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सोशल इंजीनियरिंग का ‘एडवांस्ड वर्जन’ कई वोटबैंक के सर्वर करेगा डाउन ?

मुस्लिम वोटर के अलावा ये तबका चुनाव में बड़ी भूमिका रखता है. बीजेपी इन्ही जातियों पर पकड़ बनाने की गोलबंदी में जुटी हुई है.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Feb 27, 2017 02:03 PM IST

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सोशल इंजीनियरिंग का ‘एडवांस्ड वर्जन’ कई वोटबैंक के सर्वर करेगा डाउन ?

साल 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन पर बीजेपी हाशिए पर पहुंच चुकी थी. अपने चेहरे के दम पर पार्टी को जिताने वाला एक भी चेहरा जनता के दिमाग में अपनी छाप नहीं छोड़ पा रहा था.

गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जब बीजेपी ने पीएम उम्मीदवार घोषित किया तो इतिहास के पन्ने अवचेतन में डरा रहे थे. 272 के जादुई आंकड़े को हासिल करने पर सवाल उठ रहे थे. केंद्र में दस साल से जमी हुई यूपीए सरकार को हराना असंभव दिखाई दे रहा था.

मोदी लहर में बह गए थे विरोधी

कयास ये थे कि एनडीए का गठबंधन बहुत रो-धो कर 150 के पार सीट ले भी आए तो सरकार बनाने के लिये समर्थन कहां से लाएगा. ऐन मौके पर जनता दल यूनाइटेड का एनडीए के साथ अलग होना शुरुआती झटका था. वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के नाम पर पार्टियां कम्यूनल कार्ड खुल कर खेल रही थीं.

manmohan singh-narendra modi

खुद तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने कहा था कि बीजेपी के केंद्र में आने से खून की नदियां बह जाएंगी. उनका निशाना नरेंद्र मोदी ही थे. सभी पार्टियों की चुनावी प्रचार की दिशा और रणनीति ही नरेंद्र मोदी को टारगेट करने में जुटी हुई थीं.

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ऐसे हालातों में यूपी से सीटें निकालना तूफान से कश्ती निकालने जैसा था. माना जा रहा था कि यूपी में बीजेपी 40-45 सीटें ही मिलेंगी. लेकिन जब मतगणना हुई तो जो हुआ वो करिश्मा आज भी सबको याद है. अमित शाह बीजेपी के नए चाणक्य बन कर उभरे.

मोदी लहर में सियासत के समंदर में सीना तानकर खड़ा यूपीए-कांग्रेस का टाइटैनिक ऐसा डूबा कि उसका वोट बैंक बीजेपी के टापू की तरफ बह चला.

कहा जाता था कि यूपी में मुसलमान और दलित-ओबीसी के होते ब्राम्हण-बनियों की पार्टी बीजेपी का बंटाधार होगा. लेकिन नतीजों से पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में था. बीजेपी 25 साल पुराने गठबंधन की राजनीति को पीछे छोड़कर पूर्ण बहुमत में आई. सबसे ज्यादा सीटें यूपी ने दीं.

राम मंदिर से बड़ी ‘मोदी लहर’ में सारे सोशल इंजीनियरिंग धराशायी हो गए. मुलायम सिंह को यादवों ने छोड़ा तो बहनजी को ब्राम्हण और दलितों ने भी छोड़ कर बीजेपी को वोट दिया. बीजेपी को जाटव, हरिजन, कुर्मी पटेल, बिंद मल्लाह, राजभर, कोइरी और ब्राम्हण-भूमिहार-बनियों के जम कर वोट मिले. परिणामस्वरूप बीजेपी को 71 सीटें मिलीं.

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लेकिन बीजेपी के लिये सबसे बड़ी कामयाबी ये भी थी कि ओबीसी का वोटबैंक उसकी तरफ मुड़ा.

बीजेपी की रणनीति अब सोशल इंजीनियरिंग

साल 2012 के विधानसभा चुनाव तक यूपी में बीजेपी को लेकर राजपूत, कुर्मी, कोइरी उदासीन थे. लेकिन मोदी लहर में सब कुछ बदल गया.

यहीं से शुरु होता है बीजेपी के मॉडर्न सोशल इंजीनियरिंग के अध्याय का पहला पन्ना. ओबीसी का बड़ा वोट शेयर बीजेपी के हिस्से में जा मिला. अब विधानसभा चुनाव में बीजेपी की रणनीति सोशल इंजीनियरिंग के जरिये 30 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करने की है.

BJP Supporters

(फोटो: पीटीआई)

बीजेपी ये जानती है कि उसे हराने के लिये मुस्लिम वोटर कोई कसर नहीं छोड़ेगा. लेकिन असम की जीत से बीजेपी ने ये पाठ सीखा है कि बिना मुस्लिम वोटर के भी वो चुनाव जीत सकती है.

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साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी से एक भी मुसलमान सांसद नहीं जीता. मजेदार बात ये है कि बीजेपी विरोधी वोटर कहलाने के बावजूद बीजेपी को 2014 के चुनाव में यूपी में 8 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे.

यूपी में साल 2012 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल वाली 73 सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 35 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि बीएसपी को 13 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं. उसके बावजूद बीजेपी इन सीटों पर 17 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी.

यूपी में यादव, जाटव और मुस्लिम मिलाकर 35 प्रतिशत हैं. लेकिन बीजेपी की नजर बाकी 65 प्रतिशत जातियों पर है. अगर 35 प्रतिशत भी साथ आ गईं तो फिर सरकार बनाने से कौन रोक पाएगा ?

बिना यूपी दिल्ली में बैठना मुश्किल

यूपी में 25 प्रतिशत सवर्ण, 10 प्रतिशत यादव, 26 प्रतिशत ओबीसी और 21 प्रतिशत दलित हैं. बीजेपी ओबीसी और अति पिछड़ों को अपने पाले में लाने में जुटी हुई है. कुर्मी, कुशावाह, मौर्या, प्रजापति,केवट, लोध, बघेल और पाल जैसी पिछड़ी जातियों पर बीजेपी की नजर है.

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मुस्लिम वोटर के अलावा ये तबका चुनाव में बड़ी भूमिका रखता है. बीजेपी इन्हीं जातियों पर पकड़ बनाने की गोलबंदी में जुटी हुई है. इसके जरिये बीजेपी ने यूपी में सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति को एक दूसरा विकल्प भी दे दिया है.

कहा जाता है कि कि बिना यूपी जीते दिल्ली में सरकार बनाने का सपना पूरा नहीं हो सकता. सच्चाई भी यही है और आगे भी रहेगी. लेकिन सोशल इंजीनियरिंग का एडवांस्ड वर्जन कई वोटबैंक के सर्वर डाउन कर सकता है. क्योंकि एक जंग जमीन के अलावा सोशल मीडिया पर भी लड़ी जा रही है जहां बीजेपी बढ़त बनाने में माहिर है.

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