंग में कई तरह की शिक्षण संस्थानें चल रही हैं.

मदरसा के परिसर में एक मस्जिद, अंग्रेजी और हिंदी भाषा में आठवीं ग्रेड तक दो मिडिल स्कूल, एक अंग्रेजी माध्यम का हाई स्कूल, लड़के और लड़कियों के लिए अलग अलग दो अरबी पढाए जाने वाला मदरसे, जो अलामियत (ग्रेड 12 तक) और फजीलत (बीए डिग्री) की डिग्री देते हैं. कुल मिलाकर इस मदरसे में करीब 2000 बच्चे पढ़ते हैं.

हालांकि रशादी पूरी तरह से एक धार्मिक नेता हैं लेकिन उनकी सियासत भारतीय मुसलमानों को एक नया दृष्टिकोण देती है. उनका सबसे मजबूत तर्क यही है कि मुसलमानों को सच्चा मुसलमान बनना चाहिए. और बस इसी गुण से गैर मुसलमान उनके साथ खड़े रहेंगे.

Muslims shout slogans as they take part in a rally demanding increase in allowances for clerics and opposing the Indian government's move to change the Muslim Personal Law, according to a media release, in Kolkata

मुसलमान मतदाता के मुद्दे भी आम वोटरों जैसे ही हैं

वो कहते हैं कि 'एक मुसलमान को खुद की चिंता करनी चाहिए. उसे अच्छा मुसलमान बनना चाहिए. ऐसे में दूसरे देश भी उनका समर्थन करने लगेंगे.'

लेकिन रशादी को जब इस बात की याद दिलाई जाती है कि नेता सिर्फ साफ सुथरी छवि की बदौलत ही आगे नहीं बढ़ सकते. तो रशदी इस लेखक को तर्क देते हैं कि, 'बतौर स्वतंत्र पत्रकार जैसा आपने अपने कर्मों के जरिए अपना मुकाम बनाया. ठीक उसी तरह आरयूसी के नेता भी अपनी अच्छी राजनीति की बदौलत अपनी पहचान कायम करेंगे.'

जब उनसे पूछा गया कि क्या आपके तर्कों से बीजेपी को फायदा और भारत के मुस्लिम नेताओं की मुस्लिम एकता की अपील को नुकसान नहीं पहुंचेगा. इस पर रशादी का जवाब था, 'बंटे हुए हिंदू अगर सरकार बना सकते हैं, तो बंटे हुए मुसलमान सरकार क्यों नहीं बना सकते?'

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