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शाह-मोदी का मॉडल छीन लेगा अखिलेश-मायावती के कुर्सी का सपना?

2014 की जीत के बाद से ही अमित शाह यूपी में संगठन को मजबूत करने में लगे हुए हैं.

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Feb 26, 2017 09:52 AM IST

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शाह-मोदी का मॉडल छीन लेगा अखिलेश-मायावती के कुर्सी का सपना?

बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह मानते हैं कि किसी भी कामयाबी के साथ कुछ नुकसान जुड़े होते हैं. इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव में शानदार कामयाबी के साथ ही अमित शाह, उत्तर प्रदेश में बीजेपी के संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव करने लगे थे. इसका मकसद 2014 के चुनाव में मिली कामयाबी के साथ आए नुकसान को कम करना था.

जमीनी स्तर पर शुरू हुआ काम

अमित शाह ने जमीनी स्तर पर इंकलाबी बदलाव लाने के लिए कई कदम उठाए हैं. पार्टी की राज्य इकाई को कहा गया था कि वो ऐसे 25 कार्यकर्ताओं की पहचान करें, जिन्हें राज्य के करीब डेढ़ लाख चुनाव बूथ पर तैनात किया जा सके. ये ऐसा तरीका था जो बीजेपी और संघ के चुनाव लड़ने के संगठनात्मक तरीके से एकदम अलग था.

बीजेपी के पदाधिकारी बताते हैं कि ये 25 कार्यकर्ता इलाके की आबादी के हिसाब से चुने गए थे. पहले जहां केवल हिंदुत्व से जुड़ाव रखने वाले लोगों को बूथ पर तैनात किया जाता था. वहीं इस बार अलग-अलग जातियों के युवाओं को चुनकर उन्हें बूथ मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी गई.

राज्य स्तर के पदाधिकारियों ने बूथ लेवल से लेकर ब्लॉक लेवल तक के कार्यकर्ताओं के साथ सौ से ज्यादा बैठकें कीं. इसका मकसद था कि राज्य स्तर के पदाधिकारियों को जमीनी हालात की सटीक जानकारी रहे. साथ ही अमित शाह ने अलग-अलग जातियों के नेताओं से मुलाकात करके, पार्टी के संगठन को एकदम नया रूप देने की कोशिश की.

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बिठाए गए जातीय समीकरण

मिसाल के तौर पर राजभर, नोनिया, निषाद और कुर्मी समुदाय के नेताओं से मिलकर अमित शाह ने उन्हें समझाया कि सत्ता में आने पर पार्टी उनका हक देगी. ताकि वो पार्टी के लिए काम करें.

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बीजेपी के हक में एक बात और गई कि प्रधानमंत्री मोदी भी पिछड़ी जाति के हैं. साथ ही अमित शाह ने अपनी रणनीति से पिछड़े वर्ग को ये संदेश देने की कोशिश की कि वो भी पिछड़े वर्ग के भले की ही राजनीति कर रहे हैं.

पिछड़े वर्ग की राजनीति में यादवों का दबदबा रहा है. बाकी जातियां सत्ता में भागीदारी हासिल करने की रेस में पिछड़ गई हैं. साथ ही जाटों ने भी अपनी ताकत के बूते सत्ता में हिस्सेदारी हासिल कर ली. इसीलिए अमित शाह ने इस बार गैर यादव पिछड़ी जातियों को बीजेपी से जोड़ने की रणनीति पर काम किया है. इसी मकसद से एक गैर यादव केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.

बीएसपी के वोटबैंक में सेंध

पिछड़े वर्ग के वोटरों में सेंध लगाने के अलावा बीजेपी ने गैर जाटव दलितों को भी पार्टी से जोड़ने के लिए काफी कोशिश की है. ये तबका आम तौर पर बीएसपी को वोट देता रहा है. चूंकि बीएसपी में गैर जाटव दलितों को बराबर की हिस्सेदारी नहीं मिली. इसीलिए उन्हें बीजेपी में उम्मीद की एक किरण दिख रही है. इसीलिए वो बीजेपी के हिंदूवादी एजेंडे की तरफ झुके.

पूरे प्रदेश में वाल्मीकि, खटिक और पासियों को बीजेपी की राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की गई. ताकि मायावती के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके. पिछले ढाई साल में एक तरफ तो बीजेपी तमाम जातीय समीकरणों के हिसाब से अपनी राजनीति को ट्यून करने की कोशिश करती रही. वहीं, दूसरी तरफ पार्टी ने महिलाओं और युवाओं को अपने साथ लाने की कोशिश भी जारी रखी.

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पार्टी के प्रवक्ता डॉक्टर चंद्रमोहन इस बदलाव पर कहते हैं,

हमने राज्य के पार्टी संगठन में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव पहले कभी नहीं देखा था, न हमने जनता से जुड़ने की इतनी बड़ी पहल देखी थी.

डॉक्टर चंद्रमोहन बताते हैं कि बीजेपी ने 88 यूथ कांफ्रेंस कीं, 77 महिला कांफ्रेंस कीं. साथ ही पिछड़े वर्ग के लोगों के साथ 200 बैठकें कीं. साथ ही पिछले छह महीने में चार परिवर्तन यात्राएं भी आयोजित की गईं.

Noida: BJP President Amit Shah along with Union Minister Mahesh Sharma and BJP's candidate from Noida Pankaj Singh at an election rally in Sector 43 in Noida on Sunday. PTI Photo(PTI2_5_2017_000198B)

सोशल मीडिया बना सहारा

पहले दौर के मतदान के बाद ही जमीनी स्तर पर बीजेपी की मशीनरी का दबाव साफ दिखा. पार्टी संगठन ने पहले राउंड की वोटिंग के बाद ही लोगों से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया पर बड़ा अभियान छेड़ा. फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पार्टी का संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई. इसके जरिए उन मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की गई जो अभी तक तय नहीं कर पाए थे कि वो किसे वोट देंगे. पहले दौर के बाद ही मतदाताओं का ध्रुवीकरण साफ तौर पर दिख रहा था.

बीजेपी की इस शानदार रणनीति के बरक्स जब हम अखिलेश यादव और मायावती के प्रचार अभियान देखते हैं तो वो फीके नजर आते हैं. तीनों के बीच फर्क साफ दिखता है. अखिलेश के प्रचार में शोर ज्यादा दिखता है, तो मायावती की पार्टी के पास संसाधनों की कमी झलकती है. शायद बीएसपी पर नोटबंदी का काफी असर हुआ है.

सपाइयों को नहीं भा रहा कांग्रेस-सपा गठबंधन का साथ

ऐसे संकेत हैं कि कांग्रेस के साथ गठबंधन से समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता बहुत खुश नहीं हैं. वो मुलायम और शिवपाल को दरकिनार किए जाने से पहले ही काफी निराश थे. शिवपाल की गैरमौजूदगी ने समाजवादी पार्टी के काडर पर गहरा असर डाला है क्योंकि शिवपाल ने ताउम्र संगठन को संभालने का ही काम किया था. उनकी गैरमौजूदगी में समाजवादी पार्टी का संगठन दिशाहीन मालूम देता है.

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वहीं कांग्रेस तो समाजवादी पार्टी की लोकप्रियता का फायदा उठाने की कोशिश करती ही मालूम होती है. लेकिन बुंदेलखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीएसपी के वफादार कार्यकर्ता, बीजेपी को तगड़ी चुनौती दे रहे हैं.

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बिहार में नीतीश और लालू की जोड़ी ने बीजेपी के लिए चुनावी लड़ाई को बेहद मुश्किल बना दिया था. लेकिन यूपी में अखिलेश और राहुल की जोड़ी का लोग मजाक उड़ाते हैं, उन्हें बेरुखी से देखते हैं. अपने 'काम बोलता है' के नारे वाले प्रचार अभियान के बावजूद अखिलेश यादव में वो करिश्मा नहीं दिखता, जो नीतीश कुमार में है. क्योंकि नीतीश कुमार की छवि अच्छे प्रशासक की रही थी. वहीं राहुल गांधी को तो गंभीर नेता ही नहीं माना जाता.

साफ है कि 2014 की जीत के बाद पार्टी को जो नुकसान होना था, बीजेपी उसकी भरपाई अपने संगठन के बूते करना चाह रही है. लेकिन जब 11 मार्च को चुनाव के नतीजे आएंगे, तो शायद बीजेपी को संगठन के मोदी-अमित शाह मॉडल की नए सिरे से और गहरी समीक्षा की जरूरत होगी.

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